बच्चों के लिए संस्कृत श्लोक

बच्चे उसी श्लोक को याद रखते हैं जो उन्हें कुछ दिखा दे—घड़े को भरती हुई जल की बूँदें, अकेले न बज सकने वाला एक हाथ, राह चलते हर व्यक्ति को छाया देता वृक्ष। यहाँ संगृहीत श्लोक इसी दृष्टि से चुने गए हैं। हर श्लोक छोटा है, हर श्लोक में एक ही स्पष्ट भाव है, और हर श्लोक बोलकर पढ़ने पर सुंदर लगता है।

प्रत्येक श्लोक के पूर्ण पृष्ठ पर उसका हिन्दी और अंग्रेज़ी अर्थ, लिप्यंतरण और प्रमाणित स्रोत दिया गया है, ताकि अभिभावक या शिक्षक उस प्रश्न का उत्तर दे सकें जो सदा पूछा जाता है—यह श्लोक कहाँ से है, और वास्तव में कहता क्या है?

इस संग्रह का प्रत्येक श्लोक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा X पर साझा किया गया था।

पाठ, प्रार्थना सभा और प्रतियोगिता के लिए उपयुक्त श्लोक—दया, परिश्रम, मिलकर चलने और प्रकृति के प्रति स्नेह के भाव, बच्चों की समझ में आने वाली भाषा में।

1

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥

jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥

अर्थ

जिस प्रकार जल की एक-एक बूँद लगातार गिरने से घड़ा भर जाता है, ठीक उसी प्रकार, निरन्तर थोड़े-थोड़े प्रयास से सभी विद्याएँ, धर्म और धन भी धीरे-धीरे संगृहीत हो जाते हैं।

2

यथैकेन न हस्तेन तालिका सम्प्रपद्यते। तथोद्यमपरित्यक्तं न फलं कर्मणः स्मृतम्॥

yathaikena na hastena tālikā samprapadyate । tathodyamaparityaktaṃ na phalaṃ karmaṇaḥ smṛtam ॥

अर्थ

जिस प्रकार एक हाथ से ताली नहीं बजती, उसी प्रकार नवाचार में बिना प्रयास के सफलता संभव नहीं होती। प्रतिभा तभी फलित होती है जब उसे परिश्रम और निरंतर कर्म का साथ मिलता रहे।

3

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥

priyavākyapradānena sarve tuṣyanti jantavaḥ । tasmāt tadeva vaktavyaṁ vacane kā daridratā ॥

अर्थ

मीठी वाणी बोलने से सभी व्यक्ति प्रसन्न और संतुष्ट होते हैं। इसलिए सदैव मधुर वचन ही बोलने चाहिए। जब वाणी हमारे अधीन है और इसका कोई मूल्य भी नहीं देना पड़ता तो फिर मीठे वचन बोलने में दरिद्रता कैसी ?

4

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

ayaṁ nijaḥ paro veti gaṇanā laghucetasām । udāracaritānāṁ tu vasudhaiva kuṭumbakam ॥

अर्थ

उदार और विशाल हृदय वाले लोग संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर समस्त संसार को अपना परिवार मानते हैं। उनके लिए कोई भी पराया नहीं होता, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति अपना ही होता है और यही भावना प्रेम, एकता और सौहार्द का आधार बनती है।

5

छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव॥

chāyāmanyasya kurvanti tiṣṭhanti svayamātape । phalānyapi parārthāya vṛkṣāḥ satpuruṣā iva ॥

अर्थ

वृक्ष स्वयं कड़ी धूप सहते हैं, लेकिन दूसरों को छाया देते हैं। उनके फल भी दूसरों के लिए ही होते हैं। वृक्ष निःस्वार्थ भाव वाले उन सज्जन पुरुषों के समान ही होते हैं, जो सदैव लोगों को सुविधाएं प्रदान करते हैं।

6

अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका। तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥

alpanām api vastūnāṁ saṃhatiḥ kārya-sādhikā । tṛṇair guṇatvam āpannair badhyante mattadantinaḥ ॥

अर्थ

अनेक छोटी-छोटी वस्तुओं को सही ढंग से एक साथ लाने से बड़े काम भी हो सकते हैं, जैसे घास के ढेर से बनाई रस्सियों से उन्मत्त हाथियों को भी बांधा जा सकता है।

7

सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥

saṃ gacchadhvaṃ saṃ vadadhvaṃ saṃ vo manāṃsi jānatām । devā bhāgaṃ yathā pūrve saṃjānānā upāsate ॥

अर्थ

हम सब साथ मिलकर चलें, साथ मिलकर बोलें और हमारे विचारों में समानता हो। जैसे प्राचीन काल में देवता एकमत होकर अपने कर्तव्य का पालन करते थे, वैसे ही हमें भी सदैव एकता और सौहार्द के साथ कार्य करना चाहिए।

8

अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा। अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत्प्रशस्यते॥

adrohaḥ sarvabhūteṣu karmaṇā manasā girā । anugrahaśca dānaṁ ca śīlametatpraśasyate ॥

अर्थ

मन, वचन और कर्म से सभी प्राणियों के प्रति द्वेष न रखना, उन पर दया करना और दान देना - यही श्रेष्ठ आचरण माना गया है।

9

मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥

madhu vātā ṛtāyate madhu kṣaranti sindhavaḥ । mādhvīr naḥ santv oṣadhīḥ ॥

अर्थ

वायु हमारे लिए आनंददायक और कल्याणकारी रूप से प्रवाहित हो, नदियाँ जीवनदायिनी और पोषणकारी जल प्रदान करें तथा औषधियाँ और वनस्पतियाँ समस्त जीव-जगत के लिए आरोग्य और सुख का कारण बनें।

10

पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान्। वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च॥

puṣpitāḥ phalavantaś ca tarpayantīha mānavān । vṛkṣadaṁ putravat vṛkṣās tarayanti paratra ca ॥

अर्थ

जिस तरह समीप रहते हुए फल और फूलों वाले वृक्ष, मनुष्यों को तृप्त करते हैं, उसी तरह वृक्ष दूर रहकर भी वृक्षारोपण करने वाले मनुष्य को सभी प्रकार के लाभप्रदान किया करते हैं।

11

वनानि दहतो वह्नेः सखा भवति मारुतः। स एव दीपनाशाय कृशे कस्यास्ति सौहृदम्॥

vanāni dahato vahneḥ sakhā bhavati mārutaḥ । sa eva dīpanāśāya kṛśe kasyāsti sauhṛdam ॥

अर्थ

जब जंगल में आग लग जाती है तो हवा उसकी सहायिका बनकर आग को फैलने में मदद करती है, लेकिन वही हवा एक छोटे-से दीपक को पलक झपकते ही बुझा देती है। सच ही है, कमजोर व्यक्ति का कोई मित्र नहीं होता! अतः स्वयं सामर्थ्यवान् बनें।

12

स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव। पुनर्ददाताघ्नता जानता सङ्गमेमहि॥

svasti panthām anucarema sūryācandramasāviva । punardadatāghnatā jānatā saṅgamemahi ॥

अर्थ

हम सूर्य और चन्द्रमा के समान निरन्तर शुभ मार्ग पर चलते रहें। हम परस्पर अहिंसा, सद्भाव और ज्ञान के साथ आगे बढ़ें तथा एक-दूसरे के सहयोग से उन्नति और कल्याण की ओर अग्रसर हों।