विद्यार्थियों के लिए संस्कृत श्लोक

ये संस्कृत श्लोक शिक्षा को एक सक्रिय साधना के रूप में प्रस्तुत करते हैं। विद्यार्थी जिज्ञासा से सुनता है, विचार करता है, सीखी हुई बात को धारण करता है, गुरु से मार्गदर्शन लेता है और छोटे किंतु नियमित प्रयासों से आगे बढ़ता है।

ये शिक्षाएँ हर आयु के विद्यार्थी के लिए उपयोगी हैं, क्योंकि वे विद्या को केवल अंक या त्वरित परिणाम तक सीमित नहीं करतीं। वे ज्ञान को चरित्र, एकाग्रता, विवेक, विनम्रता और समझ को कर्म में उतारने की क्षमता से जोड़ती हैं।

इस संग्रह का प्रत्येक श्लोक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा X पर साझा किया गया था।

यह चयन अच्छे विद्यार्थी की आदतों से आरम्भ होकर उस धैर्य, विवेक और कर्मशीलता तक जाता है जिससे ज्ञान वास्तविक सामर्थ्य बनता है।

1

यथा खात्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति॥

yathā khātvā khanitreṇa bhūtale vāri vindati । tathā gurugatāṃ vidyāṃ śuśrūṣuradhigacchati ॥

अर्थ

जिस प्रकार धरती से जल निकालने के लिए कठिन परिश्रम करते हुए धैर्यपूर्वक गहराई तक खोदना पड़ता है, उसी प्रकार ज्ञान प्राप्ति के लिए भी श्रद्धा, समर्पण, अनुशासन और निष्ठा के साथ गुरु की सेवा करनी आवश्यक होती है।

2

शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणां तथा। ऊहापोहोऽर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः॥

śuśrūṣā śravaṇaṃ caiva grahaṇaṃ dhāraṇāṃ tathā । ūhāpoho’rthavijñānaṃ tattvajñānaṃ ca dhīguṇāḥ ॥

अर्थ

सुनने की इच्छा, सुनना, ग्रहण करना, धारण करना, तर्क के साथ निर्णय करना, अर्थ-विज्ञान तथा तत्त्वज्ञान - ये सभी बुद्धि के गुण हैं, जो बुद्धिमत्ता के आधार हैं।

3

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥

jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥

अर्थ

जिस प्रकार जल की एक-एक बूँद लगातार गिरने से घड़ा भर जाता है, ठीक उसी प्रकार, निरन्तर थोड़े-थोड़े प्रयास से सभी विद्याएँ, धर्म और धन भी धीरे-धीरे संगृहीत हो जाते हैं।

4

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥

uttiṣṭhata jāgrata prāpya varān nibodhata । kṣurasya dhārā niśitā duratyayā durgaṁ pathas tat kavayo vadanti ॥

अर्थ

उठो, जागो और अपने लक्ष्य को प्राप्त करो। आपके रास्ते कठिन हैं, वे अत्यन्त दुर्गम भी हो सकते हैं, लेकिन विद्वानों का कहना है कि कठिन मार्गों पर चलकर ही सफलता प्राप्त होती है।

5

विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥

vidvān praśasyate loke vidvān sarvatra gauravam । vidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate ॥

अर्थ

विद्वान व्यक्ति की संसार में प्रशंसा होती है और उसे सर्वत्र सम्मान प्राप्त होता है। विद्या के माध्यम से मनुष्य जीवन की समस्त आवश्यक वस्तुएँ और उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता है, अतः विद्या सर्वत्र पूजनीय मानी जाती है।

6

विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिस्तत्परता क्रिया। यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते॥

vidyā vitarko vijñānaṃ smṛtis tatparatā kriyā । yasyaite ṣaḍguṇās tasya nāsādhyam ativartate ॥

अर्थ

विद्या, तर्कशक्ति, विज्ञान, स्मृति-शक्ति, तत्परता और कार्यशीलता, ये छह जिसके पास हैं, उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं।

7

अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च। यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥

anantaśāstraṃ bahulāśca vidyāḥ alpaśca kālo bahuvighnatā ca । yatsārabhūtaṃ tadupāsanīyaṃ haṃso yathā kṣīramivāmbumadhyāt ॥

अर्थ

ज्ञान प्राप्ति के लिए शास्त्र अनेक हैं और विद्याएँ भी बहुत हैं, परंतु समय सीमित है और विघ्न-बाधाएँ भी अनेक हैं। अतः, जैसे हंस जल और दूध के मिश्रण में से केवल दूध ही अलग निकाल लेता है, वैसे ही मनुष्य को भी केवल सार-सर्वस्व को ही ग्रहण करना चाहिए।

8

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः। देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे॥

ā no bhadrāḥ kratavo yantu viśvato'dabdhāso aparītāsa udbhidhaḥ । devā no yathā sadamid vṛdhe asann aprāyuvo rakṣitāro dive dive ॥

अर्थ

हमारे पास चारों दिशाओं से ऐसे शुभ और प्रेरणादायक विचार आएँ जो हमें उत्साह, ऊर्जा और आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान करें। वे विचार अडिग, अविजित और उन्नति के मार्ग को खोलने वाले हों। देवता प्रतिदिन हमारे जीवन में वृद्धि, प्रगति और नवोत्साह का संचार करें तथा हमें हर दिन सुरक्षित रखते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा दें।

9

निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः। अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते॥

niścitya yaḥ prakramate nāntarvasati karmaṇaḥ । avandhyakālo vaśyātmā sa vai paṇḍita ucyate ॥

अर्थ

जो व्यक्ति किसी कार्य को भली-भांति सोच-समझकर दृढ़ निश्चय के साथ आरम्भ करता है और उसे बीच में अधूरा नहीं छोड़ता, जो समय का सदुपयोग करता है तथा अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखता है-ऐसा व्यक्ति ही वास्तव में बुद्धिमान होता है।

10

चरैवेति चरैवेति चरन्वै मधु विन्दति। सूर्यास्य पश्य श्रेमाणं न मामार न जीर्यति॥

caraiveti caraiveti caranvai madhu vindati । sūryāsya paśya śremāṇaṃ na māmāra na jīryati ॥

अर्थ

चलते रहो, आगे बढ़ते रहो, सतत कर्मशील व्यक्ति ही प्रगति का मीठा फल प्राप्त करता है। सूर्य की महानता को देखो, वह बिना थके और बिना क्षीण हुए, संसार को अपनी ऊर्जा से निरंतर प्रकाशित करता है।