साहस पर सुभाषित

40 सुभाषित इस विषय पर

यह विषय 6 स्रोतों से आए 40 सुभाषितों को एक साथ लाता है।

नवीनतम अद्यतन: 9 अक्टू॰ 2026

9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।

साहसविनम्रतासम्मान
8 अक्टू॰ 2026

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।

स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
16 सित॰ 2026
महाभारत

अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥

advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥

महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।

साहसज्ञानदृढ़तासमृद्धि
18 अग॰ 2026
महाभारत

उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम्। अप्यपर्वणि भज्येत न नमेदिह कस्यचित्॥

udyacched eva na named udyamo hy eva pauruṣam । apy aparvaṇi bhajyeta na named iha kasyacit ॥

महाभारत का यह श्लोक उद्यम को ही पौरुष बताता है: मनुष्य निरंतर प्रयत्न करे और कभी न झुके, चाहे उसे झुकने के बजाय टूटना ही क्यों न पड़े।

दृढ़तासाहसचरित्र
14 अग॰ 2026
महासुभाषितसंग्रह

उद्यमस्य प्रसादेन दृश्यन्ते विविधाः कलाः। कातरा एव जल्पन्ति यद् भाव्यं तद् भविष्यति॥

udyamasya prasādena dṛśyante vividhāḥ kalāḥ । kātarā eva jalpanti yad bhāvyaṁ tad bhaviṣyati ॥

महासुभाषितसंग्रह का यह श्लोक कहता है कि उद्यम से विविध कलाएँ प्रकट होती हैं, जबकि कातर लोग भाग्य की बात भर करते हैं।

दृढ़तासाहससामर्थ्य
13 अग॰ 2026
वाल्मीकि रामायण

दैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्। न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति॥

daivaṁ puruṣakāreṇa yaḥ samarthaḥ prabādhitum । na daivena vipannārthaḥ puruṣaḥ so’vasīdati ॥

वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि जो मनुष्य पुरुषार्थ से दैव का सामना करने में समर्थ है, वह विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होता।

दृढ़तासाहसआत्मविश्वाससफलता
11 अग॰ 2026
विदुर नीति

अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च। पराक्रमश्च बहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥

aṣṭau guṇāḥ puruṣaṁ dīpayanti prajñā suśīlatva-damau śrutaṁ ca । parākramaś ca bahubhāṣitā ca dānaṁ yathāśakti kṛtajñatā ca ॥

विदुर नीति का यह श्लोक प्रज्ञा, सदाचार, संयम, ज्ञान, पराक्रम, दान और कृतज्ञता के साथ स्थापित पाठ में मितभाषिता को मनुष्य का प्रकाशक गुण बताता है।

ज्ञानचरित्रअनुशासनविद्यासाहस
31 जुल॰ 2026

न जातु शौर्यं पुरुषस्य भानुरस्तं गतो भवति कदापि शश्वत्। यथा पुनस्तपति दिवाकरोऽयं तथा पुनर्विक्रमते स वीरः॥

na jātu śauryaṁ puruṣasya bhānurastaṁ gato bhavati kadāpi śaśvat । yathā punastapati divākaro'yaṁ tathā punarvikramate sa vīraḥ ॥

वीर पुरुष का शौर्य कुछ समय के लिए ओझल हो सकता है, पर लौटते सूर्य की तरह वह फिर उदित होकर नए साहस से सक्रिय होता है।

साहसदृढ़ता
22 जुल॰ 2026
चाणक्य-सार-संग्रह

परकार्येषु युक्तात्मा स्वकार्यं क्षिप्रसाधनम्। सुहृत्कार्येषु निर्वृत्तौ राजकार्येषु विक्रमः॥

parakāryeṣu yuktātmā svakāryaṁ kṣiprasādhanam । suhṛtkāryeṣu nirvṛttau rājakāryeṣu vikramaḥ ॥

चाणक्य-सार-संग्रह का यह श्लोक परकार्य में निष्ठा, स्वकार्य में तत्परता, मित्रों के कार्य में विश्वसनीयता और राजकार्य में पराक्रम को श्रेष्ठता का लक्षण मानता है।

कर्तव्यसामर्थ्यसुशासनसाहस
20 जुल॰ 2026
विदुर नीति

प्राप्यापदं न व्यथते कदाचिदुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः। दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिताः सपत्नाः॥

prāpyāpadaṁ na vyathate kadācidudyogamanvicchati cāpramattaḥ । duḥkhaṁ ca kāle sahate mahātmā dhurandharastasya jitāḥ sapatnāḥ ॥

विदुर नीति का यह श्लोक संकट में अविचल रहकर सावधानीपूर्वक पुरुषार्थ करने और दुःख सहते हुए विजय पाने की शिक्षा देता है।

दृढ़तासाहसअनुशासनसफलता
8 जुल॰ 2026
चण्डकौशिकम्

चलन्ति गिरयः कामं युगान्तपवनाहताः। कृच्छ्रेऽपि न चलत्येव धीराणां निश्चलं मनः॥

calanti girayaḥ kāmaṃ yugāntapavanāhatāḥ । kṛcchre'pi na calatyeva dhīrāṇāṃ niścalaṃ manaḥ ॥

यह श्लोक धैर्य की शक्ति बताता है: प्रलयकालीन वायु से पर्वत भी हिल सकते हैं, पर धीरों का मन विपत्ति में भी अचल रहता है।

दृढ़तासाहसशांति
24 जून 2026
पञ्चतन्त्र

यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्यविहीनता। नयविक्रमसंयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम्॥

yatrotsāhasamārambho yatrālasyavihīnatā । nayavikramasaṃyogas tatra śrīr acalā dhruvam ॥

पञ्चतन्त्र का यह श्लोक बताता है कि उत्साह, आलस्यहीनता, नीति और पराक्रम के मेल से समृद्धि स्थिर और चिरस्थायी बनती है।

दृढ़ताअनुशासनसाहससफलता
29 मई 2026
भगवद् गीता

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥

tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam adroho nātimānitā । bhavanti sampadaṃ daivīm abhijātasya bhārata ॥

भगवद् गीता का यह श्लोक तेजस्विता, क्षमा, धैर्य, शुचिता, अद्रोह और अहंकाररहित विनम्रता जैसे छह दैवी गुणों का वर्णन करता है।

चरित्रविनम्रतानैतिकतासाहस
28 मई 2026
सुभाषितावलि

अनन्तोद्भूतभूतौघसङ्कुले भूतलेऽखिले। शस्त्रे शास्त्रे त्रिचतुराश्चतुरा यदि मादृशाः॥

anantodbhūtabhūtaughasaṅkule bhūtale'khile । śastre śāstre tricaturāś caturā yadi mādṛśāḥ ॥

यह श्लोक उस विरले व्यक्तित्व की वंदना करता है जो शस्त्र (शौर्य) और शास्त्र (ज्ञान) दोनों में समान रूप से निपुण हो।

ज्ञानसाहसविद्याचरित्र
21 मई 2026
अथर्ववेद

यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन्। गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु॥

yasyāṁ pūrve pūrvajanā vicakrire yasyāṁ devā asurān abhyavartayan । gavāmaśvānāṁ vayasaś ca viṣṭhā bhagaṁ varcaḥ pṛthivī no dadhātu ॥

अथर्ववेद के भूमि सूक्त का यह ऐतिहासिक मंत्र उस मातृभूमि का आह्वान करता है जो पूर्वजों के महान पुरुषार्थ और दैवी शौर्य की साक्षी रही है, ताकि वह लोक को ऊर्जा और ऐश्वर्य से समृद्ध करे।

प्रकृतिसंस्कृतिसाहससमृद्धि
8 मई 2026
भगवद् गीता

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi । dharmyāddhi yuddhācchreyo'nyatkṣatriyasya na vidyate ॥

अर्जुन को दिए गए भगवान श्रीकृष्ण के इस उपदेश में स्पष्ट किया गया है कि एक योद्धा के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है।

कर्तव्यधर्मसाहसदृढ़ता
7 मई 2026
महाभारत

उदीर्णमनसो योधा वाहनानि च भारत। यस्यां भवन्ति सेनायां ध्रुवं तस्यां जयं वदेत्॥

udīrṇamanaso yodhā vāhanāni ca bhārata । yasyāṁ bhavanti senāyāṁ dhruvaṁ tasyāṁ jayaṁ vadet ॥

महाभारत से लिया गया यह श्लोक बताता है कि उत्साहित सैनिक और उत्कृष्ट संसाधन ही किसी सेना की जीत को सुनिश्चित करते हैं।

साहससामर्थ्यशक्तिसफलताअनुशासन
30 अप्रैल 2026
वाल्मीकि रामायण

अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः। करोति सफलं जन्तोः कर्म यच्च करोति सः॥

anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ । karoti saphalaṁ jantoḥ karma yacca karoti saḥ ॥

वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि किस प्रकार उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा किसी भी कार्य को सफल बनाने के लिए आवश्यक हैं।

दृढ़तासफलताआत्मविश्वाससाहस
13 अप्रैल 2026
ऋग्वेद

इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नन्तो अराव्णः॥

indraṁ vardhanto apturaḥ kṛṇvanto viśvamāryam । apaghnanto arāvṇaḥ ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र समाज की कल्याणकारी शक्तियों को बढ़ाने और अन्यायपूर्ण शक्तियों का प्रतिरोध कर पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाने का एक ओजस्वी वैदिक आह्वान है।

धर्मसाहसचरित्रएकता
10 अप्रैल 2026
वाल्मीकि रामायण

व्यसने वाऽर्थकृच्छ्रे वा भये वा जीवनान्तके। विमृशन् वै स्वया बुद्ध्या धृतिमान् नावसीदति॥

vyasane vā’rthakṛcchre vā bhaye vā jīvanāntake । vimṛśan vai svayā buddhyā dhṛtimān nāvasīdati ॥

वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि आर्थिक संकट या प्राणों के भय की स्थिति में कैसे धैर्य और स्वयं के विवेक द्वारा दुःख और मानसिक अवसाद से बचा जा सकता है।

दृढ़ताज्ञानसाहसआत्मविश्वास
2 अप्रैल 2026
रामरक्षास्तोत्रम्

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शिरसा नमामि॥

manojavaṁ mārutatulyavegaṁ jitendriyaṁ buddhimatāṁ variṣṭham । vātātmajaṁ vānarayūthamukhyaṁ śrīrāmadūtaṁ śirasā namāmi ॥

श्री राम के दूत हनुमान जी की यह वंदना उनकी गति, बुद्धि और इंद्रिय संयम की प्रशंसा करती है।

भक्तिसाहसज्ञानअनुशासनविनम्रता
30 मार्च 2026
कथासरित्सागर

विचित्रचरितोल्लेखचमत्कारितचेतनम्। प्राप्यते किं यशः शुभ्रमनङ्गीकृत्य साहसम्॥

vicitracaritollekhacamatkāritacetanam । prāpyate kiṃ yaśaḥ śubhramanaṅgīkṛtya sāhasam ॥

इस श्लोक में बताया गया है कि उज्ज्वल यश और विलक्षण उपलब्धियाँ केवल साहस को अपनाने से ही प्राप्त होती हैं।

साहससफलता
18 मार्च 2026
नीतिशतकम्

एकेनापि हि शूरेण पादाक्रान्तं महीतलम्। क्रियते भास्करेणेव स्फारस्फुरिततेजसा॥

ekenāpi hi śūreṇa pādākrāntaṃ mahītalam । kriyate bhāskareṇeva sphārasphuritetejasā ॥

जैसे सूर्य अकेले ही अपने तेज से समस्त पृथ्वी को प्रकाशित करता है, वैसे ही एक सच्चा वीर अकेले अपने साहस से पूरी धरती पर अपना प्रभाव स्थापित कर सकता है।

साहसआत्मविश्वासवैयक्तिकताशक्ति
17 मार्च 2026
कामन्दकीय नीतिसार

एकोऽपि सिंहः साहस्रं यूथं मथ्नाति दन्तिनाम्। तस्मात् सिंहमिवोदारमात्मानं वीक्ष्य सम्पतेत्॥

eko'pi siṁhaḥ sāhasraṁ yūthaṁ mathnāti dantinām । tasmāt siṁham ivodāram ātmānaṁ vīkṣya sampatet ॥

जैसे एक अकेला सिंह हाथियों के झुंड पर भारी पड़ता है, वैसे ही साहस और संकल्प से मनुष्य कठिनतम चुनौतियों को पार कर सकता है।

साहसआत्मविश्वासचरित्रशक्ति
5 मार्च 2026
वाल्मीकि रामायण

उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्। सोत्साहस्यास्ति लोकेऽस्मिन् न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥

utsāho balavān ārya nāsty utsāhāt paraṃ balam । sotsāhasyāsti loke’smin na kiñcid api durlabham ॥

उत्साह ही सबसे बड़ा बल है। रामायण का यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि एक उत्साही व्यक्ति के लिए कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं है।

ऊर्जादृढ़तासाहसआत्मविश्वास
2 मार्च 2026
ऋग्वेद

न वा उ मां वृजने वारयन्ते न पर्वतासो यदहं मनस्ये। मम स्वनात् कृधुकर्णो भयात एवेदनु द्यून्किरणः समेजात्॥

na vā u māṃ vṛjane vārayante na parvatāso yad ahaṃ manasye । mama svanāt kṛdhukarṇo bhayāta eved anu dyūn kiraṇaḥ samejāt ॥

ऋग्वेद का यह मंत्र अदम्य इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास की महिमा का गान करता है, जो बड़े से बड़े पहाड़ों जैसी बाधाओं को भी पार करने में सक्षम है।

आत्मविश्वाससाहसदृढ़ता
27 फ़र॰ 2026
महाभारत

न हि शौर्यात्परं किञ्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते। शूरः सर्वं पालयति सर्वं शूरे प्रतिष्ठितम्॥

na hi śauryāt paraṃ kiñcit triṣu lokeṣu vidyate । śūraḥ sarvaṃ pālayati sarvaṃ śūre pratiṣṭhitam ॥

यह श्लोक बताता है कि तीनों लोकों में शौर्य से बढ़कर कुछ नहीं है, और यही वह शक्ति है जो समस्त मर्यादा और व्यवस्था की रक्षा करती है।

साहसशक्तिधर्मकर्तव्य
26 फ़र॰ 2026

धीराः शोकं तरिष्यन्ति लभन्ते सिद्धिमुत्तमाम्। धीरैः सम्प्राप्यते लक्ष्मीर्धैर्यं सर्वत्र साधनम्॥

dhīrāḥ śokaṃ tariṣyanti labhante siddhimuttamām । dhīraiḥ samprāpyate lakṣmīrdhairyaṃ sarvatra sādhanam ॥

धीर व्यक्ति साहस से शोक पार करते, धैर्य से कठिनाइयाँ सहते और निराशा के आगे झुके बिना अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं।

साहसदृढ़तासफलताज्ञान
16 फ़र॰ 2026
चाणक्य नीति

दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये। विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा॥

dāne tapasi śaurye ca vijñāne vinaye naye । vismayo na hi kartavyo bahuratnā vasundharā ॥

यह संसार इतना विशाल है कि दान, तप, शौर्य, ज्ञान, विनय या नीति में किसी को स्वयं को अद्वितीय नहीं मानना चाहिए।

ज्ञानधर्मविद्यासाहसविनम्रता
29 जन॰ 2026
अथर्ववेद

एको बहूनामसि मन्य ईडिता विशं विशं युद्धाय सं शिशाधि। अकृत्तरुक्त्वया युजा वयं द्युमन्तं घोषं विजयाय कृण्मसि॥

eko bahūnāmasi manya īḍitā viśaṃ viśaṃ yuddhāya saṃ śiśādhi । akṛttaruk tvayā yujā vayaṃ dyumantaṃ ghoṣaṃ vijayāya kṛṇmasi ॥

मन्यु सूक्त का यह मंत्र अनुशासित युद्ध-ऊर्जा, सामूहिक साहस और विवेकपूर्ण दिशा में प्राप्त सम्मानजनक विजय का आह्वान करता है।

साहसनेतृत्वशक्तिअनुशासन
23 जन॰ 2026
दर्पदलनम्

एतदेव परं शौर्यं यत् परप्राणरक्षणम्। नहि प्राणहरः शूरः शूरः प्राणप्रदोऽर्थिनाम्॥

etadeva paraṁ śauryaṁ yat paraprāṇarakṣaṇam । nahi prāṇaharaḥ śūraḥ śūraḥ prāṇaprado'rthinām ॥

सच्ची वीरता प्राण लेने में नहीं, बल्कि प्राणों की रक्षा करने में है। यह श्लोक एक सच्चे वीर को संकट में पड़े लोगों को जीवन देने वाले के रूप में परिभाषित करता है।

साहसनैतिकताधर्मचरित्र
15 जन॰ 2026
ऋग्वेद

अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ता जयन्तु। अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्माँ उ देवा अवता हवेषु॥

asmākam indraḥ samṛteṣu dhvajeṣv asmākaṁ yā iṣavas tā jayantu । asmākaṁ vīrā uttare bhavantv asmā̃ u devā avatā haveṣu ॥

यह वैदिक प्रार्थना संघर्ष में साहस, समुदाय की रक्षा और ऊँचे उठे ध्वजों के नीचे विजय के लिए इन्द्र का आह्वान करती है।

साहसशक्तिभक्ति
12 जन॰ 2026
हर्षचरित

अङ्गणवेदी वसुधा कुल्या जलधिः स्थली च पातालम्। वल्मीकश्च सुमेरुः कृतप्रतिज्ञस्य वीरस्य॥

aṅgaṇavedī vasudhā kulyā jaladhiḥ sthalī ca pātālam । valmīkaśca sumeruḥ kṛtapratijñasya vīrasya ॥

दृढ़ संकल्पी वीर के लिए कुछ भी असंभव नहीं। जानिए कैसे एक मजबूत इच्छाशक्ति बाधाओं को अवसरों में बदल देती है।

साहसदृढ़ताआत्मविश्वास
1 जन॰ 2026
श्रीमद्भागवत पुराण

ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो बलं स्मृतिः। स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिर्धैर्यं मार्दवमेव च॥

jñānaṁ viraktiḥ aiśvaryam śauryaṁ tejo balaṁ smṛtiḥ । svātantryaṁ kauśalaṁ kāntiḥ dhairyaṁ mārdavaṁ eva ca ॥

ज्ञान, वैराग्य, सामर्थ्य, शौर्य, तेज, धैर्य और कोमलता जैसे पूरक गुण मिलकर एक परिपक्व चरित्र का निर्माण करते हैं।

चरित्रविद्यासाहसस्वतंत्रताज्ञान
26 दिस॰ 2025

बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः। उभयत्र समो वीरः वीरभावो हि वीरता॥

bandhanaṁ maraṇaṁ vāpi jayo vāpi parājayaḥ । ubhayatra samo vīraḥ vīrabhāvo hi vīratā ॥

बंधन या मृत्यु, विजय या पराजय—हर परिस्थिति में साहस और समभाव बनाए रखना ही सच्ची वीरता है।

साहसदृढ़ताचरित्र
16 दिस॰ 2025
वाल्मीकि रामायण

न मर्षयन्ति चात्मानं सम्भावयितुमात्मना। अदर्शयित्वा शूरास्तु कर्म कुर्वन्ति दुष्करम्॥

na marśayanti cātmānaṁ sambhāvayitum ātmana । adarśayitvā śūrāstu karma kurvanti duṣkaraṁ ॥

सच्चे वीर अपनी महानता का स्वयं बखान नहीं करते; उनके कठिन कर्म और मौन साहस ही उनका मूल्य प्रकट करते हैं।

विनम्रतासाहसचरित्र
11 दिस॰ 2025
विदुर नीति

सुदुर्बलं नावजानाति कञ्चिद् युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम्। न विग्रहं रोचयते बलस्थैः काले च यो विक्रमते स धीरः॥

sudurbalaṃ nāvajānāti kañcid yukto ripuṃ sevate buddhipūrvam । na vigrahaṃ rocayate balasthaiḥ kāle ca yo vikramate sa dhīraḥ ॥

सुदुर्बलं नावजानाति श्लोक के अनुसार सच्चा वीर वही है जो बुद्धि और विवेक से काम लेता है और उचित समय पर ही अपना शौर्य दिखाता है।

ज्ञानसाहसनैतिकताअनुशासन