समानो मन्त्रः - साझा संकल्प

30 जून 2026

समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्। समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥

samāno mantraḥ samitiḥ samānī samānaṁ manaḥ saha cittameṣām । samānaṁ mantram abhi mantraye vaḥ samānena vo haviṣā juhomi ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

जब हमारे संकल्प, विचार और मन की भावनाएं एक होती हैं, तब हर कार्य सफल होता है। आइए, एकजुटता के साथ आगे बढ़ें और मिलकर भारतवर्ष के हर लक्ष्य को हासिल करें।

समानो मन्त्रः समितिः समानी का अर्थ

हमारे संकल्प समान हों, हमारी सभा एक हो और हमारे हृदय तथा विचारों में पूर्णतः समानता हो। इसी एकता के भाव से मैं आहुति अर्पित करता हूँ, जिससे हम मिलकर कार्य करें और सफलता प्राप्त करें।

शब्दार्थ

समानःsamānaḥ

समान

सम

मन्त्रःmantraḥ

मन्त्र

√मन्

समितिःsamitiḥ

समिति

सम् + √इ

समानीsamānī

समान

सम

समानम् मनःsamānaṁ manaḥ

एक मन

मनस्

सह चित्तम्saha cittam

साथ चित्त

√चित्

एषाम्eṣām

इनका

एतद्

समानम् मन्त्रम्samānaṁ mantram

समान मन्त्र

√मन्

अभि मन्त्रयेabhi mantraye

मैं मन्त्रित करता हूँ

अभि + √मन्

वःvaḥ

तुम सबके लिए

युष्मद्

समानेन हविषाsamānena haviṣā

समान हवि से

√हु

जुहोमिjuhomi

मैं अर्पित करता हूँ

√हु

व्याख्या

यह मंत्र ऋग्वेद के अंतिम सूक्त का अंश है, जहाँ सामूहिक सौहार्द को एक पवित्र अनुशासन के रूप में देखा गया है। 'समानो मन्त्रः' साझा विचार, परामर्श या संकल्प की ओर संकेत करता है; 'समितिः समानी' एकमत और सौहार्दपूर्ण सभा का भाव जगाता है; और 'समानं मनः' मन तथा आंतरिक भावनाओं की एकता की कामना करता है। इसके बाद आहुति का उल्लेख बताता है कि एकता केवल व्यवहारिक सुविधा नहीं, बल्कि श्रद्धा और साझा उद्देश्य से किया गया एक यज्ञ भी है। इसका आशय सभी को एक जैसा बना देना नहीं, बल्कि उद्देश्य और भावना का सामंजस्य है। लोग अलग-अलग क्षमताएँ, भूमिकाएँ और दृष्टियाँ लेकर आ सकते हैं, फिर भी उनका गहरा संकल्प लोककल्याण के लिए एक हो सकता है। प्रधानमंत्री मोदी के संदेश में यही भाव आधुनिक नागरिक संदर्भ में प्रकट होता है कि संकल्प, विचार और मन की भावनाएँ एक हों तो सामूहिक लक्ष्य एकजुट प्रयास से प्राप्त किए जा सकते हैं।

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ऋग्वेद से और सुभाषित

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22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

प्रकृतिकल्याण
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ऋग्वेद

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥

ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।

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27 अग॰ 2026
ऋग्वेद

तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्। अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥

tantuṃ tanvan rajaso bhānum anv ihi jyotiṣmataḥ patho rakṣa dhiyā kṛtān । anulbaṇaṃ vayata joguvām apo manur bhava janayā daivyaṃ janam ॥

ऋग्वेद का यह मन्त्र बुद्धि से निर्मित ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा और सच्चा मनुष्य बनकर दैवी गुणों से युक्त जन के निर्माण का आह्वान करता है।

विद्याकर्तव्यचरित्रआध्यात्मिकता

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2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

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सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

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anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥

विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।

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