यश्चायमस्मिन्नाकाशे - भीतर और बाहर एक प्रकाश

23 जुल॰ 2026

यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः सर्वानुभूः। यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः सर्वानुभूः॥

yaścāyamasminnākāśe tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣaḥ sarvānubhūḥ । yaścāyamasminnātmani tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣaḥ sarvānubhūḥ ॥

यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः का अर्थ

विस्तृत आकाश या अन्तरिक्ष में जो शक्तिमयी शाश्वत सत्ता है, वही हमारी आत्मा में भी है। इसलिए कहा भी गया है - जो पिण्ड या कण-कण में है, वही ब्रह्माण्ड में है।

शब्दार्थ

यः च अयम्yaś cāyam

और जो यह

यद्

अस्मिन् आकाशेasminn ākāśe

इस आकाश में

आ + √काश्

तेजोमयःtejomayaḥ

तेजोमय

√तिज्

अमृतमयःamṛtamayaḥ

अमृतमय

अ + √मृ

पुरुषःpuruṣaḥ

पुरुष

पुरुष

सर्वानुभूःsarvānubhūḥ

सर्वानुभवी

सर्व + अनु + √भू

अस्मिन् आत्मनिasminn ātmani

इस आत्मा में

आत्मन्

व्याख्या

यह पाठ ‘आकाश’ की विराटता को सीधे अन्तःस्थित आत्मा से जोड़ता है। ‘तेजोमय’ पुरुष को प्रकाश अथवा चेतना से परिपूर्ण बताता है, जबकि ‘अमृतमय’ उस सत्ता की ओर संकेत करता है जो परिवर्तन और मृत्यु से समाप्त नहीं होती। ‘सर्वानुभूः’ का भाव सबका अनुभव या बोध करने वाली ऐसी चेतना से है जो किसी एक सीमित व्यक्ति में बँधी नहीं है। इसका मूल उपनिषद्-सन्देश बाह्य जगत और अन्तर्जगत की एकता है: ब्रह्माण्ड में जिस प्रकाशमय सत्य का चिन्तन किया जाता है, वह अपने भीतर उपलब्ध सत्य से अलग नहीं है। ‘जो पिण्ड में है, वही ब्रह्माण्ड में है’ जैसी परिचित अभिव्यक्ति इसी सम्बन्ध को सहज भाषा में सामने रखती है। यहाँ आत्मबोध का अर्थ अपने गहनतम स्वरूप को उस अखण्ड आध्यात्मिक सत्ता से जुड़ा हुआ पहचानना है, न कि व्यक्ति और विश्व को सर्वथा पृथक मानना।

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