शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणां तथा। ऊहापोहोऽर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः॥
śuśrūṣā śravaṇaṃ caiva grahaṇaṃ dhāraṇāṃ tathā । ūhāpoho’rthavijñānaṃ tattvajñānaṃ ca dhīguṇāḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशबुद्धिमत्ता, तर्कशीलता और निर्णय-क्षमता विज्ञान और टेक्नोलॉजी को जन-जन के लिए उपयोगी बनाती हैं। India AI Impact Summit का उद्देश्य भी यही है कि कैसे एआई का इस्तेमाल सर्वजन के हित में हो।
शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं का अर्थ
सुनने की इच्छा, सुनना, ग्रहण करना, धारण करना, तर्क के साथ निर्णय करना, अर्थ-विज्ञान तथा तत्त्वज्ञान - ये सभी बुद्धि के गुण हैं, जो बुद्धिमत्ता के आधार हैं।
शब्दार्थ
- शुश्रूषाśuśrūṣā
सुनने की इच्छा
√श्रु
- श्रवणम्śravaṇam
श्रवण
√श्रु
- च एवcaiva
और
- ग्रहणम्grahaṇam
ग्रहण
√ग्रह्
- धारणाम्dhāraṇām
धारण
√धृ
- तथाtathā
तथा
- ऊहापोहःūhāpohaḥ
तर्क और निराकरण
ऊह + अपोह
- अर्थविज्ञानम्arthavijñānam
अर्थ का ज्ञान
अर्थ + वि + √ज्ञा
- तत्त्वज्ञानम्tattvajñānam
तत्त्वज्ञान
तत्त्व + √ज्ञा
- चca
और
- धीगुणाःdhīguṇāḥ
बुद्धि के गुण हैं
धी + गुण
व्याख्या
यह श्लोक परिपक्व और प्रभावी ‘धी’ अर्थात बुद्धि के आठ गुण बताता है। क्रम ‘शुश्रूषा’, सुनने और सीखने की इच्छा, से आरम्भ होकर ध्यानपूर्वक श्रवण, अर्थग्रहण, धारण, तर्क, भ्रम-निरसन, अर्थबोध और तत्त्वज्ञान तक जाता है। बुद्धिमत्ता को त्वरित चतुराई नहीं, अनुशासित प्रक्रिया माना गया है। पोस्ट में इन मानवीय क्षमताओं को कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीक पर लागू किया गया है। आशय यह है कि तकनीकी प्रणालियाँ तभी जनहितकारी बनती हैं जब उनका निर्माण और उपयोग श्रवण, विवेक, भेदबुद्धि और परिणामों की समझ से निर्देशित हो।
मूल पोस्ट
कामन्दकीय नीतिसार से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥
advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥
महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।
चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्। प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति॥
cakṣuṣā manasā vācā karmaṇā ca caturvidham । prasādayati yo lokaṁ taṁ loko'nuprasīdati ॥
विदुर नीति सिखाती है कि जो व्यक्ति दृष्टि, विचार, वाणी और कर्म से लोगों को प्रसन्न करता है, उसे लोगों का सद्भाव भी प्राप्त होता है।
विद्या पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।