सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥
saṃ gacchadhvaṃ saṃ vadadhvaṃ saṃ vo manāṃsi jānatām । devā bhāgaṃ yathā pūrve saṃjānānā upāsate ॥
सं गच्छध्वं सं वदध्वं का अर्थ
हम सब साथ मिलकर चलें, साथ मिलकर बोलें और हमारे विचारों में समानता हो। जैसे प्राचीन काल में देवता एकमत होकर अपने कर्तव्य का पालन करते थे, वैसे ही हमें भी सदैव एकता और सौहार्द के साथ कार्य करना चाहिए।
शब्दार्थ
- सम् गच्छध्वम्saṁ gacchadhvam
साथ चलो
सम् + √गम्
- सम् वदध्वम्saṁ vadadhvam
साथ बोलो
सम् + √वद्
- सम् वः मनांसिsaṁ vo manāṁsi
तुम्हारे मन साथ
मनस्
- जानताम्jānatām
जानें
√ज्ञा
- देवाःdevāḥ
देवगण
√दिव्
- भागम्bhāgam
भाग
√भज्
- यथा पूर्वेyathā pūrve
जैसे पूर्वकाल में
पूर्व
- संजानानाःsaṁjānānāḥ
एकमत होकर
सम् + √ज्ञा
- उपासतेupāsate
उपासना करते हैं
उप + √आस्
व्याख्या
ऋग्वेद का यह मंत्र साथ चलने और साथ बोलने से आरम्भ होकर मनों के सामंजस्य तक जाता है। वह इस एकता की तुलना पूर्वकाल के देवताओं से करता है, जो एकमत होकर अपने भाग का ‘उपासते’ करते थे—अर्थात उसके समीप रहते, उसका अनुष्ठान करते या उसकी उपासना करते थे। साथ दिए अर्थ का ‘कर्तव्य का पालन’ सहयोग का एक उपयुक्त अनुप्रयोग है, पर ‘उपासते’ का शाब्दिक अर्थ नहीं। ‘सं गच्छध्वम्’, ‘सं वदध्वम्’ और ‘सं वो मनांसि जानताम्’ समाज को साथ चलने, संवाद करने और विचारों में सामंजस्य बनाने की प्रेरणा देते हैं, बिना यह आवश्यक किए कि सबकी स्वतंत्रता मिटाकर एकरूपता थोपी जाए।
मूल पोस्ट
ऋग्वेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।
तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्। अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥
tantuṃ tanvan rajaso bhānum anv ihi jyotiṣmataḥ patho rakṣa dhiyā kṛtān । anulbaṇaṃ vayata joguvām apo manur bhava janayā daivyaṃ janam ॥
ऋग्वेद का यह मन्त्र बुद्धि से निर्मित ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा और सच्चा मनुष्य बनकर दैवी गुणों से युक्त जन के निर्माण का आह्वान करता है।
एकता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।