सुभाषित संग्रह
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त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया। सम्मोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः॥
tvaṃ vaiṣṇavī śaktiranantavīryā viśvasya bījaṃ paramāsi māyā । sammohitaṃ devi samastametat tvaṃ vai prasannā bhuvi muktihetuḥ ॥
देवी महात्म्यम् का यह श्लोक देवी को विश्व का मूल कारण और अपनी कृपा से मुक्ति देने वाली शक्ति के रूप में स्तुति करता है।
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।
वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥
ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥
भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
यथा यथा प्रयत्नः स्याद्भवेदाशु फलं तथा। इति पौरुषमेवास्ति दैवमस्तु तदेव च॥
yathā yathā prayatnaḥ syād bhaved āśu phalaṃ tathā । iti pauruṣam evāsti daivam astu tad eva ca ॥
योगवासिष्ठ का यह श्लोक फल को मनुष्य के प्रयत्न से जोड़ता है और पुरुषार्थ को ही दैव मानने की शिक्षा देता है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम्। मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते॥
hitāhitaṃ sukhaṃ duḥkham āyus tasya hitāhitam । mānaṃ ca tac ca yatroktam āyurvedaḥ sa ucyate ॥
चरक संहिता आयुर्वेद को हित-अहित, सुख-दुःख, जीवन के अनुकूल-प्रतिकूल तत्त्वों और आयु के मान का ज्ञान बताती है।
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥
महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।
स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।
अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥
anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥
विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।
अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥
advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥
महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥
sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥
अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।
मुदाकरात्तमोदकं सदा विमुक्तिसाधकं कलाधरावतंसकं विलासिलोकरक्षकम्। अनायकैकनायकं विनाशितेभदैत्यकं नताशुभाशुनाशकं नमामि तं विनायकम्॥
mudākarāttamodakaṁ sadā vimuktisādhakaṁ kalādharāvataṁsakaṁ vilāsilokarakṣakam । anāyakaikanāyakaṁ vināśitebhadaityakaṁ natāśubhāśunāśakaṁ namāmi taṁ vināyakam ॥
श्रीविनायक की यह भक्तिपूर्ण स्तुति उन्हें मुक्ति के साधक, जगत् के रक्षक और अशुभ के शीघ्र नाशक के रूप में नमन करती है।
सद्भिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत सङ्गतिम्। सद्भिर्विवादं मैत्रीं च नासद्भिः किञ्चिदाचरेत्॥
sadbhir eva sahāsīta sadbhiḥ kurvīta saṅgatim । sadbhir vivādaṃ maitrīṃ ca nāsadbhiḥ kiṃcid ācaret ॥
गरुड पुराण का यह श्लोक सज्जनों के साथ रहने, संवाद करने और मैत्री रखने की सीख देता है।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥
ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।
उपदिशति लोकवृत्तं वितरति वित्तं विनोदयति चित्तम्। उत्तम्भयति महत्त्वं विद्या हृद्या सुराजसेवेव॥
upadiśati lokavṛttaṁ vitarati vittaṁ vinodayati cittam । uttambhayati mahattvaṁ vidyā hṛdyā surājaseveva ॥
हरिहर विद्या को लोक-व्यवहार, समृद्धि, प्रसन्नता और महत्त्व प्रदान करने वाली बताते हैं।
अणुभ्यश्च महद्भ्यश्च शास्त्रेभ्यः कुशलो नरः। सर्वतः सारमादद्यात् पुष्पेभ्य इव षट्पदः॥
aṇubhyaśca mahadbhyaśca śāstrebhyaḥ kuśalo naraḥ । sarvataḥ sāramādadyāt puṣpebhya iva ṣaṭpadaḥ ॥
श्रीमद्भागवत पुराण का श्लोक: कुशल व्यक्ति छोटे-बड़े हर शास्त्र से सार ग्रहण करे, जैसे भ्रमर अनेक पुष्पों से मधु लेता है।
शं नो वातः पवतां शं नस्तपतु सूर्यः। शं नः कनिक्रदद् देवः पर्जन्योऽभिवर्षतु॥
śaṃ no vātaḥ pavatāṃ śaṃ nas tapatu sūryaḥ । śaṃ naḥ kanikradad devaḥ parjanyo 'bhivarṣatu ॥
शुक्ल यजुर्वेद का यह मन्त्र वायु, सूर्य और वर्षा के देवता पर्जन्य से कल्याणकारी होने की प्रार्थना करता है।
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
vasudevasutaṁ devaṁ kaṁsacāṇūramardanam । devakīparamānandaṁ kṛṣṇaṁ vande jagadgurum ॥
वसुदेव-पुत्र, कंस और चाणूर के संहारक, देवकी के परम आनन्द और जगद्गुरु श्रीकृष्ण की श्रद्धापूर्ण वन्दना।
पात्रविशेषे न्यस्तं गुणान्तरं व्रजति शिल्पमाधातुः। जलमिव समुद्रशुक्तौ मुक्ताफलतां पयोदस्य॥
pātraviśeṣe nyastaṃ guṇāntaraṃ vrajati śilpam ādhātuḥ । jalam iva samudraśuktau muktāphalatāṃ payodasya ॥
कालिदास का यह श्लोक योग्य पात्र में विकसित कौशल की तुलना सीप में मोती बनने वाले मेघजल से करता है।
अभयस्यैव यो दाता तस्यैव सुमहत्फलम् । न हि प्राणसमं दानं त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥
abhayasyaiva yo dātā tasyaiva sumahatphalam । na hi prāṇasamaṃ dānaṃ triṣu lokeṣu vidyate ॥
महाभारत का यह श्लोक अभय देने वाले की प्रशंसा करता है और तीनों लोकों में प्राण के समान किसी दान को नहीं मानता।
यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे। कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
yasya kṛtyaṃ na jānanti mantraṃ vā mantritaṃ pare । kṛtam evāsya jānanti sa vai paṇḍita ucyate ॥
महाभारत का यह श्लोक उसे पण्डित कहता है जिसकी मन्त्रणा और कार्य पूर्ण होने तक दूसरों को ज्ञात नहीं होते।
यद् यदेव प्रसक्तं हि वितर्कयति मानवः। अभ्यासात् तेन तेनास्य नतिर्भवति चेतसः॥
yad yad eva prasaktaṃ hi vitarkayati mānavaḥ । abhyāsāt tena tenāsya natir bhavati cetasaḥ ॥
मनुष्य जिस विषय का बार-बार चिन्तन करता है, उसका चित्त उसी दिशा में झुकने लगता है।
एष प्रभावो रक्षायाः कथितस्ते युधिष्ठिर। जयदः सुखदश्चैव पुत्रारोग्यधनप्रदः॥
eṣa prabhāvo rakṣāyāḥ kathitas te yudhiṣṭhira । jayadaḥ sukhadaś caiva putrārogyadhanapradaḥ ॥
भविष्य महापुराण का यह श्लोक रक्षा सूत्र को जय, सुख, सन्तति, आरोग्य और धन प्रदान करने वाला बताता है।
तन्तुं तन्वन्रजसो भानुमन्विहि ज्योतिष्मतः पथो रक्ष धिया कृतान्। अनुल्बणं वयत जोगुवामपो मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्॥
tantuṃ tanvan rajaso bhānum anv ihi jyotiṣmataḥ patho rakṣa dhiyā kṛtān । anulbaṇaṃ vayata joguvām apo manur bhava janayā daivyaṃ janam ॥
ऋग्वेद का यह मन्त्र बुद्धि से निर्मित ज्योतिर्मय मार्गों की रक्षा और सच्चा मनुष्य बनकर दैवी गुणों से युक्त जन के निर्माण का आह्वान करता है।
ज्ञानवृद्धान्प्रशंसन्तः शुश्रूषन्तः परस्परम्। विनिवृत्ताभिसन्धानाः सुखमेधन्ति सर्वशः॥
jñānavṛddhān praśaṃsantaḥ śuśrūṣantaḥ parasparam । vinivṛttābhisandhānāḥ sukhamedhanti sarvaśaḥ ॥
महाभारत का यह श्लोक ज्ञानवृद्धों के सम्मान, परस्पर सेवा और छिपे स्वार्थ के त्याग को सामूहिक सुख एवं उन्नति का आधार बताता है।
उत्तमैः सह साङ्गत्यं पण्डितैः सह सत्कथाम्। अलुब्धैः सह मित्रत्वं कुर्वाणो नावसीदति॥
uttamaiḥ saha sāṅgatyaṃ paṇḍitaiḥ saha satkathām । alubdhaiḥ saha mitratvaṃ kurvāṇo nāvasīdati ॥
गरुड पुराण का यह श्लोक उत्तम लोगों की संगति, विद्वानों के साथ सत्कथा और निर्लोभी लोगों से मित्रता का महत्त्व बताता है।
कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः। उत्थानेन जयेत्तन्द्रीं वितर्कं निश्चयाज्जयेत्॥
kāruṇyenātmano mānaṃ tṛṣṇāṃ ca paritoṣataḥ । utthānena jayettandrīṃ vitarkaṃ niścayājjayet ॥
महाभारत का यह उपदेश करुणा से मान, सन्तोष से तृष्णा, पुरुषार्थ से आलस्य और निश्चय से वितर्क को जीतने की राह दिखाता है।
जीवनं स्वं परार्थाय नित्यं यच्छत मानवाः। इति सन्देशमाख्यातुं समुद्रं यान्ति निम्नगाः॥
jīvanaṃ svaṃ parārthāya nityaṃ yacchata mānavāḥ । iti sandeśamākhyātuṃ samudraṃ yānti nimnagāḥ ॥
यह संस्कृत सुभाषित मनुष्यों से कहता है कि अपना जीवन दूसरों के हित में दो; समुद्र की ओर बहती नदियाँ यही सन्देश सिखाती हैं।
आपत्काले च कष्टेऽपि नोत्साहस्त्यज्यते बुधैः। इति प्रबोधितस्तेन कथञ्चिद् दृढबुद्धिना॥
āpatkāle ca kaṣṭe’pi notsāhas tyajyate budhaiḥ । iti prabodhitastena kathañcid dṛḍhabuddhinā ॥
कथासरित्सागर का यह अंश सिखाता है कि बुद्धिमान लोग संकट और कठिनाई में भी अपना उत्साह नहीं छोड़ते।
एतावज्जन्मसाफल्यं देहिनामिह देहिषु। प्राणैरर्थैर्धिया वाचा श्रेय एवाचरेत् सदा॥
etāvaj janmasāphalyaṁ dehinām iha dehiṣu । prāṇair arthair dhiyā vācā śreya evācaret sadā ॥
श्रीमद्भागवत पुराण का यह श्लोक कहता है कि जन्म तब सार्थक होता है जब मनुष्य प्राण, धन, बुद्धि और वाणी से सदा दूसरों का कल्याण करे।
उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम्। अप्यपर्वणि भज्येत न नमेदिह कस्यचित्॥
udyacched eva na named udyamo hy eva pauruṣam । apy aparvaṇi bhajyeta na named iha kasyacit ॥
महाभारत का यह श्लोक उद्यम को ही पौरुष बताता है: मनुष्य निरंतर प्रयत्न करे और कभी न झुके, चाहे उसे झुकने के बजाय टूटना ही क्यों न पड़े।
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥
samānī va ākūtiḥ samānā hṛdayāni vaḥ । samānam astu vo mano yathā vaḥ susahāsati ॥
ऋग्वेद का अंतिम मंत्र समान संकल्प, समान हृदय और समान मन की कामना करता है, जिससे सब परस्पर सौहार्द के साथ मिलकर रह सकें।
उद्यमस्य प्रसादेन दृश्यन्ते विविधाः कलाः। कातरा एव जल्पन्ति यद् भाव्यं तद् भविष्यति॥
udyamasya prasādena dṛśyante vividhāḥ kalāḥ । kātarā eva jalpanti yad bhāvyaṁ tad bhaviṣyati ॥
महासुभाषितसंग्रह का यह श्लोक कहता है कि उद्यम से विविध कलाएँ प्रकट होती हैं, जबकि कातर लोग भाग्य की बात भर करते हैं।
दैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्। न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति॥
daivaṁ puruṣakāreṇa yaḥ samarthaḥ prabādhitum । na daivena vipannārthaḥ puruṣaḥ so’vasīdati ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि जो मनुष्य पुरुषार्थ से दैव का सामना करने में समर्थ है, वह विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होता।
चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्। प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति॥
cakṣuṣā manasā vācā karmaṇā ca caturvidham । prasādayati yo lokaṁ taṁ loko'nuprasīdati ॥
विदुर नीति सिखाती है कि जो व्यक्ति दृष्टि, विचार, वाणी और कर्म से लोगों को प्रसन्न करता है, उसे लोगों का सद्भाव भी प्राप्त होता है।
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च। पराक्रमश्च बहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥
aṣṭau guṇāḥ puruṣaṁ dīpayanti prajñā suśīlatva-damau śrutaṁ ca । parākramaś ca bahubhāṣitā ca dānaṁ yathāśakti kṛtajñatā ca ॥
विदुर नीति का यह श्लोक प्रज्ञा, सदाचार, संयम, ज्ञान, पराक्रम, दान और कृतज्ञता के साथ स्थापित पाठ में मितभाषिता को मनुष्य का प्रकाशक गुण बताता है।
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥
bhadraṃ karṇebhiḥ śṛṇuyāma devā bhadraṃ paśyemākṣabhir yajatrāḥ । sthirair aṅgais tuṣṭuvāṃsas tanūbhir vyaśema devahitaṃ yad āyuḥ ॥
ऋग्वेद की यह प्रार्थना शुभ सुनने और देखने, स्थिर अंगों के साथ स्तुति करने तथा देवों द्वारा निर्धारित आयु को पूर्ण करने की कामना करती है।
किं चन्द्रमाः प्रत्युपकारलिप्सया करोति गोभिः कुमुदावबोधनम्। स्वभाव एवोन्नतचेतसां सतां परोपकारव्यसनं हि जीवितम्॥
kiṃ candramāḥ pratyupakāralipsayā karoti gobhiḥ kumudāvabodhanam । svabhāva evonnatacetasāṃ satāṃ paropakāravyasanaṃ hi jīvitam ॥
चन्द्रमा बिना प्रत्युपकार की इच्छा के कुमुदिनी को जगाता है; वैसे ही सज्जनों के लिए परोपकार जीवन का स्वाभाविक भाव है।
विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम्। शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा॥
viśvasvaṃ mātaram oṣadhīnāṃ dhruvāṃ bhūmiṃ pṛthivīṃ dharmaṇā dhṛtām । śivāṃ syonām anu carema viśvahā ॥
धर्म से धारण की गई, औषधियों की माता और मंगलमयी पृथ्वी पर सदा विचरण करने की वैदिक प्रार्थना।
आत्मोदयः परज्यानिर्द्वयं नीतिरितीयती। तदूरीकृत्य कृतिभिर्वाचस्पत्यं प्रतायते॥
ātmodayaḥ parajānir dvayaṁ nītir itīyatī । tadūrīkṛtya kṛtibhir vācaspatyaṁ pratāyate ॥
माघ के शिशुपालवध का यह श्लोक नीति को अपने उत्थान और प्रतिपक्षी की हानि के दो स्पष्ट पक्षों में रखता है।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥
na hi jñānena sadṛśaṁ pavitram iha vidyate । tat svayaṁ yogasaṁsiddhaḥ kālenātmani vindati ॥
ज्ञान से बढ़कर कोई पवित्र करने वाला नहीं; योग से सिद्ध साधक उसे समय आने पर अपने भीतर पाता है।
त्याज्यं न धैर्यं विधुरेऽपि दैवे धैर्यात्कदाचित्स्थितिमाप्नुयात्सः। याते समुद्रेऽपि च पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति कर्म एव॥
tyājyaṁ na dhairyaṁ vidhure'pi daive dhairyāt kadācit sthitim āpnuyāt saḥ । yāte samudre'pi ca potabhaṅge sāṁyātriko vāñchati karma eva ॥
प्रतिकूल भाग्य में भी धैर्य और कर्म मनुष्य को पुनः संभलने की राह देते हैं, जैसे पोत टूटने पर भी समुद्रयात्री प्रयास करता रहता है।
न जातु शौर्यं पुरुषस्य भानुरस्तं गतो भवति कदापि शश्वत्। यथा पुनस्तपति दिवाकरोऽयं तथा पुनर्विक्रमते स वीरः॥
na jātu śauryaṁ puruṣasya bhānurastaṁ gato bhavati kadāpi śaśvat । yathā punastapati divākaro'yaṁ tathā punarvikramate sa vīraḥ ॥
वीर पुरुष का शौर्य कुछ समय के लिए ओझल हो सकता है, पर लौटते सूर्य की तरह वह फिर उदित होकर नए साहस से सक्रिय होता है।
शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु। शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः॥
śaṁ no dyāvāpṛthivī pūrvahūtau śam antarikṣaṁ dṛśaye no astu । śaṁ na oṣadhīr vanino bhavantu śaṁ no rajasas patir astu jiṣṇuḥ ॥
ऋग्वेद का यह मन्त्र द्युलोक, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, औषधियों, वृक्षों और अन्तरिक्ष के विजयशील अधिपति से स्थायी मंगल की प्रार्थना करता है।
प्रेरकः सूचकश्चैव वाचको दर्शकस्तथा। शिक्षकः बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः॥
prerakaḥ sūcakaścaiva vācako darśakastathā । śikṣakaḥ bodhakaścaiva ṣaḍete guravaḥ smṛtāḥ ॥
कुलार्णव तन्त्र गुरु के छह स्वरूप बताता है—प्रेरणा देने वाला, संकेत करने वाला, समझाने वाला, दिखाने वाला, शिक्षा देने वाला और बोध कराने वाला।
लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा। ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥ दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा। श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥
lokapālāśca te sarve vāsavapramukhāstathā । ṛtavaḥ ṣaṭ ca te sarve māsāḥ saṁvatsarāḥ kṣapāḥ ॥ dināni ca muhūrtāśca svasti kurvantu te sadā । śrutiḥ smṛtiśca dharmaśca pātu tvāṁ putra sarvataḥ ॥
अयोध्या काण्ड के इस आशीर्वचन में लोकपालों, कालचक्र, श्रुति-स्मृति और धर्म से निरंतर मंगल तथा सर्वांगीण रक्षा की प्रार्थना की गई है।
शीलवान् पूजितो लोके शीलवान् साधुसम्मतः। शीलवान् सर्वकर्मार्हः शीलवान् प्रियदर्शनः॥
śīlavān pūjito loke śīlavān sādhusammataḥ । śīlavān sarvakarmārhaḥ śīlavān priyadarśanaḥ ॥
भोजदेव के समराङ्गणसूत्रधार का यह श्लोक बताता है कि शीलवान् व्यक्ति समाज में सम्मानित, सज्जनों द्वारा स्वीकृत, प्रत्येक कार्य के योग्य और सबको प्रिय होता है।
कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते। तदेवापहरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत्॥
karmaṇā manasā vācā yadabhīkṣṇaṃ niṣevate । tadevāpaharatyenaṃ tasmātkalyāṇamācaret ॥
विदुर नीति सिखाती है कि कर्म, मन और वाणी से बार-बार जिस विषय का अभ्यास किया जाता है, वही मनुष्य को अपनी दिशा में ले जाता है; इसलिए कल्याणकारी आचरण करना चाहिए।
यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः सर्वानुभूः। यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः सर्वानुभूः॥
yaścāyamasminnākāśe tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣaḥ sarvānubhūḥ । yaścāyamasminnātmani tejomayo'mṛtamayaḥ puruṣaḥ sarvānubhūḥ ॥
बृहदारण्यकोपनिषद् से निर्मित यह संयुक्त पाठ आकाश में स्थित तेजोमय, अमृतमय सत्ता और आत्मा में उपस्थित उसी सत्य की एकता व्यक्त करता है।
परकार्येषु युक्तात्मा स्वकार्यं क्षिप्रसाधनम्। सुहृत्कार्येषु निर्वृत्तौ राजकार्येषु विक्रमः॥
parakāryeṣu yuktātmā svakāryaṁ kṣiprasādhanam । suhṛtkāryeṣu nirvṛttau rājakāryeṣu vikramaḥ ॥
चाणक्य-सार-संग्रह का यह श्लोक परकार्य में निष्ठा, स्वकार्य में तत्परता, मित्रों के कार्य में विश्वसनीयता और राजकार्य में पराक्रम को श्रेष्ठता का लक्षण मानता है।
एकाग्रताथ सङ्कल्पः स्नायुवद् वर्द्धनक्षमौ। नित्याभ्यासप्रयोगाभ्याम् अधिकाधिकमृध्यतः॥
ekāgratātha saṅkalpaḥ snāyuvad varddhanakṣamau । nityābhyāsaprayogābhyām adhikādhikamṛdhyataḥ ॥
एकाग्रता और संकल्प स्थिर गुण नहीं, बल्कि नियमित अभ्यास और सार्थक प्रयोग से स्नायुओं की तरह निरंतर विकसित होने वाली क्षमताएँ हैं।
प्राप्यापदं न व्यथते कदाचिदुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः। दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिताः सपत्नाः॥
prāpyāpadaṁ na vyathate kadācidudyogamanvicchati cāpramattaḥ । duḥkhaṁ ca kāle sahate mahātmā dhurandharastasya jitāḥ sapatnāḥ ॥
विदुर नीति का यह श्लोक संकट में अविचल रहकर सावधानीपूर्वक पुरुषार्थ करने और दुःख सहते हुए विजय पाने की शिक्षा देता है।
प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥
prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥
चाणक्य नीति का यह श्लोक सिखाता है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे सिंह की तरह पूर्ण समर्पण और पूरे प्रयास से करना चाहिए।
देवदेव जगन्नाथ सुरासुरनमस्कृत। पुण्यश्लोकाव्ययानन्त परमात्मन्नमोऽस्तु ते॥
devadeva jagannātha surāsuranamaskṛta । puṇyaślokāvyayānanta paramātman namo’stu te ॥
भगवान जगन्नाथ को देवताओं के भी देव, जगत के स्वामी और सभी हृदयों में स्थित परमात्मा मानकर किया गया भक्तिपूर्ण प्रणाम।
धन्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम्। लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा॥
dhanyānām uttamaṃ dākṣyaṃ dhanānām uttamaṃ śrutam । lābhānāṃ śreya ārogyaṃ sukhānāṃ tuṣṭir uttamā ॥
महाभारत के यक्षप्रश्न का यह श्लोक बताता है कि कौशल, विद्या, आरोग्य और संतोष जीवन की श्रेष्ठ संपदाएँ हैं।
प्रभया हि विनायद्वद्भानुरेष न विद्यते। प्रभा च भानुना तेन सुतरां तदुपाश्रया॥
prabhayā hi vināyadvadbhānureṣa na vidyate । prabhā ca bhānunā tena sutarāṃ tadupāśrayā ॥
यह संस्कृत सुभाषित सूर्य और उसके प्रकाश के माध्यम से अस्तित्व, शक्ति और अभिव्यक्ति की गहरी परस्पर निर्भरता को समझाता है।
कन्यानां सम्प्रदानञ्च कुमाराणाञ्च रक्षणम्। राष्ट्रस्य सङ्ग्रहे नित्यं विधानमिदमाचरेत्॥
kanyānāṃ sampradānañca kumārāṇāñca rakṣaṇam । rāṣṭrasya saṅgrahe nityaṃ vidhānam idam ācaret ॥
मनुस्मृति-आधारित यह शिक्षा कन्याओं के कल्याण, नई पीढ़ी की रक्षा और राष्ट्र की स्थिरता व समृद्धि के लिए सतत प्रबंध को जनप्रतिनिधि का कर्तव्य बताती है।
हितं यत्सर्वभूतानामात्मानश्च सुखावहम्। तत्कुर्यादीश्वरे ह्येतन्मूलं सर्वार्थसिद्धये॥
hitaṃ yat sarvabhūtānām ātmānaśca sukhāvaham । tat kuryād īśvare hy etan mūlaṃ sarvārthasiddhaye ॥
महाभारत का यह श्लोक सिखाता है कि वही कर्म श्रेष्ठ है जो सभी प्राणियों के लिए हितकारी हो, आत्मा को शांति दे और ईश्वर-समर्पण से जुड़ा हो।
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्। अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः॥
anirvedaḥ śriyo mūlam anirvedaḥ paraṁ sukham । anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ ॥
वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड का यह श्लोक बताता है कि निराशा से मुक्त उत्साह, दृढ़ विश्वास और सतत प्रयास ही उन्नति और सफलता का आधार हैं।
चलन्ति गिरयः कामं युगान्तपवनाहताः। कृच्छ्रेऽपि न चलत्येव धीराणां निश्चलं मनः॥
calanti girayaḥ kāmaṃ yugāntapavanāhatāḥ । kṛcchre'pi na calatyeva dhīrāṇāṃ niścalaṃ manaḥ ॥
यह श्लोक धैर्य की शक्ति बताता है: प्रलयकालीन वायु से पर्वत भी हिल सकते हैं, पर धीरों का मन विपत्ति में भी अचल रहता है।
भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैर्नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः। अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥
bhavanti namrāstaravaḥ phalodgamair navāmbubhir dūravilambino ghanāḥ । anuddhatāḥ satpuruṣāḥ samṛddhibhiḥ svabhāva evaiṣa paropakāriṇām ॥
नीतिशतकम् का यह श्लोक फलयुक्त वृक्षों और जलभरे मेघों के माध्यम से बताता है कि सज्जन समृद्धि में और विनम्र हो जाते हैं।
जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः। नास्ति येषां यशःकाये जरामरणजं भयम्॥
jayanti te sukṛtino rasasiddhāḥ kavīśvarāḥ । nāsti yeṣāṃ yaśaḥkāye jarāmaraṇajaṃ bhayam ॥
भर्तृहरि के नीतिशतकम् का यह श्लोक रससिद्ध कवीश्वरों के उस यश की बात करता है जो जरा और मृत्यु से परे है।
वाग्बुद्धिचित्तकरणैश्च तपोभिरुग्रैः शक्यं समाकलयितुं न यदीयरूपम्। तं भक्तिभावसुलभं शरणं नतानां नित्यं भजाम्यमरनाथमहं दयालुम्॥
vāgbuddhicittakaraṇaiś ca tapobhir ugraiḥ śakyaṃ samākalayituṃ na yadīyarūpam । taṃ bhaktibhāvasulabhaṃ śaraṇaṃ natānāṃ nityaṃ bhajāmy amaranātham ahaṃ dayālum ॥
भगवान अमरनाथ की यह भक्तिपूर्ण वंदना बताती है कि वे वाणी, बुद्धि, मन, इन्द्रियों और तप से परे हैं, पर भक्तिभाव से सहज प्राप्त होते हैं।
नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम। पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा चरैवेति॥
nānāśrāntāya śrīr astīti rohita śuśruma । pāpo nṛṣadvaro jana indra ic carataḥ sakhā caraiveti ॥
ऐतरेय ब्राह्मण की चरैवेति परंपरा का यह मंत्र बताता है कि समृद्धि निरंतर प्रयत्न करने वाले को मिलती है, निष्क्रिय रहने वाले को नहीं।
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः। सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥
vijñānasārathir yastu manaḥ pragrahavān naraḥ । so'dhvanaḥ pāram āpnoti tad viṣṇoḥ paramaṁ padam ॥
कठोपनिषद् का यह मंत्र बताता है कि विवेकपूर्ण ज्ञान जब सारथि बनता है और मन संयमित रहता है, तब साधक जीवन-पथ पार कर परम लक्ष्य तक पहुँचता है।
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्। समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि॥
samāno mantraḥ samitiḥ samānī samānaṁ manaḥ saha cittameṣām । samānaṁ mantram abhi mantraye vaḥ samānena vo haviṣā juhomi ॥
ऋग्वेद का यह मंत्र समान संकल्प, सौहार्दपूर्ण सभा, एकचित्त मन और साझा उद्देश्य से मिलकर कार्य करने की प्रेरणा देता है।
देशाचारान् समयाञ्जातिधर्मान् बुभूषते यस्तु परावरज्ञः। स तत्र तत्राधिगतः सदैव महाजनस्याधिपत्यं करोति॥
deśācārān samayāñ jātidharmān bubhūṣate yastu parāvarajñaḥ । sa tatra tatrādhigataḥ sadaiva mahājanasyādhipatyaṁ karoti ॥
विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि स्थानीय आचार, सामाजिक मर्यादाओं और समुदायों की समझ से विश्वास, सम्मान और प्रभाव प्राप्त होता है।
सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥
saṃ gacchadhvaṃ saṃ vadadhvaṃ saṃ vo manāṃsi jānatām । devā bhāgaṃ yathā pūrve saṃjānānā upāsate ॥
ऋग्वेद का यह मंत्र साथ चलने, साथ बोलने और विचारों में सामंजस्य रखते हुए एकता से कर्म करने की प्रेरणा देता है।
स्वातन्त्र्यात् सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम्। स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत् स्वातन्त्र्यात् परमं पदम्॥
svātantryāt sukham āpnoti svātantryāl labhate param । svātantryān nirvṛtiṃ gacchet svātantryāt paramaṃ padam ॥
अष्टावक्र गीता स्वतंत्रता को सुख, शांति, आत्मबोध और परम अवस्था की प्राप्ति का मार्ग बताती है।
यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्यविहीनता। नयविक्रमसंयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम्॥
yatrotsāhasamārambho yatrālasyavihīnatā । nayavikramasaṃyogas tatra śrīr acalā dhruvam ॥
पञ्चतन्त्र का यह श्लोक बताता है कि उत्साह, आलस्यहीनता, नीति और पराक्रम के मेल से समृद्धि स्थिर और चिरस्थायी बनती है।
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः। परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद् यतयो विशन्ति॥
na karmaṇā na prajayā dhanena tyāgenaike amṛtatvam ānaśuḥ । pareṇa nākaṃ nihitaṃ guhāyāṃ vibhrājate yad yatayo viśanti ॥
कैवल्योपनिषद् का यह मंत्र बताता है कि अमरत्व त्याग, निःस्वार्थ समर्पण और उच्च आदर्शों के प्रति निष्ठा से प्राप्त होता है।
चित्तप्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते। प्राणस्पन्दनिरोधो वा द्वेधा योगस्य धारणा॥
cittapraśamanopāyo yoga ity abhidhīyate । prāṇaspandanirodho vā dvedhā yogasya dhāraṇā ॥
योग को मन शांत करने और प्राण की गति को नियंत्रित करने वाली दोहरी साधना के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
शास्त्रे प्रतिष्ठा सहजश्च बोधः प्रागल्भ्यमभ्यस्तगुणा च वाणी। कालानुरोधः प्रतिभानवत्त्वमेते गुणाः कामदुघाः क्रियासु॥
śāstre pratiṣṭhā sahajaśca bodhaḥ prāgalbhyam abhyastaguṇā ca vāṇī । kālānurodhaḥ pratibhānavattvam ete guṇāḥ kāmadughāḥ kriyāsu ॥
भवभूति के मालतीमाधवम् का यह श्लोक उन छह गुणों का वर्णन करता है जो मानव-प्रयास को फलदायी बनाकर लक्ष्य तक पहुंचाते हैं।
सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः कीर्तिस्त्यागानुसारिणी। अभ्याससारिणी विद्या बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥
satyānusāriṇī lakṣmīḥ kīrtis tyāgānusāriṇī । abhyāsasāriṇī vidyā buddhiḥ karmānusāriṇī ॥
यह सुभाषित धन को सत्यनिष्ठा, यश को परोपकार, ज्ञान को अभ्यास और बुद्धि को कर्म से जोड़ता है।
त्वत्सम्भावितमात्मानं बहु मन्यामहे वयम्। प्रायः प्रत्ययमाधत्ते स्वगुणेषूत्तमादरः॥
tvatsambhāvitam ātmānaṃ bahu manyāmahe vayam । prāyaḥ pratyayam ādhatte svaguṇeṣūttamādaraḥ ॥
यह सुभाषित बताता है कि श्रेष्ठ व्यक्तियों से मिला आदर मनुष्य को अपने गुणों के प्रति दृढ़ आत्मविश्वास देता है।
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्। वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥
sahasā vidadhīta na kriyām avivekaḥ paramāpadāṃ padam । vṛṇate hi vimṛśyakāriṇaṃ guṇalubdhāḥ svayameva sampadaḥ ॥
भारवि के किरातार्जुनीयम् का यह श्लोक उतावलेपन से बचने और विवेकपूर्ण निर्णयों द्वारा सफलता व समृद्धि प्राप्त करने की शिक्षा देता है।
पिण्डे पिण्डे मतिर्भिन्ना कुण्डे कुण्डे नवं पयः। जातौ जातौ नवाचाराः नवा वाणी मुखे मुखे॥
piṇḍe piṇḍe matir bhinnā kuṇḍe kuṇḍe navaṃ payaḥ । jātau jātau navācārāḥ navā vāṇī mukhe mukhe ॥
यह सुभाषित बताता है कि विविध समाज में हर मन, समुदाय, आचार और वाणी की अपनी अलग पहचान होती है।
नारी त्रैलोक्यजननी नारी त्रैलोक्यरूपिणी। नारी त्रिभुवनाधारा नारी शक्तिस्वरूपिणी॥
nārī trailokyajananī nārī trailokyarūpiṇī । nārī tribhuvanādhārā nārī śaktisvarūpiṇī ॥
यह श्लोक नारी को तीनों लोकों की जननी, अभिव्यक्ति, आधार और शक्ति के वास्तविक स्वरूप के रूप में नमन करता है।
ते कृषिं च सस्यं च मनुष्या उप जीवन्ति। कृष्टराधिरुपजीवनीयो भवति य एवं वेद॥
te kṛṣiṃ ca sasyaṃ ca manuṣyā upa jīvanti । kṛṣṭarādhir upajīvanīyo bhavati ya evaṃ veda ॥
अथर्ववेद का यह मंत्र कृषि और फसल को मानव जीवन तथा समाज के पोषण का मूल आधार मानता है।
सदानुरक्तप्रकृतिः प्रजापालनतत्परः। विनीतात्मा हि नृपतिर्भूयसी श्रियमश्नुते॥
sadānuraktaprakṛtiḥ prajāpālanatatparaḥ । vinītātmā hi nṛpatir bhūyasī śriyam aśnute ॥
यह सुभाषित बताता है कि जनता के कल्याण, सुरक्षा और उन्नति के लिए विनम्र भाव से समर्पित नेतृत्व ही यश और समृद्धि पाता है।
आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते। हितं च नाभ्यसूयन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
āryakarmaṇi rajyante bhūtikarmāṇi kurvate । hitaṃ ca nābhyasūyanti sa vai paṇḍita ucyate ॥
विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि सच्ची बुद्धिमत्ता श्रेष्ठ कर्मों में रुचि, लोककल्याण के प्रति समर्पण और हितकारी कार्यों के प्रति निष्कपट सम्मान में है।
यावच्चतस्रः प्रदिशश्चक्षुर्यावत् समश्नुते। तावत् समैत्विन्द्रियं मयि तद्धस्तिवर्चसम्॥
yāvac catasraḥ pradiśaś cakṣur yāvat samaśnute । tāvat samaitv indriyaṃ mayi tad dhastivarcasam ॥
अथर्ववेद का यह मंत्र चारों दिशाओं तक फैली समृद्धि, जागरूक दृष्टि और प्रकृति-संतुलन से जुड़े सतत कल्याण की प्रार्थना करता है।
मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥
madhu vātā ṛtāyate madhu kṣaranti sindhavaḥ । mādhvīr naḥ santv oṣadhīḥ ॥
ऋग्वेद का यह मंत्र वायु, नदियों, औषधियों और वनस्पतियों को मधुरता, पोषण, आरोग्य और सामंजस्य के स्रोत के रूप में देखता है।
योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन। योऽपाकरोत् तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥
yogena cittasya padena vācāṃ malaṃ śarīrasya ca vaidyakena । yo'pākarot taṃ pravaraṃ munīnāṃ patañjaliṃ prāñjalir ānato'smi ॥
महर्षि पतञ्जलि को समर्पित यह पारंपरिक मंगलाचरण मन के लिए योग, वाणी के लिए व्याकरण और शरीर के लिए आयुर्वेद की शुद्धिकारक भूमिका बताता है।
धूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च। धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातयो भरतर्षभ॥
dhūmāyante vyapetāni jvalanti sahitāni ca । dhṛtarāṣṭrolmukānīva jñātayo bharatarṣabha ॥
विदुर नीति का यह श्लोक बिखरी और संगठित लकड़ियों के रूपक से बताता है कि सामूहिकता सुप्त शक्ति को प्रकट और प्रभावी बना देती है।
निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः। अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते॥
niścitya yaḥ prakramate nāntarvasati karmaṇaḥ । avandhyakālo vaśyātmā sa vai paṇḍita ucyate ॥
विदुर नीति का यह श्लोक सच्चे बुद्धिमान व्यक्ति को वह मानता है जो विचारपूर्वक कार्य आरम्भ करे, उसे पूरा करे, समय का सदुपयोग करे और आत्म-संयम बनाए रखे।
श्लिष्टा क्रिया कस्यचिदात्मसंस्था सङ्क्रान्तिरन्यस्य विशेषयुक्ता। यस्योभयं साधु स शिक्षकाणां धुरि प्रतिष्ठापयितव्य एव॥
śliṣṭā kriyā kasyacid ātmasaṃsthā saṅkrāntir anyasya viśeṣayuktā । yasyobhayaṃ sādhu sa śikṣakāṇāṃ dhuri pratiṣṭhāpayitavya eva ॥
यह श्लोक उस दुर्लभ शिक्षक की प्रशंसा करता है जिसमें स्वयं निपुण होने की क्षमता और दूसरों तक ज्ञान-कौशल पहुँचाने की योग्यता, दोनों साथ हों।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam adroho nātimānitā । bhavanti sampadaṃ daivīm abhijātasya bhārata ॥
भगवद् गीता का यह श्लोक तेजस्विता, क्षमा, धैर्य, शुचिता, अद्रोह और अहंकाररहित विनम्रता जैसे छह दैवी गुणों का वर्णन करता है।
अनन्तोद्भूतभूतौघसङ्कुले भूतलेऽखिले। शस्त्रे शास्त्रे त्रिचतुराश्चतुरा यदि मादृशाः॥
anantodbhūtabhūtaughasaṅkule bhūtale'khile । śastre śāstre tricaturāś caturā yadi mādṛśāḥ ॥
यह श्लोक उस विरले व्यक्तित्व की वंदना करता है जो शस्त्र (शौर्य) और शास्त्र (ज्ञान) दोनों में समान रूप से निपुण हो।
यो यमर्थं प्रार्थयते तदर्थं चेहते क्रमात्। अवश्यं स तमाप्नोति न चेदर्धान्निवर्तते॥
yo yam arthaṃ prārthayate tadarthaṃ cehate kramāt । avaśyaṃ sa tam āpnoti na ced ardhān nivartate ॥
योगवासिष्ठ का यह श्लोक बताता है कि सच्ची इच्छा, क्रमबद्ध प्रयास और मार्ग से बीच में न लौटने का धैर्य मनुष्य को उसके लक्ष्य तक पहुँचाता है।
आत्मा शुद्धः सदा नित्यः सुखरूपः स्वयम्प्रभः। अज्ञानान्मलिनो भाति ज्ञानाच्छुद्धो भवत्ययम्॥
ātmā śuddhaḥ sadā nityaḥ sukharūpaḥ svayaṃprabhaḥ । ajñānān malino bhāti jñānāc chuddho bhavaty ayam ॥
दर्शनोपनिषद् का यह मंत्र आत्मा के नित्य, शुद्ध और स्वयंप्रकाश स्वरूप को बताते हुए अज्ञान के आवरण को ज्ञान से दूर करने की प्रेरणा देता है।
शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूषसो विभातीः। शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शम्भुः॥
śaṃ no devaḥ savitā trāyamāṇaḥ śaṃ no bhavantūṣaso vibhātīḥ । śaṃ naḥ parjanyo bhavatu prajābhyaḥ śaṃ naḥ kṣetrasya patir astu śambhuḥ ॥
ऋग्वेद का यह मंत्र सविता, उषा, पर्जन्य और क्षेत्रपति से समस्त प्रजा, कृषि और धरती के लिए मंगल, हरियाली और समृद्धि की कामना करता है।
वनस्पते शतवल्शो वि रोह सहस्रवल्शा वि वयं रुहेम। यं त्वामयं स्वधितिस्तेजमानः प्रणिनाय महते सौभगाय॥
vanaspate śatavalśo vi roha sahasravalśā vi vayaṁ ruhema । yaṁ tvāmayaṁ svadhitistejamānaḥ praṇināya mahate saubhagāya ॥
ऋग्वेद का यह मंत्र प्रकृति और मानव के गहरे सह-अस्तित्व को रेखांकित करते हुए वनस्पति के साथ-साथ समाज की प्रगति की कामना करता है।
यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन्। गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु॥
yasyāṁ pūrve pūrvajanā vicakrire yasyāṁ devā asurān abhyavartayan । gavāmaśvānāṁ vayasaś ca viṣṭhā bhagaṁ varcaḥ pṛthivī no dadhātu ॥
अथर्ववेद के भूमि सूक्त का यह ऐतिहासिक मंत्र उस मातृभूमि का आह्वान करता है जो पूर्वजों के महान पुरुषार्थ और दैवी शौर्य की साक्षी रही है, ताकि वह लोक को ऊर्जा और ऐश्वर्य से समृद्ध करे।
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
tasmācchāstraṁ pramāṇaṁ te kāryākāryavyavasthitau । jñātvā śāstravidhānoktaṁ karma kartum ihārhasi ॥
भगवद्गीता का यह ऐतिहासिक श्लोक प्रतिपादित करता है कि कर्तव्य और अकर्तव्य का निर्णय व्यक्तिगत इच्छा के बजाय एक प्रामाणिक और सुव्यवस्थित व्यवस्था पर आधारित होना चाहिए।
जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्। सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती॥
janaṁ bibhratī bahudhā vivācasaṁ nānādharmāṇaṁ pṛthivī yathaukasam । sahasraṁ dhārā draviṇasya me duhāṁ dhruveva dhenuranapasphurantī ॥
भूमि सूक्त का यह मंत्र पृथ्वी को विविध भाषाओं, परंपराओं और आस्थाओं वाले मानव-समुदाय के साझा घर के रूप में प्रणाम करता है।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥
jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥
यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।
यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते। न किञ्चिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः॥
yathāśakti cikīrṣanti yathāśakti ca kurvate । na kiñcidavamanyante narāḥ paṇḍitabuddhayaḥ ॥
विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि सच्ची बुद्धिमत्ता वही है जो यथाशक्ति लक्ष्य निर्धारित करे, अनुशासित कर्म करे और किसी भी बात को तुच्छ न समझे।
विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥
vidvān praśasyate loke vidvān sarvatra gauravam । vidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate ॥
यह श्लोक विद्या और विद्वानों की महिमा का गुणगान करता है। ज्ञान से न केवल सम्मान प्राप्त होता है, बल्कि जीवन की समस्त उपलब्धियाँ भी मिलती हैं।
एवं परस्परापेक्षा शक्तिशक्तिमतोः स्थिता। न शिवेन विना शक्तिर्न शक्त्या विना शिवः॥
evaṁ parasparāpekṣā śaktiśaktimatoḥ sthitā । na śivena vinā śaktirna śaktyā vinā śivaḥ ॥
शक्ति और सामर्थ्य परस्पर पूरक हैं — जैसे शिव के बिना शक्ति नहीं और शक्ति के बिना शिव नहीं, वैसे ही सामर्थ्य और ऊर्जा के समन्वय से ही सृजन, प्रगति और सफलता संभव होती है।
यथा खात्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति॥
yathā khātvā khanitreṇa bhūtale vāri vindati । tathā gurugatāṃ vidyāṃ śuśrūṣuradhigacchati ॥
जिस प्रकार धरती को गहराई तक खोदने पर ही जल मिलता है, उसी प्रकार गुरु में विद्यमान ज्ञान केवल शुश्रूषा — समर्पित सेवा और सच्ची श्रवण-जिज्ञासा — से ही प्राप्त होता है।
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपां रेतांसि जिन्वति॥
agnirmūrdhā divaḥ kakutpatiḥ pṛthivyā ayam । apāṁ retāṁsi jinvati ॥
एक वैदिक मंत्र जो अग्नि को द्युलोक की सर्वोच्च शक्ति और पदार्थ के भीतर ऊर्जा को जागृत करने वाले मूल तत्व के रूप में वर्णित करता है।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥
svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi । dharmyāddhi yuddhācchreyo'nyatkṣatriyasya na vidyate ॥
अर्जुन को दिए गए भगवान श्रीकृष्ण के इस उपदेश में स्पष्ट किया गया है कि एक योद्धा के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है।
उदीर्णमनसो योधा वाहनानि च भारत। यस्यां भवन्ति सेनायां ध्रुवं तस्यां जयं वदेत्॥
udīrṇamanaso yodhā vāhanāni ca bhārata । yasyāṁ bhavanti senāyāṁ dhruvaṁ tasyāṁ jayaṁ vadet ॥
महाभारत से लिया गया यह श्लोक बताता है कि उत्साहित सैनिक और उत्कृष्ट संसाधन ही किसी सेना की जीत को सुनिश्चित करते हैं।
अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा। अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत्प्रशस्यते॥
adrohaḥ sarvabhūteṣu karmaṇā manasā girā । anugrahaśca dānaṁ ca śīlametatpraśasyate ॥
सच्ची मानवता और नैतिक आचरण पर एक मार्गदर्शक सिद्धांत, जो सभी जीवों के प्रति दया, दान और द्वेषहीनता पर जोर देता है।
न तथा बलवीर्याभ्यां जयन्ति विजिगीषवः। यथा सत्यानृशंस्याभ्यां धर्मेणैवोद्यमेन च॥
na tathā balavīryābhyāṁ jayanti vijigīṣavaḥ । yathā satyānṛśaṁsyābhyāṁ dharmeṇaivodyamena ca ॥
यह श्लोक बताता है कि सच्ची और स्थायी विजय केवल शारीरिक बल या पराक्रम से नहीं, बल्कि सत्य, दया, धर्म और उद्यम से प्राप्त होती है।
को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्। को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम्॥
ko hi bhāraḥ samarthānāṁ kiṁ dūraṁ vyavasāyinām । ko videśaḥ suvidyānāṁ kaḥ paraḥ priyavādinām ॥
यह श्लोक बताता है कि कैसे कौशल, परिश्रम, शिक्षा और मधुर वाणी सफलता और अपनेपन की सभी बाधाओं को दूर कर देते हैं।
नान्तर्बहिश्च लोकेषु त्वात्मानं दृष्टवान् क्वचित्। आष्टाङ्गिकेन मार्गेण परमां शान्तिमाययौ॥
nāntar bahiśca lokeṣu tvātmānaṁ dṛṣṭavān kvacit । āṣṭāṅgikena mārgeṇa paramāṁ śāntim āyayau ॥
बौद्ध दृष्टि वाला यह संस्कृत श्लोक स्थायी आत्मा के अभाव की समझ, अष्टांगिक मार्ग और परम शांति की प्राप्ति को जोड़ता है।
अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः। करोति सफलं जन्तोः कर्म यच्च करोति सः॥
anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ । karoti saphalaṁ jantoḥ karma yacca karoti saḥ ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि किस प्रकार उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा किसी भी कार्य को सफल बनाने के लिए आवश्यक हैं।
राज्ञो हि व्रतमुत्थानं यज्ञः कार्यानुशासनम्। दक्षिणा वृत्तिसाम्यं च दीक्षितस्याभिषेचनम्॥
rājño hi vratamutthānaṁ yajñaḥ kāryānuśāsanam । dakṣiṇā vṛttisāmyaṁ ca dīkṣitasyābhiṣecanam ॥
कौटिल्य के अर्थशास्त्र का यह श्लोक एक राजा या जनप्रतिनिधि के सच्चे कर्तव्यों और पवित्र संकल्प का वर्णन करता है।
उत्थानं संयमो दाक्ष्यमप्रमादो धृतिः स्मृतिः। समीक्ष्य च समारम्भो विद्धिमूलं भवस्य तु॥
utthānaṁ saṁyamo dākṣyam apramādo dhṛtiḥ smṛtiḥ । samīkṣya ca samārambho viddhi mūlaṁ bhavasya tu ॥
विदुर नीति का यह श्लोक उन्नति के उन सात आधारभूत स्तंभों का वर्णन करता है जो व्यक्ति और राष्ट्र की समृद्धि के लिए अनिवार्य हैं।
छायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे। फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव॥
chāyāmanyasya kurvanti tiṣṭhanti svayamātape । phalānyapi parārthāya vṛkṣāḥ satpuruṣā iva ॥
यह श्लोक वृक्षों की तुलना सज्जन पुरुषों से करता है, जो स्वयं कष्ट सहकर दूसरों का कल्याण करते हैं।
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं प्रियं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं प्रियम्॥
prajāsukhe sukhaṁ rājñaḥ prajānāṁ ca hite hitam । nātmapriyaṁ priyaṁ rājñaḥ prajānāṁ tu priyaṁ priyam ॥
कौटिल्य के अर्थशास्त्र का यह श्लोक सुशासन के मूल सिद्धांत को परिभाषित करता है: जनता की खुशी में ही नेतृत्व की सार्थकता है।
पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्। नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः॥
padmākaraṁ dinakaro vikacīkaroti candro vikāsayati kairavacakravālam । nābhyarthito jaladharo’pi jalaṁ dadāti santaḥ svayaṁ parahiteṣu kṛtābhiyogāḥ ॥
सूर्य, चन्द्र और मेघों के उदाहरण से यह श्लोक बताता है कि सज्जन व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ या प्रार्थना के दूसरों का भला करते हैं।
यस्यां वृक्षा वानस्पत्या ध्रुवास्तिष्ठन्ति विश्वहा। पृथिवीं धेनुं प्रदुहां न उदिच्छन्तु नमोऽस्तु पृथिव्यै॥
yasyāṃ vṛkṣā vānaspatyā dhruvāstiṣṭhanti viśvahā । pṛthivīṃ dhenuṃ praduhāṃ na udicchantu namo’stu pṛthivyai ॥
अथर्ववेद के भूमि सूक्त से ली गई यह प्रार्थना पृथ्वी माता को समस्त संसाधनों की प्रदाता और जीवन की आधारशिला के रूप में सम्मानित करती है।
शीलं परहितासक्तिः अनुत्सेकः क्षमा धृतिः। अलोभश्चेति विद्यायाः परिपाकोज्ज्वलं फलम्॥
śīlaṁ parahitāsaktiḥ anutsekaḥ kṣamā dhṛtiḥ । alobhaśceti vidyāyāḥ paripākojjvalaṁ phalam ॥
विद्या की पूर्णता केवल ज्ञान संचय में नहीं, बल्कि शील, परोपकार और धैर्य जैसे गुणों के विकास में है। यह श्लोक विद्या के वास्तविक स्वरूप को परिभाषित करता है।
कृषिर्धन्या कृषिर्मेध्या जन्तूनां जीवनं कृषिः। अन्नदः सर्वदश्चैव तस्माच्छ्रेष्ठतरो हि सः॥
kṛṣirdhanyā kṛṣirmedhyā jantūnāṁ jīvanaṁ kṛṣiḥ । annadaḥ sarvadaścaiva tasmācchreṣṭhataro hi saḥ ॥
यह श्लोक कृषि को धन देने वाली और सभी जीवों का आधार बताता है। अन्न देने वाला किसान वास्तव में सबसे श्रेष्ठ है।
देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥
devyā yayā tatam idaṁ jagad ātmaśaktyā niśśeṣa-devagaṇa-śakti-samūha-mūrtyā । tām ambikām akhila-deva-maharṣi-pūjyāṁ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥
देवी महात्म्य का यह मंत्र उस जगदम्बा को नमन करता है जो सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं और समस्त शक्तियों के एकीकृत सामर्थ्य का साक्षात् स्वरूप हैं।
व्युच्छन्ती हि रश्मिभिर्विश्वमाभासि रोचनम्। ता त्वामुषर्वसूयवो गीर्भिः कण्वा अहूषत॥
vyucchantī hi raśmibhir viśvam ābhāsi rocanam । tā tvām uṣar vasūyavo gīrbhiḥ kaṇvā ahūṣata ॥
ऋग्वेद का यह मंत्र नारी शक्ति और ज्ञान की महिमा का वर्णन करता है, जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर सम्पूर्ण विश्व को आलोकित करती है।
इत्थं फलति शुद्धेन सिक्तं सङ्कल्पवारिणा। पुण्यबीजमपि स्वल्पं पुंसां कृषिकृतामिव॥
itthaṁ phalati śuddhena siktaṁ saṅkalpavāriṇā । puṇyabījamapi svalpaṁ puṁsāṁ kṛṣikṛtāmiva ॥
जिस प्रकार किसान द्वारा बोया गया छोटा-सा बीज भरपूर फसल देता है, उसी प्रकार शुद्ध संकल्प के साथ किया गया छोटा-सा प्रयास भी महान सफलता दिलाता है।
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
ayaṁ nijaḥ paro veti gaṇanā laghucetasām । udāracaritānāṁ tu vasudhaiva kuṭumbakam ॥
संकुचित मनुष्य लोगों को अपना और पराया मानता है, जबकि उदार हृदय वाला पूरे विश्व को एक परिवार समझता है।
इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वन्तो विश्वमार्यम्। अपघ्नन्तो अराव्णः॥
indraṁ vardhanto apturaḥ kṛṇvanto viśvamāryam । apaghnanto arāvṇaḥ ॥
ऋग्वेद का यह मंत्र समाज की कल्याणकारी शक्तियों को बढ़ाने और अन्यायपूर्ण शक्तियों का प्रतिरोध कर पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाने का एक ओजस्वी वैदिक आह्वान है।
व्यसने वाऽर्थकृच्छ्रे वा भये वा जीवनान्तके। विमृशन् वै स्वया बुद्ध्या धृतिमान् नावसीदति॥
vyasane vā’rthakṛcchre vā bhaye vā jīvanāntake । vimṛśan vai svayā buddhyā dhṛtimān nāvasīdati ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि आर्थिक संकट या प्राणों के भय की स्थिति में कैसे धैर्य और स्वयं के विवेक द्वारा दुःख और मानसिक अवसाद से बचा जा सकता है।
अन्तःस्थमेव यज्ज्ञानं ज्ञानादपि च यत्परम्। तदेव सर्वसंसारसारं सद्भिरुपास्यते॥
antaḥsthameva yajjñānaṁ jñānādapi ca yatparam । tadeva sarvasaṁsārasāraṁ sadbhirupāsyate ॥
यह श्लोक उस आंतरिक ज्ञान का वर्णन करता है जो बाहरी शिक्षा से परे है और जिसे संपूर्ण संसार का वास्तविक सार माना गया है।
आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता। यमर्था नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
ātmajñānaṁ samārambhas titikṣā dharmanityatā । yam arthā nāpakarṣanti sa vai paṇḍita ucyate ॥
विदुर नीति का यह श्लोक एक बुद्धिमान व्यक्ति के गुणों का वर्णन करता है: आत्मज्ञान, दृढ़ निश्चय, सहनशीलता और प्रलोभनों से ऊपर उठकर जनकल्याण के मार्ग पर अडिग रहना।
लाघवं कर्मसामर्थ्यं दीप्तोऽग्निर्मेदसः क्षयः। विभक्तघनगात्रत्वं व्यायामादुपजायते॥
lāghavaṁ karmasāmarthyaṁ dīpto’gnir medasaḥ kṣayaḥ । vibhaktaghanagātratvaṁ vyāyāmādupajāyate ॥
अष्टाङ्गहृदयम् के अनुसार जानें कि कैसे नियमित व्यायाम शरीर की कार्यक्षमता, चयापचय (Metabolism) और शारीरिक संरचना को बेहतर बनाकर उत्तम स्वास्थ्य का मार्ग प्रशस्त करता है।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादात्तस्य धूर्जटेः। जाह्नवीफेनलेखेव यन्मूर्ध्नि शशिनः कला॥
siddhiḥ sādhye satām astu prasādāt tasya dhūrjaṭeḥ । jāhnavī-phena-lekheva yan-mūrdhni śaśinaḥ kalā ॥
जिन महादेव के मस्तक पर चन्द्रमा की कला गंगा के झाग के समान सुशोभित है, उनकी कृपा से सज्जनों के संकल्प सिद्ध हों।
श्रियः प्रदुग्धे विपदो रुणद्धि यशांसि सूते मलिनं प्रमार्ष्टि। संस्कारशौचेन परं पुनीते शुद्धा हि बुद्धिः किल कामधेनुः॥
śriyaḥ pradugdhe vipado ruṇaddhi yaśāṃsi sūte malinaṃ pramārṣṭi । saṃskāraśauchena paraṃ punīte śuddhā hi buddhiḥ kila kāmadhenuḥ ॥
यह सुभाषित संस्कारित और शुद्ध बुद्धि की शक्ति का गुणगान करता है, और इसकी तुलना कामधेनु से करता है जो सभी इच्छाओं को पूर्ण करती है।
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शिरसा नमामि॥
manojavaṁ mārutatulyavegaṁ jitendriyaṁ buddhimatāṁ variṣṭham । vātātmajaṁ vānarayūthamukhyaṁ śrīrāmadūtaṁ śirasā namāmi ॥
श्री राम के दूत हनुमान जी की यह वंदना उनकी गति, बुद्धि और इंद्रिय संयम की प्रशंसा करती है।
पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः। नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः॥
pibanti nadyaḥ svayameva nāmbhaḥ svayaṃ na khādanti phalāni vṛkṣāḥ । nādanti sasyaṃ khalu vārivāhāḥ paropakārāya satāṃ vibhūtayaḥ ॥
प्रकृति के उदाहरणों — नदियों, वृक्षों और बादलों — के माध्यम से यह सुभाषित परोपकार और निःस्वार्थ जीवन की महत्ता को दर्शाता है।
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्॥
śrūyatāṃ dharmasarvasvaṃ śrutvā caivāvadhāryatām । ātmanaḥ pratikūlāni pareṣāṃ na samācaret ॥
यह सुभाषित धर्म के समस्त सार को एक सुवर्ण नियम में समेटता है — जो व्यवहार अपने लिए अनुचित लगे, वह दूसरों के साथ कभी न करें।
विचित्रचरितोल्लेखचमत्कारितचेतनम्। प्राप्यते किं यशः शुभ्रमनङ्गीकृत्य साहसम्॥
vicitracaritollekhacamatkāritacetanam । prāpyate kiṃ yaśaḥ śubhramanaṅgīkṛtya sāhasam ॥
इस श्लोक में बताया गया है कि उज्ज्वल यश और विलक्षण उपलब्धियाँ केवल साहस को अपनाने से ही प्राप्त होती हैं।
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
siddhagandharvayakṣādyairasurairamarairapi । sevyamānā sadā bhūyāt siddhidā siddhidāyinī ॥
नवदुर्गा के नौवें स्वरूप माँ सिद्धिदात्री की स्तुति, जो सभी सिद्धियों और शक्तियों को प्रदान करने वाली हैं।
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
śvete vṛṣe samārūḍhā śvetāmbaradharā śuciḥ । mahāgaurī śubhaṁ dadyān mahādevapramodadā ॥
नवदुर्गा के आठवें स्वरूप माँ महागौरी की स्तुति, जो पवित्रता और शांति की प्रतीक हैं।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयङ्करी॥
vāmapādollasallohalatākaṇṭakabhūṣaṇā । vardhanmūrdhadhvajā kṛṣṇā kālarātrirbhayaṅkarī ॥
नवदुर्गा स्तोत्र का यह श्लोक माँ कालरात्रि के भयंकर किंतु मंगलकारी स्वरूप का वर्णन करता है, जो अंधकार और भय का नाश करने वाली हैं।
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद् देवी दानवघातिनी॥
candrahāsojjvalakarā śārdūlavaravāhanā । kātyāyanī śubhaṁ dadyād devī dānavaghātinī ॥
चन्द्रहास खड्ग धारण करने वाली और सिंह पर सवार माँ कात्यायनी की वंदना, जो शुभ फल और शक्ति प्रदान करती हैं।
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदाऽस्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
siṁhāsanagatā nityaṁ padmāśritakaradvayā । śubhadā’stu sadā devī skandamātā yaśasvinī ॥
नवरात्रि के पांचवें दिन पूजी जाने वाली माँ स्कन्दमाता की स्तुति, जो वात्सल्य और ममता की प्रतिमूर्ति हैं।
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदाऽस्तु मे॥
surāsampūrṇakalaśaṃ rudhirāplutameva ca । dadhānā hastapadmābhyāṃ kūṣmāṇḍā śubhadā'stu me ॥
ब्रह्मांड की सृजन शक्ति माँ कूष्माण्डा की प्रार्थना, जो अपने हाथों में अमृत कलश धारण करती हैं और भक्तों का कल्याण करती हैं।
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥
piṇḍajapravarārūḍhā caṇḍakopāstrakairyutā । prasādaṁ tanute mahyaṁ candraghaṇṭeti viśrutā ॥
माँ चंद्रघंटा की स्तुति, जो देवी दुर्गा का तीसरा रूप हैं, सिंह पर सवार होकर शांति और कल्याण प्रदान करती हैं।
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
dadhānā karapadmābhyām akṣamālā-kamaṇḍalū । devī prasīdatu mayi brahmacāriṇy-anuttamā ॥
नवरात्रि के दूसरे दिन पूजी जाने वाली माँ ब्रह्मचारिणी का यह श्लोक उनके तपस्वी स्वरूप और अनुशासन की महिमा का गान करता है।
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
vande vāñchitalābhāya candrārdhakṛtaśekharām । vṛṣārūḍhāṃ śūladharāṃ śailaputrīṃ yaśasvinīm ॥
यह श्लोक नवरात्रि के प्रथम दिन पूजी जाने वाली देवी शैलपुत्री की स्तुति है, जो भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं और संयम, शांति तथा शक्ति की प्रतीक हैं।
एकेनापि हि शूरेण पादाक्रान्तं महीतलम्। क्रियते भास्करेणेव स्फारस्फुरिततेजसा॥
ekenāpi hi śūreṇa pādākrāntaṃ mahītalam । kriyate bhāskareṇeva sphārasphuritetejasā ॥
जैसे सूर्य अकेले ही अपने तेज से समस्त पृथ्वी को प्रकाशित करता है, वैसे ही एक सच्चा वीर अकेले अपने साहस से पूरी धरती पर अपना प्रभाव स्थापित कर सकता है।
एकोऽपि सिंहः साहस्रं यूथं मथ्नाति दन्तिनाम्। तस्मात् सिंहमिवोदारमात्मानं वीक्ष्य सम्पतेत्॥
eko'pi siṁhaḥ sāhasraṁ yūthaṁ mathnāti dantinām । tasmāt siṁham ivodāram ātmānaṁ vīkṣya sampatet ॥
जैसे एक अकेला सिंह हाथियों के झुंड पर भारी पड़ता है, वैसे ही साहस और संकल्प से मनुष्य कठिनतम चुनौतियों को पार कर सकता है।
व्यायामाल्लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखम्। आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्॥
vyāyāmāl labhate svāsthyaṁ dīrghāyuṣyaṁ balaṁ sukham । ārogyaṁ paramaṁ bhāgyaṁ svāsthyaṁ sarvārthasādhanam ॥
नियमित व्यायाम स्वास्थ्य, बल, दीर्घायु और अपने दायित्वों को प्रभावी ढंग से निभाने की शारीरिक क्षमता प्रदान करता है।
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः। देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे॥
ā no bhadrāḥ kratavo yantu viśvato'dabdhāso aparītāsa udbhidhaḥ । devā no yathā sadamid vṛdhe asann aprāyuvo rakṣitāro dive dive ॥
ऋग्वेद की यह सार्वभौमिक प्रार्थना हमें चारों दिशाओं से शुभ और प्रेरणादायक विचारों को ग्रहण करने की प्रेरणा देती है।
सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परमं निधानम्॥
satyameva jayati nānṛtaṃ satyena panthā vitato devayānaḥ । yenākramantyṛṣayo hyāptakāmā yatra tatsatyasya paramaṃ nidhānam ॥
मुण्डक उपनिषद घोषित करता है कि सत्य की ही विजय होती है और वही पूर्णकाम ऋषियों के लिए परम सत्य का मार्ग खोलता है।
स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव। पुनर्ददाताघ्नता जानता सङ्गमेमहि॥
svasti panthām anucarema sūryācandramasāviva । punardadatāghnatā jānatā saṅgamemahi ॥
सूर्य और चंद्रमा के समान सदैव कल्याणकारी मार्ग पर चलने और परस्पर सद्भाव के साथ उन्नति की ओर अग्रसर होने का ऋग्वैदिक आह्वान।
यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः। यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः। सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥
yārṇave’dhi salilam agra āsīd yāṁ māyābhir anvacaran manīṣiṇaḥ । yasyā hṛdayaṁ parame vyoman tsatyenāvṛtam amṛtaṁ pṛthivyāḥ । sā no bhūmis tviṣiṁ balaṁ rāṣṭre dadhātūttame ॥
अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त से एक गंभीर प्रार्थना, जो राष्ट्र की शक्ति, तेज और समृद्धि के लिए भूमि का आह्वान करती है।
अभीप्सां स्वात्मनो रक्षाऽविरतं सुस्थिरं तया। यत्नमातिष्ठ धैर्येण ततः सिद्धिर्भवेद् ध्रुवम्॥
abhīpsāṁ svātmano rakṣā’virataṃ susthiraṁ tayā । yatnam ātiṣṭha dhairyeṇa tataḥ siddhir bhaved dhruvam ॥
दृढ़ संकल्प, धैर्यपूर्ण प्रयास और आत्मसंयम श्रेष्ठ अभिलाषा की रक्षा करते हुए उसे सफलता तक पहुँचाते हैं।
यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम्। तत् सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्॥
yad dūraṃ yad durārādhyaṃ yacca dūre vyavasthitam । tat sarvaṃ tapasā sādhyaṃ tapo hi duratikramam ॥
चाणक्य नीति का यह श्लोक बताता है कि "तप" यानी कठिन परिश्रम से हर उस लक्ष्य को पाया जा सकता है जो दूर या असंभव प्रतीत होता है।
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्। सोत्साहस्यास्ति लोकेऽस्मिन् न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥
utsāho balavān ārya nāsty utsāhāt paraṃ balam । sotsāhasyāsti loke’smin na kiñcid api durlabham ॥
उत्साह ही सबसे बड़ा बल है। रामायण का यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि एक उत्साही व्यक्ति के लिए कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं है।
उद्भिन्नस्तबकावतंससुभगाः प्रेङ्खन्मरुन्नर्तिताः पुष्पोद्गीर्णपरागपांशुललसत्पत्रप्रकाण्डत्विषः। गम्भीरक्रमपञ्चमोन्मदपिकध्वानोच्छलद्गीतयः प्रत्युज्जीवितमन्मथोत्सव इव क्रीडन्त्यमू भूरुहाः॥
udbhinnastabakāvataṃsasubhagāḥ preṅkhanmarunnartitāḥ puṣpodgīrṇaparāgapāṃśulalasatpatraprakāṇḍatviṣaḥ । gambhīrakramapañcamonmadapikadhvānocchaladgītayaḥ pratyujjīvitamanmathotsava iva krīḍantyamū bhūruhaḥ ॥
सुभाषितरत्नकोश से लिया गया यह श्लोक वसंत ऋतु में प्रकृति के सौंदर्य और होली के उत्सव जैसा उल्लास प्रकट करता है।
निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम्। तस्माद् व्याघ्रो वनं रक्षेद् वनं व्याघ्रं च पालयेत्॥
nirvano vadhyate vyāghro nirvyāghraṃ chidyate vanam । tasmād vyāghro vanaṃ rakṣed vanaṃ vyāghraṃ ca pālayet ॥
महाभारत का यह श्लोक बाघ और वन के बीच के अन्योन्याश्रित संबंधों को दर्शाता है, जो वन्यजीव संरक्षण की आवश्यकता पर बल देता है।
न वा उ मां वृजने वारयन्ते न पर्वतासो यदहं मनस्ये। मम स्वनात् कृधुकर्णो भयात एवेदनु द्यून्किरणः समेजात्॥
na vā u māṃ vṛjane vārayante na parvatāso yad ahaṃ manasye । mama svanāt kṛdhukarṇo bhayāta eved anu dyūn kiraṇaḥ samejāt ॥
ऋग्वेद का यह मंत्र अदम्य इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास की महिमा का गान करता है, जो बड़े से बड़े पहाड़ों जैसी बाधाओं को भी पार करने में सक्षम है।
न हि शौर्यात्परं किञ्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते। शूरः सर्वं पालयति सर्वं शूरे प्रतिष्ठितम्॥
na hi śauryāt paraṃ kiñcit triṣu lokeṣu vidyate । śūraḥ sarvaṃ pālayati sarvaṃ śūre pratiṣṭhitam ॥
यह श्लोक बताता है कि तीनों लोकों में शौर्य से बढ़कर कुछ नहीं है, और यही वह शक्ति है जो समस्त मर्यादा और व्यवस्था की रक्षा करती है।
धीराः शोकं तरिष्यन्ति लभन्ते सिद्धिमुत्तमाम्। धीरैः सम्प्राप्यते लक्ष्मीर्धैर्यं सर्वत्र साधनम्॥
dhīrāḥ śokaṃ tariṣyanti labhante siddhimuttamām । dhīraiḥ samprāpyate lakṣmīrdhairyaṃ sarvatra sādhanam ॥
धीर व्यक्ति साहस से शोक पार करते, धैर्य से कठिनाइयाँ सहते और निराशा के आगे झुके बिना अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं।
विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्। तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्॥
vipro vṛkṣas tasya mūlaṃ ca sandhyā vedāḥ śākhā dharmakarmāṇi patram । tasmāt mūlaṃ yatnato rakṣaṇīyaṃ chinne mūle naiva śākhā na patram ॥
एक ज्ञानी व्यक्ति की तुलना वृक्ष से करते हुए यह श्लोक नित्य उपासना के महत्त्व को दर्शाता है, जो ज्ञान और कर्म का आधार है।
यथैकेन न हस्तेन तालिका सम्प्रपद्यते। तथोद्यमपरित्यक्तं न फलं कर्मणः स्मृतम्॥
yathaikena na hastena tālikā samprapadyate । tathodyamaparityaktaṃ na phalaṃ karmaṇaḥ smṛtam ॥
जिस प्रकार एक हाथ से ताली नहीं बजती, उसी प्रकार बिना परिश्रम के किसी भी कार्य में सफलता फलित नहीं होती।
अविज्ञातस्य विज्ञानं विज्ञातस्य च निश्चयः। आरम्भः कर्मणां शश्वदारब्धस्यान्तदर्शनम्॥
avijñātasya vijñānaṃ vijñātasya ca niścayaḥ । ārambhaḥ karmaṇāṃ śaśvadārabdhasyāntadarśanam ॥
अज्ञात की खोज, ज्ञात का निश्चय, कार्य का दृढ़ आरंभ और उसे पूर्ण करना ही वास्तविक बुद्धिमत्ता के लक्षण हैं।
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
pūrṇam adaḥ pūrṇam idaṃ pūrṇāt pūrṇam udacyate । pūrṇasya pūrṇam ādāya pūrṇam evāvaśiṣyate ॥
ईशावास्य उपनिषद का यह मंत्र पूर्णता के सिद्धांत को समझाता है। आधुनिक संदर्भ में, यह दर्शाता है कि ज्ञान बाँटने से कम नहीं होता, बल्कि नई संभावनाओं को जन्म देता है।
गोपायितारं दातारं धर्मनित्यमतन्द्रितम्। अकामद्वेषसंयुक्तमनुरज्यन्ति मानवाः॥
gopāyitāraṁ dātāraṁ dharmanityamatandritam । akāmadveṣasaṁyuktam anurajyanti mānavāḥ ॥
आदर्श शासक रक्षा और पोषण करता है, कर्तव्य में स्थिर रहता है और प्रजा के साथ निष्पक्ष तथा संयमित शासन करता है।
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥
jñānaṃ te'haṃ savijñānam idaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ । yajjñātvā neha bhūyo'nyajjñātavyamavaśiṣyate ॥
श्रीकृष्ण ऐसे ज्ञान और अनुभूत बोध का उपदेश देते हैं, जिसके बाद साधक के लिए जानने योग्य कोई आवश्यक सत्य शेष नहीं रहता।
शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणां तथा। ऊहापोहोऽर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः॥
śuśrūṣā śravaṇaṃ caiva grahaṇaṃ dhāraṇāṃ tathā । ūhāpoho’rthavijñānaṃ tattvajñānaṃ ca dhīguṇāḥ ॥
परिपक्व बुद्धि उत्सुकता से सुनती, अर्थ ग्रहण और धारण करती, तर्कपूर्वक विचार करती, भ्रम त्यागती और सत्य पहचानती है।
दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये। विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा॥
dāne tapasi śaurye ca vijñāne vinaye naye । vismayo na hi kartavyo bahuratnā vasundharā ॥
यह संसार इतना विशाल है कि दान, तप, शौर्य, ज्ञान, विनय या नीति में किसी को स्वयं को अद्वितीय नहीं मानना चाहिए।
चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम्। सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति॥
caran vai madhu vindati caran svādum udumbaram । sūryasya paśya śremāṇaṃ yo na tandrayate caraṃś caraiveti ॥
गतिशील रहने और कर्मठता का संदेश देता यह श्लोक बताता है कि सूर्य की तरह निरंतर चलते रहने वाला ही यश प्राप्त करता है।
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥
ūrdhvamūlam adhaḥśākham aśvatthaṃ prāhur avyayam । chandāṃsi yasya parṇāni yas taṃ veda sa vedavit ॥
संसाररूपी अश्वत्थ वृक्ष और वेदों के ज्ञान को समझाता यह गीता का श्लोक अध्यात्म की गहरी समझ प्रदान करता है।
यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः। यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
yasyeme himavanto mahitvā yasya samudraṃ rasayā sahāhuḥ । yasyemāḥ pradiśo yasya bāhū kasmai devāya haviṣā vidhema ॥
राष्ट्र की महिमा का गान करता यह मंत्र हमें देश के प्रति सर्वस्व समर्पण करने की प्रेरणा देता है।
अस्मे वोऽअस्त्विन्द्रियमस्मे नृम्णमुत क्रतुरस्मे वर्चांसि सन्तु वः। नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रै पृथिव्याऽ इयन्ते राड् यन्तासि यमनो ध्रुवोसि धरुणः कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा॥
asme vo'stvindriyam asme nṛmṇam uta kratur asme varcāṃsi santu vaḥ । namo mātre pṛthivyai namo mātre pṛthivyā iyante rāḍ yantāsi yamano dhruvo'si dharuṇaḥ kṛṣyai tvā kṣemāya tvā rayyai tvā poṣāya tvā ॥
यह वैदिक प्रार्थना माता पृथ्वी को कृषि, समृद्धि, पोषण और जीवन को धारण करने वाले साधनों का स्थिर स्रोत मानकर नमन करती है।
विद्या वितर्को विज्ञानं स्मृतिस्तत्परता क्रिया। यस्यैते षड्गुणास्तस्य नासाध्यमतिवर्तते॥
vidyā vitarko vijñānaṃ smṛtis tatparatā kriyā । yasyaite ṣaḍguṇās tasya nāsādhyam ativartate ॥
विद्या, तर्क, विवेकपूर्ण ज्ञान, स्मृति, तत्परता और सक्रिय प्रयास मिलकर व्यक्ति को कठिन कार्य सिद्ध करने का व्यावहारिक सामर्थ्य देते हैं।
उपस्थास्ते अनमीवा अयक्ष्मा अस्मभ्यं सन्तु पृथिवि प्रसूताः। दीर्घं न आयुः प्रतिबुध्यमाना वयं तुभ्यं बलिहृतः स्याम॥
upasthāste anamīvā ayakṣmā asmabhyaṃ santu pṛthivi prasūtāḥ । dīrghaṃ na āyuḥ pratibudhyamānā vayaṃ tubhyaṃ balihṛtaḥ syāma ॥
अथर्ववेद के भूमि सूक्त से ली गई यह प्रार्थना पृथ्वी माता से उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और राष्ट्र सेवा के विवेक की याचना करती है।
विकल्पमात्रावस्थाने वैरूप्यं मनसो भवेत्। पश्चान्मूलक्रियारम्भगम्भीरावर्तदुस्तरः॥
vikalpamātrāvasthāne vairūpyaṃ manaso bhavet । paścānmūlakriyārambhagambhīrāvartadustaraḥ ॥
मत्स्य पुराण का यह श्लोक चेतावनी देता है कि थोड़ा सा भी संशय मन को विकृत कर सकता है और कार्य में दुर्गम बाधाएं उत्पन्न कर सकता है।
औषधेष्वपि सर्वेषु हास्यं श्रेष्ठं वदन्ति ह। स्वाधीनं सुलभं चैवारोग्यानन्दविवर्धनम्॥
auṣadheṣv api sarveṣu hāsyaṃ śreṣṭhaṃ vadanti ha । svādhīnaṃ sulabhaṃ caivārogyānandavivardhanam ॥
यह सुभाषित बताता है कि क्यों हास्य को सभी उपचारों में सर्वोत्तम और सुलभ मार्ग माना गया है।
श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भ्यात् सम्प्रवर्धते। दाक्ष्यात् तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठति॥
śrīrmaṅgalāt prabhavati prāgalbhyāt sampravardhate । dākṣyāt tu kurute mūlaṃ saṃyamāt pratitiṣṭhati ॥
विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि कैसे श्री (लक्ष्मी) शुभ कर्मों से जन्म लेती है और संयम से स्थिर होती है।
नाम्भोधिरर्थितामेति सदाम्भोभिश्च पूर्यते। आत्मा तु पात्रतां नेयः पात्रमायान्ति सम्पदः॥
nāmbhodhir arthitām eti sadāmbhobhiśca pūryate । ātmā tu pātratāṁ neyaḥ pātramāyānti sampadaḥ ॥
यह श्लोक सिखाता है कि वास्तविक समृद्धि बाहरी याचना से नहीं, बल्कि आंतरिक योग्यता और पात्रता से प्राप्त होती है।
अहिंसा परमो धर्मस्तथाऽहिंसा परन्तपः। अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥
ahiṃsā paramo dharmastathā’hiṃsā parantapaḥ । ahiṃsā paramaṃ satyaṃ yato dharmaḥ pravartate ॥
अहिंसा को सत्य में निहित सर्वोच्च धर्म और तप बताया गया है, जो किसी को हानि न पहुँचाने की साधना सिखाती है।
एको बहूनामसि मन्य ईडिता विशं विशं युद्धाय सं शिशाधि। अकृत्तरुक्त्वया युजा वयं द्युमन्तं घोषं विजयाय कृण्मसि॥
eko bahūnāmasi manya īḍitā viśaṃ viśaṃ yuddhāya saṃ śiśādhi । akṛttaruk tvayā yujā vayaṃ dyumantaṃ ghoṣaṃ vijayāya kṛṇmasi ॥
मन्यु सूक्त का यह मंत्र अनुशासित युद्ध-ऊर्जा, सामूहिक साहस और विवेकपूर्ण दिशा में प्राप्त सम्मानजनक विजय का आह्वान करता है।
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति। सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु॥
satyaṁ bṛhad ṛtam ugraṁ dīkṣā tapo brahma yajñaḥ pṛthivīṁ dhārayanti । sā no bhūtasya bhavyasya patny uruṁ lokaṁ pṛthivī naḥ kṛṇotu ॥
पावन भूमि सूक्त का यह मंत्र उन शाश्वत शक्तियों—सत्य, नियम और परिश्रम—का वर्णन करता है जो इस जगत को धारण करती हैं।
शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात् परं सुखम्। न तृष्णायाः परो व्याधिर्न च धर्मो दयापरः॥
śāntitulyaṁ tapo nāsti na santoṣāt paraṁ sukham । na tṛṣṇāyāḥ paro vyādhir na ca dharmo dayāparaḥ ॥
शान्ति सर्वोच्च तप, सन्तोष सबसे बड़ा सुख, तृष्णा सबसे कठिन रोग और दया सबसे महान धर्म है।
एतदेव परं शौर्यं यत् परप्राणरक्षणम्। नहि प्राणहरः शूरः शूरः प्राणप्रदोऽर्थिनाम्॥
etadeva paraṁ śauryaṁ yat paraprāṇarakṣaṇam । nahi prāṇaharaḥ śūraḥ śūraḥ prāṇaprado'rthinām ॥
सच्ची वीरता प्राण लेने में नहीं, बल्कि प्राणों की रक्षा करने में है। यह श्लोक एक सच्चे वीर को संकट में पड़े लोगों को जीवन देने वाले के रूप में परिभाषित करता है।
दशपुत्रसमा कन्या दशपुत्रान् प्रवर्धयन्। यत् फलम् लभते मर्त्यस्तल्लभ्यं कन्ययैकया॥
daśaputrasamā kanyā daśaputrān pravardhayan । yat phalam labhate martyastal labhyaṁ kanyayaikayā ॥
एक कन्या दस पुत्रों के समान होती है, यह श्लोक एक कन्या के पालन-पोषण के पुण्य को समझाता है।
चरैवेति चरैवेति चरन्वै मधु विन्दति। सूर्यास्य पश्य श्रेमाणं न मामार न जीर्यति॥
caraiveti caraiveti caranvai madhu vindati । sūryāsya paśya śremāṇaṃ na māmāra na jīryati ॥
वैदिक उद्घोष ‘चरैवेति’ सूर्य की अविराम गति से प्रेरणा लेकर सतत कर्म को प्रगति का मार्ग बताता है।
अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च। यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥
anantaśāstraṃ bahulāśca vidyāḥ alpaśca kālo bahuvighnatā ca । yatsārabhūtaṃ tadupāsanīyaṃ haṃso yathā kṣīramivāmbumadhyāt ॥
शास्त्र विशाल और जीवन अल्प है, इसलिए विवेकी व्यक्ति हंस की भाँति ज्ञान के सार को चुनकर ग्रहण करता है।
अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च। प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभते चार्थसम्पदम्॥
anutthāne dhruvo nāśaḥ prāptasyānāgatasya ca । prāpyate phalam utthānāl labhate cārthasampadam ॥
निष्क्रियता निश्चित अवनति लाती है, जबकि उद्यम और परिश्रम से ही समृद्धि तथा सार्थक फल प्राप्त होते हैं।
दुर्लभान्यपि कार्याणि सिद्ध्यन्ति प्रोद्यमेन हि। शिलाऽपि तनुतां याति प्रपातेनार्णसो मुहुः॥
durlabhāny api kāryāṇi siddhyanti prodyamena hi । śilā'pi tanutāṁ yāti prapātenārṇaso muhuḥ ॥
निरंतर प्रयास कठिन कार्यों को भी सिद्ध कर देता है, जैसे बार-बार गिरती जलधारा धीरे-धीरे पत्थर को घिस देती है।
अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ता जयन्तु। अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्माँ उ देवा अवता हवेषु॥
asmākam indraḥ samṛteṣu dhvajeṣv asmākaṁ yā iṣavas tā jayantu । asmākaṁ vīrā uttare bhavantv asmā̃ u devā avatā haveṣu ॥
यह वैदिक प्रार्थना संघर्ष में साहस, समुदाय की रक्षा और ऊँचे उठे ध्वजों के नीचे विजय के लिए इन्द्र का आह्वान करती है।
सूर्यो देवो दिवं गच्छेत् मकरस्थो रविः प्रभुः। उत्तरायणे महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥
sūryo devo divaṃ gacchet makarastho raviḥ prabhuḥ । uttarāyaṇe mahāpuṇyaṃ sarvapāpapraṇāśanam ॥
यह भक्तिपूर्ण श्लोक सूर्य की उत्तरायण गति को प्रकाश, शुद्धि, दान और आध्यात्मिक पुण्य से जुड़ा शुभ परिवर्तन मानता है।
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥
uttiṣṭhata jāgrata prāpya varān nibodhata । kṣurasya dhārā niśitā duratyayā durgaṁ pathas tat kavayo vadanti ॥
कठोपनिषद् साधक को उठने, जागने, ज्ञानी गुरु के पास जाने और आत्मबोध के सूक्ष्म तथा कठिन मार्ग पर चलने का आह्वान करता है।
अङ्गणवेदी वसुधा कुल्या जलधिः स्थली च पातालम्। वल्मीकश्च सुमेरुः कृतप्रतिज्ञस्य वीरस्य॥
aṅgaṇavedī vasudhā kulyā jaladhiḥ sthalī ca pātālam । valmīkaśca sumeruḥ kṛtapratijñasya vīrasya ॥
दृढ़ संकल्पी वीर के लिए कुछ भी असंभव नहीं। जानिए कैसे एक मजबूत इच्छाशक्ति बाधाओं को अवसरों में बदल देती है।
आदिनाथेन शर्वेण सर्वप्राणिहिताय वै। आद्यतत्त्वान्यथानीयं क्षेत्रमेतन्महाप्रभम्। प्रभासितं महादेवि यत्र सिद्ध्यन्ति मानवाः॥
ādināthena śarveṇa sarvaprāṇihitāya vai । ādyatattvānyathānīyaṁ kṣetrametanmahāprabham । prabhāsitaṁ mahādevi yatra siddhyanti mānavāḥ ॥
भगवान शिव के आदिनाथ रूप द्वारा जन-कल्याण हेतु प्रकट किया गया प्रभास क्षेत्र, जहाँ दिव्यता और सिद्धि का वास है।
सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्। भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये॥
saurāṣṭradeśe viśade'tiramye jyotirmayaṁ candrakalāvataṁsam । bhaktipradānāya kṛpāvatīrṇaṁ taṁ somanāthaṁ śaraṇaṁ prapadye ॥
सौराष्ट्र की पवित्र भूमि में स्थित, ज्योति स्वरूप भगवान सोमनाथ की वंदना करते हुए यह श्लोक श्रद्धा और शांति का प्रतीक है।
गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम्। सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम्॥
guṇo bhūṣayate rūpaṁ śīlaṁ bhūṣayate kulam । siddhir bhūṣayate vidyāṁ bhogo bhūṣayate dhanam ॥
रूप की शोभा गुणों से है, कुल की सदाचार से, विद्या की सफलता से और धन की शोभा उसके सदुपयोग से है।
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥
priyavākyapradānena sarve tuṣyanti jantavaḥ । tasmāt tadeva vaktavyaṁ vacane kā daridratā ॥
प्रिय और मधुर वचन सभी को प्रसन्न करते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब मधुर वचन बोलने में कुछ खर्च नहीं होता, तो बोलने में कंजूसी क्यों करनी चाहिए?
वनानि दहतो वह्नेः सखा भवति मारुतः। स एव दीपनाशाय कृशे कस्यास्ति सौहृदम्॥
vanāni dahato vahneḥ sakhā bhavati mārutaḥ । sa eva dīpanāśāya kṛśe kasyāsti sauhṛdam ॥
जंगल की आग को हवा बढ़ावा देती है, पर वही हवा दीपक को बुझा देती है। यह श्लोक हमें स्वयं को सामर्थ्यवान बनाने की महत्ता सिखाता है।
उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूतिकर्मसु। भविष्यतीत्येव मनः कृत्वा सततमव्यथैः॥
utthātavyaṃ jāgṛtavyaṃ yoktavyaṃ bhūtikarmasu । bhaviṣyatītyeva manaḥ kṛtvā satatam avyathaiḥ ॥
उठें, जागरूक रहें, विषाद त्यागें और इस विश्वास के साथ कर्म में लगें कि सार्थक प्रयास अवश्य फल दे सकता है।
ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो बलं स्मृतिः। स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिर्धैर्यं मार्दवमेव च॥
jñānaṁ viraktiḥ aiśvaryam śauryaṁ tejo balaṁ smṛtiḥ । svātantryaṁ kauśalaṁ kāntiḥ dhairyaṁ mārdavaṁ eva ca ॥
ज्ञान, वैराग्य, सामर्थ्य, शौर्य, तेज, धैर्य और कोमलता जैसे पूरक गुण मिलकर एक परिपक्व चरित्र का निर्माण करते हैं।
यथा यथा हि पुरुषः कल्याणे कुरुते मनः। तथा तथाऽस्य सर्वार्थाः सिद्ध्यन्ते नात्र संशयः॥
yathā yathā hi puruṣaḥ kalyāṇe kurute manaḥ । tathā tatha'sya sarvārthāḥ siddhyante nātra saṁśayaḥ ॥
मन जितना कल्याणकारी विचारों की ओर मुड़ता है, आचरण और उसके परिणाम उतने ही उस शुभ संकल्प के अनुरूप होने लगते हैं।
सामर्थ्यमूलं स्वातन्त्र्यं श्रममूलं च वैभवम्। न्यायमूलं सुराज्यं स्यात् सङ्घमूलं महाबलम्॥
sāmarthyamūlaṁ svātantryaṁ śramamūlaṁ ca vaibhavam । nyāyamūlaṁ surājyaṁ syāt saṅghamūlaṁ mahābalaṁ ॥
शक्ति स्वतंत्रता का, परिश्रम समृद्धि का, न्याय सुशासन का और संगठित एकता सामूहिक बल का आधार बनती है।
नात्युच्चशिखरो मेरुर्नातिनीचं रसातलम्। व्यवसायद्वितीयानां नात्यपारो महोदधिः॥
na aty ucca śikharaḥ meru na atīnīcaṁ rasātalam । vyavasāya-dvitīyānāṁ na aty-apāro mahodadhiḥ ॥
दृढ़ संकल्प वाले व्यक्ति के लिए न कोई शिखर बहुत ऊँचा है, न सागर बहुत विशाल और न कोई कार्य पुरुषार्थ से परे।
बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः। उभयत्र समो वीरः वीरभावो हि वीरता॥
bandhanaṁ maraṇaṁ vāpi jayo vāpi parājayaḥ । ubhayatra samo vīraḥ vīrabhāvo hi vīratā ॥
बंधन या मृत्यु, विजय या पराजय—हर परिस्थिति में साहस और समभाव बनाए रखना ही सच्ची वीरता है।
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
yad yad ācarati śreṣṭhas tat tad evetaro janaḥ । sa yat pramāṇaṃ kurute lokas tad anuvartate ॥
श्रेष्ठ व्यक्तियों का आचरण और उनके स्थापित मानदंड समाज को दिशा देते हैं, क्योंकि अन्य लोग स्वाभाविक रूप से उनका अनुसरण करते हैं।
यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः। समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते॥
yasya kṛtyaṁ na vighnanti śītamuṣṇaṁ bhayaṁ ratiḥ । samṛddhir asamṛddhir vā sa vai paṇḍita ucyate ॥
सच्चा ज्ञानी सर्दी-गर्मी, भय-इच्छा और संपत्ति-विपत्ति के बीच भी अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होता।
सुवर्ण-रौप्य-माणिक्य-वसनैरपि पूरिताः। तथापि प्रार्थयन्त्येव कृषकान् भक्ततृष्णया॥
suvarṇa-raupya-māṇikya-vasanair api pūritāḥ । tathāpi prārthayanti eva kṛṣakān bhaktatṛṣṇayā ॥
सोना, चाँदी, रत्न और उत्तम वस्त्र अन्न का स्थान नहीं ले सकते; समृद्ध व्यक्ति भी जीवन-निर्वाह के लिए किसान पर निर्भर है।
गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्। वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः॥
gate śokaḥ na kartavyo bhaviṣyaṁ naiva cintayet । vartamānena kālena vartayanti vicakṣaṇāḥ ॥
बुद्धिमान व्यक्ति न बीते हुए का शोक करता है, न आने वाले की चिंता; वह वर्तमान में सजग होकर कर्म करता है।
पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान्। वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च॥
puṣpitāḥ phalavantaś ca tarpayantīha mānavān । vṛkṣadaṁ putravat vṛkṣās tarayanti paratra ca ॥
फल-फूल देने वाले वृक्ष रोपण के बहुत बाद तक दूसरों का कल्याण करते हैं, इसलिए वृक्षारोपण निःस्वार्थ सेवा का स्थायी रूप है।
धर्मो यशो नयो दाक्ष्यम् मनोहारि सुभाषितम्। इत्यादिगुणरत्नानां संग्रहीनावसीदति॥
dharmaḥ yaśo nayaḥ dākṣyam manohāri subhāṣitam । ityādi guṇaratnānāṁ saṅgrahīnāvasīdati ॥
धर्म, यश, नीति, दक्षता और मधुर वाणी से युक्त चरित्र विपरीत परिस्थितियों में भी व्यक्ति को विषाद से बचाता है।
अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका। तृणैर्गुणत्वमापन्नैर्बध्यन्ते मत्तदन्तिनः॥
alpanām api vastūnāṁ saṃhatiḥ kārya-sādhikā । tṛṇair guṇatvam āpannair badhyante mattadantinaḥ ॥
छोटी और दुर्बल वस्तुएँ भी सुव्यवस्थित रूप से जुड़कर महान कार्य कर सकती हैं, जैसे तृणों की रस्सी हाथी को बाँध लेती है।
न मर्षयन्ति चात्मानं सम्भावयितुमात्मना। अदर्शयित्वा शूरास्तु कर्म कुर्वन्ति दुष्करम्॥
na marśayanti cātmānaṁ sambhāvayitum ātmana । adarśayitvā śūrāstu karma kurvanti duṣkaraṁ ॥
सच्चे वीर अपनी महानता का स्वयं बखान नहीं करते; उनके कठिन कर्म और मौन साहस ही उनका मूल्य प्रकट करते हैं।
सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्। एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः॥
sarvaṁ paravaśaṁ duḥkhaṁ sarvam ātmavaśaṁ sukham । etad vidyāt samāsena lakṣaṇaṁ sukha-duḥkhayoḥ ॥
पराधीनता सुख को दूसरों के हाथों में छोड़ देती है, जबकि आत्मवशता वह स्वतंत्रता और स्थिरता देती है जिससे कल्याण बढ़ता है।
क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधो मित्रमुखो रिपुः। क्रोधो ह्यसिर्महातीक्ष्णः सर्वं क्रोधोऽपकर्षति॥
krodhaḥ prāṇaharaḥ śatruḥ krodho mitramukho ripuḥ । krodho hy asir mahātīkṣṇaḥ sarvaṃ krodho ’pakarṣati ॥
क्रोध भीतर बसने वाला ऐसा शत्रु है जो विनाशकारी, दुर्जेय और अंततः उसे धारण करने वाले व्यक्ति के पतन का कारण बनता है।
सुदुर्बलं नावजानाति कञ्चिद् युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम्। न विग्रहं रोचयते बलस्थैः काले च यो विक्रमते स धीरः॥
sudurbalaṃ nāvajānāti kañcid yukto ripuṃ sevate buddhipūrvam । na vigrahaṃ rocayate balasthaiḥ kāle ca yo vikramate sa dhīraḥ ॥
सुदुर्बलं नावजानाति श्लोक के अनुसार सच्चा वीर वही है जो बुद्धि और विवेक से काम लेता है और उचित समय पर ही अपना शौर्य दिखाता है।
आसनेन रुजो हन्ति प्राणायामेन पातकम्। विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण सर्वदा॥ धारणाभिर्मनोधैर्यं याति चैतन्यमद्भुतम्। समाधौ मोक्षमाप्नोति त्यक्त्वा कर्म शुभाशुभम्॥
āsanena rujo hanti prāṇāyāmena pātakam । vikāraṁ mānasaṁ yogī pratyāhāreṇa sarvadā ॥ dhāraṇābhir mano dhairyaṁ yāti caitanyam adbhutam । samādhau mokṣam āpnoti tyaktvā karma śubhāśubham ॥
आसन, प्राणायाम और अनुशासित योगाभ्यास शरीर के रोग और अंतर्मन की अशुद्धि दूर कर साधक को गहन मुक्ति के लिए तैयार करते हैं।