आध्यात्मिकता पर सुभाषित
यह विषय 6 स्रोतों से आए 44 सुभाषितों को एक साथ लाता है।
नवीनतम अद्यतन: 13 अक्टू॰ 2026
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया। सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥
tvaṃ vaiṣṇavī śaktiranantavīryā viśvasya bījaṃ paramāsi māyā । sammohitaṃ devi samastametat tvaṃ vai prasannā bhuvi muktihetuḥ ॥
देवी महात्म्यम् का यह श्लोक देवी को विश्व का मूल कारण और अपनी कृपा से मुक्ति देने वाली शक्ति के रूप में स्तुति करता है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥
anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥
विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।
मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं कलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम्। अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम्॥
mudākarāttamodakaṁ sadā vimuktisādhakaṁ kalādharāvataṁsakaṁ vilāsilokarakṣakam । anāyakaikanāyakaṁ vināśitebhadaityakaṁ natāśubhāśunāśakaṁ namāmi taṁ vināyakam ॥
श्रीविनायक की यह भक्तिपूर्ण स्तुति उन्हें मुक्ति के साधक, जगत् के रक्षक और अशुभ के शीघ्र नाशक के रूप में नमन करती है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
vasudevasutaṁ devaṁ kaṁsacāṇūramardanam । devakīparamānandaṁ kṛṣṇaṁ vande jagadgurum ॥
वसुदेव-पुत्र, कंस और चाणूर के संहारक, देवकी के परम आनन्द और जगद्गुरु श्रीकृष्ण की श्रद्धापूर्ण वन्दना।
तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्। अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥
tantuṃ tanvan rajaso bhānum anv ihi jyotiṣmataḥ patho rakṣa dhiyā kṛtān । anulbaṇaṃ vayata joguvām apo manur bhava janayā daivyaṃ janam ॥
ऋग्वेद का यह मन्त्र बुद्धि से निर्मित ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा और सच्चा मनुष्य बनकर दैवी गुणों से युक्त जन के निर्माण का आह्वान करता है।
शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु। शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः॥
śaṁ no dyāvāpṛthivī pūrvahūtau śam antarikṣaṁ dṛśaye no astu । śaṁ na oṣadhīr vanino bhavantu śaṁ no rajasas patir astu jiṣṇuḥ ॥
ऋग्वेद का यह मन्त्र द्युलोक, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, औषधियों, वृक्षों और अन्तरिक्ष के विजयशील अधिपति से स्थायी मंगल की प्रार्थना करता है।
लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा। ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥ दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा। श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥
lokapālāśca te sarve vāsavapramukhāstathā । ṛtavaḥ ṣaṭ ca te sarve māsāḥ saṁvatsarāḥ kṣapāḥ ॥ dināni ca muhūrtāśca svasti kurvantu te sadā । śrutiḥ smṛtiśca dharmaśca pātu tvāṁ putra sarvataḥ ॥
अयोध्या काण्ड के इस आशीर्वचन में लोकपालों, कालचक्र, श्रुति-स्मृति और धर्म से निरंतर मंगल तथा सर्वांगीण रक्षा की प्रार्थना की गई है।
यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः सर्वानुभूः। यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः सर्वानुभूः॥
yaścāyamasminnākāśe tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣaḥ sarvānubhūḥ । yaścāyamasminnātmani tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣaḥ sarvānubhūḥ ॥
बृहदारण्यकोपनिषद् से निर्मित यह संयुक्त पाठ आकाश में स्थित तेजोमय, अमृतमय सत्ता और आत्मा में उपस्थित उसी सत्य की एकता व्यक्त करता है।
देवदेव जगन्नाथ सुरासुरनमस्कृत। पुण्यश्लोकाव्ययानन्त परमात्मन्नमोऽस्तु ते॥
devadeva jagannātha surāsuranamaskṛta । puṇyaślokāvyayānanta paramātman namo’stu te ॥
भगवान जगन्नाथ को देवताओं के भी देव, जगत के स्वामी और सभी हृदयों में स्थित परमात्मा मानकर किया गया भक्तिपूर्ण प्रणाम।
प्रभया हि विनायद्वद्भानुरेष न विद्यते। प्रभा च भानुना तेन सुतरां तदुपाश्रया॥
prabhayā hi vināyadvadbhānureṣa na vidyate । prabhā ca bhānunā tena sutarāṃ tadupāśrayā ॥
यह संस्कृत सुभाषित सूर्य और उसके प्रकाश के माध्यम से अस्तित्व, शक्ति और अभिव्यक्ति की गहरी परस्पर निर्भरता को समझाता है।
हितं यत्सर्वभूतानामात्मानश्च सुखावहम्। तत्कुर्यादीश्वरे ह्येतन्मूलं सर्वार्थसिद्धये॥
hitaṃ yat sarvabhūtānām ātmānaśca sukhāvaham । tat kuryād īśvare hy etan mūlaṃ sarvārthasiddhaye ॥
महाभारत का यह श्लोक सिखाता है कि वही कर्म श्रेष्ठ है जो सभी प्राणियों के लिए हितकारी हो, आत्मा को शांति दे और ईश्वर-समर्पण से जुड़ा हो।
वाग्बुद्धिचित्तकरणैश्च तपोभिरुग्रैः शक्यं समाकलयितुं न यदीयरूपम्। तं भक्तिभावसुलभं शरणं नतानां नित्यं भजाम्यमरनाथमहं दयालुम्॥
vāgbuddhicittakaraṇaiś ca tapobhir ugraiḥ śakyaṃ samākalayituṃ na yadīyarūpam । taṃ bhaktibhāvasulabhaṃ śaraṇaṃ natānāṃ nityaṃ bhajāmy amaranātham ahaṃ dayālum ॥
भगवान अमरनाथ की यह भक्तिपूर्ण वंदना बताती है कि वे वाणी, बुद्धि, मन, इन्द्रियों और तप से परे हैं, पर भक्तिभाव से सहज प्राप्त होते हैं।
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्। समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥
samāno mantraḥ samitiḥ samānī samānaṁ manaḥ saha cittameṣām । samānaṁ mantram abhi mantraye vaḥ samānena vo haviṣā juhomi ॥
ऋग्वेद का यह मंत्र समान संकल्प, सौहार्दपूर्ण सभा, एकचित्त मन और साझा उद्देश्य से मिलकर कार्य करने की प्रेरणा देता है।
स्वातन्त्र्यात् सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम्। स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत् स्वातन्त्र्यात् परमं पदम्॥
svātantryāt sukham āpnoti svātantryāl labhate param । svātantryān nirvṛtiṃ gacchet svātantryāt paramaṃ padam ॥
अष्टावक्र गीता स्वतंत्रता को सुख, शांति, आत्मबोध और परम अवस्था की प्राप्ति का मार्ग बताती है।
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः। परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद् यतयो विशन्ति॥
na karmaṇā na prajayā dhanena tyāgenaike amṛtatvam ānaśuḥ । pareṇa nākaṃ nihitaṃ guhāyāṃ vibhrājate yad yatayo viśanti ॥
कैवल्योपनिषद् का यह मंत्र बताता है कि अमरत्व त्याग, निःस्वार्थ समर्पण और उच्च आदर्शों के प्रति निष्ठा से प्राप्त होता है।
नारी त्रैलोक्यजननी नारी त्रैलोक्यरूपिणी। नारी त्रिभुवनाधारा नारी शक्तिस्वरूपिणी॥
nārī trailokyajananī nārī trailokyarūpiṇī । nārī tribhuvanādhārā nārī śaktisvarūpiṇī ॥
यह श्लोक नारी को तीनों लोकों की जननी, अभिव्यक्ति, आधार और शक्ति के वास्तविक स्वरूप के रूप में नमन करता है।
एवं परस्परापेक्षा शक्तिशक्तिमतोः स्थिता। न शिवेन विना शक्तिर्न शक्त्या विना शिवः॥
evaṁ parasparāpekṣā śaktiśaktimatoḥ sthitā । na śivena vinā śaktirna śaktyā vinā śivaḥ ॥
शक्ति और सामर्थ्य परस्पर पूरक हैं — जैसे शिव के बिना शक्ति नहीं और शक्ति के बिना शिव नहीं, वैसे ही सामर्थ्य और ऊर्जा के समन्वय से ही सृजन, प्रगति और सफलता संभव होती है।
नान्तर्बहिश्च लोकेषु त्वात्मानं दृष्टवान् क्वचित्। आष्टाङ्गिकेन मार्गेण परमां शान्तिमाययौ॥
nāntar bahiśca lokeṣu tvātmānaṁ dṛṣṭavān kvacit । āṣṭāṅgikena mārgeṇa paramāṁ śāntim āyayau ॥
बौद्ध दृष्टि वाला यह संस्कृत श्लोक स्थायी आत्मा के अभाव की समझ, अष्टांगिक मार्ग और परम शांति की प्राप्ति को जोड़ता है।
यस्यां वृक्षा वानस्पत्या ध्रुवास्तिष्ठन्ति विश्वहा। पृथिवीं धेनुं प्रदुहां न उदिच्छन्तु नमोऽस्तु पृथिव्यै॥
yasyāṃ vṛkṣā vānaspatyā dhruvāstiṣṭhanti viśvahā । pṛthivīṃ dhenuṃ praduhāṃ na udicchantu namo’stu pṛthivyai ॥
अथर्ववेद के भूमि सूक्त से ली गई यह प्रार्थना पृथ्वी माता को समस्त संसाधनों की प्रदाता और जीवन की आधारशिला के रूप में सम्मानित करती है।
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatam idaṁ jagad ātmaśaktyā niśśeṣa-devagaṇa-śakti-samūha-mūrtyā । tām ambikām akhila-deva-maharṣi-pūjyāṁ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्य का यह मंत्र उस जगदम्बा को नमन करता है जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं और समस्त शक्तियों के एकीकृत सामर्थ्य का साक्षात् स्वरूप हैं।
अन्तःस्थमेव यज्ज्ञानं ज्ञानादपि च यत्परम्। तदेव सर्वसंसारसारं सद्भिरुपास्यते॥
antaḥsthameva yajjñānaṁ jñānādapi ca yatparam । tadeva sarvasaṁsārasāraṁ sadbhirupāsyate ॥
यह श्लोक उस आंतरिक ज्ञान का वर्णन करता है जो बाहरी शिक्षा से परे है और जिसे संपूर्ण संसार का वास्तविक सार माना गया है।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादात्तस्य धूर्जटेः। जाह्नवीफेनलेखेव यन्मूर्ध्नि शशिनः कला॥
siddhiḥ sādhye satām astu prasādāt tasya dhūrjaṭeḥ । jāhnavī-phena-lekheva yan-mūrdhni śaśinaḥ kalā ॥
जिन महादेव के मस्तक पर चन्द्रमा की कला गंगा के झाग के समान सुशोभित है, उनकी कृपा से सज्जनों के संकल्प सिद्ध हों।
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
siddhagandharvayakṣādyairasurairamarairapi । sevyamānā sadā bhūyāt siddhidā siddhidāyinī ॥
नवदुर्गा के नौवें स्वरूप माँ सिद्धिदात्री की स्तुति, जो सभी सिद्धियों और शक्तियों को प्रदान करने वाली हैं।
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
śvete vṛṣe samārūḍhā śvetāmbaradharā śuciḥ । mahāgaurī śubhaṁ dadyān mahādevapramodadā ॥
नवदुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की स्तुति, जो पवित्रता और शांति की प्रतीक हैं।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥
vāmapādollasallohalatākaṇṭakabhūṣaṇā । vardhanmūrdhadhvajā kṛṣṇā kālarātrirbhayaṅkarī ॥
नवदुर्गा स्तोत्र का यह श्लोक माँ कालरात्रि के भयंकर किंतु मंगलकारी स्वरूप का वर्णन करता है, जो अंधकार और भय का नाश करने वाली हैं।
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥
candrahāsojjvalakarā śārdūlavaravāhanā । kātyāyanī śubhaṁ dadyād devī dānavaghātinī ॥
चन्द्रहास खड्ग धारण करने वाली और सिंह पर सवार माँ कात्यायनी की वंदना, जो शुभ फल और शक्ति प्रदान करती हैं।
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदाऽस्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
siṁhāsanagatā nityaṁ padmāśritakaradvayā । śubhadā’stu sadā devī skandamātā yaśasvinī ॥
नवरात्रि के पांचवें दिन पूजी जाने वाली माँ स्कन्दमाता की स्तुति, जो वात्सल्य और ममता की प्रतिमूर्ति हैं।
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदाऽस्तु मे॥
surāsampūrṇakalaśaṃ rudhirāplutameva ca । dadhānā hastapadmābhyāṃ kūṣmāṇḍā śubhadā'stu me ॥
ब्रह्मांड की सृजन शक्ति माँ कूष्माण्डा की प्रार्थना, जो अपने हाथों में अमृत कलश धारण करती हैं और भक्तों का कल्याण करती हैं।
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥
piṇḍajapravarārūḍhā caṇḍakopāstrakairyutā । prasādaṁ tanute mahyaṁ candraghaṇṭeti viśrutā ॥
माँ चंद्रघंटा की स्तुति, जो देवी दुर्गा का तीसरा रूप हैं, सिंह पर सवार होकर शांति और कल्याण प्रदान करती हैं।
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
dadhānā karapadmābhyām akṣamālā-kamaṇḍalū । devī prasīdatu mayi brahmacāriṇy-anuttamā ॥
नवरात्रि के दूसरे दिन पूजी जाने वाली माँ ब्रह्मचारिणी का यह श्लोक उनके तपस्वी स्वरूप और अनुशासन की महिमा का गान करता है।
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
vande vāñchitalābhāya candrārdhakṛtaśekharām । vṛṣārūḍhāṃ śūladharāṃ śailaputrīṃ yaśasvinīm ॥
यह श्लोक नवरात्रि के प्रथम दिन पूजी जाने वाली देवी शैलपुत्री की स्तुति है, जो भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं और संयम, शांति तथा शक्ति की प्रतीक हैं।
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः। देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे॥
ā no bhadrāḥ kratavo yantu viśvato'dabdhāso aparītāsa udbhidhaḥ । devā no yathā sadamid vṛdhe asann aprāyuvo rakṣitāro dive dive ॥
ऋग्वेद की यह सार्वभौमिक प्रार्थना हमें चारों दिशाओं से शुभ और प्रेरणादायक विचारों को ग्रहण करने की प्रेरणा देती है।
सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥
satyameva jayati nānṛtaṃ satyena panthā vitato devayānaḥ । yenākramantyṛṣayo hyāptakāmā yatra tatsatyasya paramaṃ nidhānam ॥
मुण्डक उपनिषद घोषित करता है कि सत्य की ही विजय होती है और वही पूर्णकाम ऋषियों के लिए परम सत्य का मार्ग खोलता है।
विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्। तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्॥
vipro vṛkṣas tasya mūlaṃ ca sandhyā vedāḥ śākhā dharmakarmāṇi patram । tasmāt mūlaṃ yatnato rakṣaṇīyaṃ chinne mūle naiva śākhā na patram ॥
एक ज्ञानी व्यक्ति की तुलना वृक्ष से करते हुए यह श्लोक नित्य उपासना के महत्त्व को दर्शाता है, जो ज्ञान और कर्म का आधार है।
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
pūrṇam adaḥ pūrṇam idaṃ pūrṇāt pūrṇam udacyate । pūrṇasya pūrṇam ādāya pūrṇam evāvaśiṣyate ॥
ईशावास्य उपनिषद का यह मंत्र पूर्णता के सिद्धांत को समझाता है। आधुनिक संदर्भ में, यह दर्शाता है कि ज्ञान बाँटने से कम नहीं होता, बल्कि नई संभावनाओं को जन्म देता है।
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥
jñānaṃ te'haṃ savijñānam idaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ । yajjñātvā neha bhūyo'nyajjñātavyamavaśiṣyate ॥
श्रीकृष्ण ऐसे ज्ञान और अनुभूत बोध का उपदेश देते हैं, जिसके बाद साधक के लिए जानने योग्य कोई आवश्यक सत्य शेष नहीं रहता।
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥
ūrdhvamūlam adhaḥśākham aśvatthaṃ prāhur avyayam । chandāṃsi yasya parṇāni yas taṃ veda sa vedavit ॥
संसाररूपी अश्वत्थ वृक्ष और वेदों के ज्ञान को समझाता यह गीता का श्लोक अध्यात्म की गहरी समझ प्रदान करता है।
यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः। यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
yasyeme himavanto mahitvā yasya samudraṃ rasayā sahāhuḥ । yasyemāḥ pradiśo yasya bāhū kasmai devāya haviṣā vidhema ॥
राष्ट्र की महिमा का गान करता यह मंत्र हमें देश के प्रति सर्वस्व समर्पण करने की प्रेरणा देता है।
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति। सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु॥
satyaṁ bṛhad ṛtam ugraṁ dīkṣā tapo brahma yajñaḥ pṛthivīṁ dhārayanti । sā no bhūtasya bhavyasya patny uruṁ lokaṁ pṛthivī naḥ kṛṇotu ॥
पावन भूमि सूक्त का यह मंत्र उन शाश्वत शक्तियों—सत्य, नियम और परिश्रम—का वर्णन करता है जो इस जगत को धारण करती हैं।
सूर्यो देवो दिवं गच्छेत् मकरस्थो रविः प्रभुः। उत्तरायणे महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥
sūryo devo divaṃ gacchet makarastho raviḥ prabhuḥ । uttarāyaṇe mahāpuṇyaṃ sarvapāpapraṇāśanam ॥
यह भक्तिपूर्ण श्लोक सूर्य की उत्तरायण गति को प्रकाश, शुद्धि, दान और आध्यात्मिक पुण्य से जुड़ा शुभ परिवर्तन मानता है।
आदिनाथेन शर्वेण सर्वप्राणिहिताय वै। आद्यतत्त्वान्यथानीयं क्षेत्रमेतन्महाप्रभम्। प्रभासितं महादेवि यत्र सिद्ध्यन्ति मानवाः॥
ādināthena śarveṇa sarvaprāṇihitāya vai । ādyatattvānyathānīyaṁ kṣetrametanmahāprabham । prabhāsitaṁ mahādevi yatra siddhyanti mānavāḥ ॥
भगवान शिव के आदिनाथ रूप द्वारा जन-कल्याण हेतु प्रकट किया गया प्रभास क्षेत्र, जहाँ दिव्यता और सिद्धि का वास है।
सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्। भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये॥
saurāṣṭradeśe viśade'tiramye jyotirmayaṁ candrakalāvataṁsam । bhaktipradānāya kṛpāvatīrṇaṁ taṁ somanāthaṁ śaraṇaṁ prapadye ॥
सौराष्ट्र की पवित्र भूमि में स्थित, ज्योति स्वरूप भगवान सोमनाथ की वंदना करते हुए यह श्लोक श्रद्धा और शांति का प्रतीक है।