व्यसने वाऽर्थकृच्छ्रे वा भये वा जीवनान्तके। विमृशन् वै स्वया बुद्ध्या धृतिमान् नावसीदति॥
vyasane vā’rthakṛcchre vā bhaye vā jīvanāntake । vimṛśan vai svayā buddhyā dhṛtimān nāvasīdati ॥
प्रधानमंत्री का संदेशदेश के युवा जो ठान लेते हैं, उसे करके दिखाते हैं। यह हमारी युवाशक्ति का ही सामर्थ्य है कि हमारा राष्ट्र आज तेज गति से विकास के पथ पर अग्रसर है।
व्यसने वाऽर्थकृच्छ्रे वा भये का अर्थ
विपत्ति, आर्थिक संकट या प्राणों के संकट की घड़ी में जो व्यक्ति धैर्य रखकर अपनी बुद्धि से विचार करता है, वह परिस्थिति से टूटता नहीं। संकट की स्थिति में शान्त और विवेकपूर्ण निर्णय ही उसे दुःख और हानि से बचाते हैं।
शब्दार्थ
- व्यसनेvyasane
व्यसन में
वि + √अस्
- वा अर्थकृच्छ्रेvārthakṛcchre
अथवा अर्थसंकट में
अर्थ + कृच्छ्र
- वा भयेvā bhaye
अथवा भय में
√भी
- वा जीवनान्तकेvā jīvanāntake
अथवा जीवन के अन्त में
√जीव् + अन्त
- विमृशन्vimṛśan
विचार करता हुआ
वि + √मृश्
- वै स्वया बुद्ध्याvai svayā buddhyā
अपनी ही बुद्धि से
√बुध्
- धृतिमान्dhṛtimān
धृतिमान्
√धृ
- न अवसीदतिnāvasīdati
धँसता नहीं
अव + √सद्
व्याख्या
रामायण का यह श्लोक चार परिस्थितियाँ गिनाता है: विपत्ति, अर्थसंकट, भय और जीवन का अन्त। प्रत्येक स्थिति में धैर्यवान व्यक्ति अपनी बुद्धि से विचार करता है और अवसाद में नहीं डूबता। यहाँ धृति निष्क्रिय धैर्य नहीं, बल्कि 'विमृशन्' और 'स्वया बुद्ध्या' द्वारा व्यक्त विचारशीलता से जुड़ी है। श्लोक हर कठिनाई से बाहर निकलने की गारंटी या असफलता का एकमात्र कारण संयम का अभाव नहीं बताता। उसका सीमित कथन है कि विचारपूर्ण धैर्य जीवनान्त में भी भीतरी पतन से बचाता है।
मूल पोस्ट
वाल्मीकि रामायण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंदैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्। न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति॥
daivaṁ puruṣakāreṇa yaḥ samarthaḥ prabādhitum । na daivena vipannārthaḥ puruṣaḥ so’vasīdati ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि जो मनुष्य पुरुषार्थ से दैव का सामना करने में समर्थ है, वह विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होता।
लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा। ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥ दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा। श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥
lokapālāśca te sarve vāsavapramukhāstathā । ṛtavaḥ ṣaṭ ca te sarve māsāḥ saṁvatsarāḥ kṣapāḥ ॥ dināni ca muhūrtāśca svasti kurvantu te sadā । śrutiḥ smṛtiśca dharmaśca pātu tvāṁ putra sarvataḥ ॥
अयोध्या काण्ड के इस आशीर्वचन में लोकपालों, कालचक्र, श्रुति-स्मृति और धर्म से निरंतर मंगल तथा सर्वांगीण रक्षा की प्रार्थना की गई है।
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्। अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः॥
anirvedaḥ śriyo mūlam anirvedaḥ paraṁ sukham । anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ ॥
वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड का यह श्लोक बताता है कि निराशा से मुक्त उत्साह, दृढ़ विश्वास और सतत प्रयास ही उन्नति और सफलता का आधार हैं।
दृढ़ता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।