अर्थ सहित संस्कृत श्लोक

संस्कृत श्लोक सत्य, पुरुषार्थ, विद्या, करुणा, आत्मबोध और परस्पर व्यवहार से जुड़े गहरे विचारों को सुरक्षित रखते हैं। इस चयन में वेद, उपनिषद्, महाकाव्य और नीति साहित्य के प्रसिद्ध उपदेशों के साथ कुछ कम परिचित किंतु उपयोगी श्लोक भी शामिल हैं।

हर श्लोक के साथ संक्षिप्त अर्थ और उपलब्ध होने पर प्रमाणित स्रोत दिया गया है। किसी भी श्लोक के पूर्ण पृष्ठ पर जाकर उसका हिन्दी-अंग्रेज़ी अर्थ, व्याख्या, पाठ-संदर्भ और उसे साझा किए जाने का प्रसंग पढ़ें।

इस संग्रह का प्रत्येक श्लोक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा X पर साझा किया गया था।

यह चयन शुभ विचार और विश्वबंधुत्व से लेकर निरंतर प्रयास, नैतिक आचरण, विद्या और आध्यात्मिक दृष्टि तक संग्रह की व्यापकता दिखाता है।

1

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः। देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे॥

ā no bhadrāḥ kratavo yantu viśvato'dabdhāso aparītāsa udbhidhaḥ । devā no yathā sadamid vṛdhe asann aprāyuvo rakṣitāro dive dive ॥

अर्थ

हमारे पास चारों दिशाओं से ऐसे शुभ और प्रेरणादायक विचार आएँ जो हमें उत्साह, ऊर्जा और आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करें। वे विचार अडिग, अविजित और उन्नति के मार्ग को खोलने वाले हों। देवता प्रतिदिन हमारे जीवन में वृद्धि, प्रगति और नवोत्साह का संचार करें तथा हमें हर दिन सुरक्षित रखते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा दें।

2

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

ayaṁ nijaḥ paro veti gaṇanā laghucetasām । udāracaritānāṁ tu vasudhaiva kuṭumbakam ॥

अर्थ

उदार और विशाल हृदय वाले लोग संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर समस्त संसार को अपना परिवार मानते हैं। उनके लिए कोई भी पराया नहीं होता, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति अपना ही होता है और यही भावना प्रेम, एकता और सौहार्द का आधार बनती है।

3

सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥

satyameva jayati nānṛtaṃ satyena panthā vitato devayānaḥ । yenākramantyṛṣayo hyāptakāmā yatra tatsatyasya paramaṃ nidhānam ॥

अर्थ

सत्य की ही जीत होती है, असत्य की नहीं। सत्य के द्वारा ही वह देवयान मार्ग (दिव्य मार्ग) विस्तृत होता है, जिससे होकर पूर्णकाम (जिनकी इच्छाएँ पूर्ण हो चुकी हों) ऋषि उस स्थान तक पहुँचते हैं जहाँ सत्य का परम निधान (खजाना) है।

4

अहिंसा परमो धर्मस्तथाऽहिंसा परन्तपः। अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥

ahiṃsā paramo dharmastathā’hiṃsā parantapaḥ । ahiṃsā paramaṃ satyaṃ yato dharmaḥ pravartate ॥

अर्थ

अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है, अहिंसा ही सबसे बड़ा तप है और अहिंसा ही परम सत्य है, जिससे धर्म की स्थापना होती है।

5

चरैवेति चरैवेति चरन्वै मधु विन्दति। सूर्यास्य पश्य श्रेमाणं न मामार न जीर्यति॥

caraiveti caraiveti caranvai madhu vindati । sūryāsya paśya śremāṇaṃ na māmāra na jīryati ॥

अर्थ

चलते रहो, आगे बढ़ते रहो, सतत कर्मशील व्यक्ति ही प्रगति का मीठा फल प्राप्त करता है। सूर्य की महानता को देखो, वह बिना थके और बिना क्षीण हुए, संसार को अपनी ऊर्जा से निरंतर प्रकाशित करता है।

6

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥

jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥

अर्थ

जिस प्रकार जल की एक-एक बूँद लगातार गिरने से घड़ा भर जाता है, ठीक उसी प्रकार, निरन्तर थोड़े-थोड़े प्रयास से सभी विद्याएँ, धर्म और धन भी धीरे-धीरे संगृहीत हो जाते हैं।

7

श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥

śrūyatāṃ dharmasarvasvaṃ śrutvā caivāvadhāryatām । ātmanaḥ pratikūlāni pareṣāṃ na samācaret ॥

अर्थ

जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए सदैव उत्तम और अनुकरणीय बातों को सुनें तथा उनका पालन करें। जो व्यवहार हमें स्वयं के लिए अच्छा न लगे, वैसा व्यवहार दूसरों के साथ कभी न करें।

8

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥

priyavākyapradānena sarve tuṣyanti jantavaḥ । tasmāt tadeva vaktavyaṁ vacane kā daridratā ॥

अर्थ

मीठी वाणी बोलने से सभी व्यक्ति प्रसन्न और संतुष्ट होते हैं। इसलिए सदैव मधुर वचन ही बोलने चाहिए। जब वाणी हमारे अधीन है और इसका कोई मूल्य भी नहीं देना पड़ता तो फिर मीठे वचन बोलने में दरिद्रता कैसी ?

9

उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्। सोत्साहस्यास्ति लोकेऽस्मिन् न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥

utsāho balavān ārya nāsty utsāhāt paraṃ balam । sotsāhasyāsti loke’smin na kiñcid api durlabham ॥

अर्थ

उत्साह ही सबसे बड़ा बल है, वस्तुतः उत्साह से बढ़कर कोई अन्य शक्ति नहीं। इस संसार में उत्साही व्यक्ति के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता।

10

यथा खात्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति॥

yathā khātvā khanitreṇa bhūtale vāri vindati । tathā gurugatāṃ vidyāṃ śuśrūṣuradhigacchati ॥

अर्थ

जिस प्रकार धरती से जल निकालने के लिए कठिन परिश्रम करते हुए धैर्यपूर्वक गहराई तक खोदना पड़ता है, उसी प्रकार ज्ञान प्राप्ति के लिए भी श्रद्धा, समर्पण, अनुशासन और निष्ठा के साथ गुरु की सेवा करनी आवश्यक होती है।

11

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

pūrṇam adaḥ pūrṇam idaṃ pūrṇāt pūrṇam udacyate । pūrṇasya pūrṇam ādāya pūrṇam evāvaśiṣyate ॥

अर्थ

ज्ञान का स्रोत जितना भी साझा किया जाए, वह कम नहीं होता। ज्ञान को बार-बार विकसित, विस्तारित और साझा करने पर भी मूल ज्ञान समाप्त नहीं होता बल्कि नई-नई संभावनाएँ उत्पन्न होती रहती हैं। ज्ञान की पूर्णता से अनन्त नवाचार जन्म लेते हैं।

12

न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः। परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद् यतयो विशन्ति॥

na karmaṇā na prajayā dhanena tyāgenaike amṛtatvam ānaśuḥ । pareṇa nākaṃ nihitaṃ guhāyāṃ vibhrājate yad yatayo viśanti ॥

अर्थ

अमृतत्व केवल कर्म, धन या वंश से प्राप्त नहीं होता बल्कि त्याग और उच्च आदर्शों के प्रति पूर्ण समर्पण से प्राप्त होता है। जो यतिजन राष्ट्र, समाज और सत्य के लिए अपने स्वार्थों का त्याग करते हैं, उनका जीवन, काल की सीमाओं से परे जाकर जनमानस में अमर हो जाता है।