प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक

संस्कृत साहित्य में प्रेरणा का अर्थ बिना परिश्रम सफलता का आश्वासन नहीं है। ये श्लोक उत्साह, दृढ़ संकल्प, धैर्य, सजगता, आत्मसंयम और दूर दिखाई देने वाले लक्ष्य की ओर निरंतर बढ़ते रहने की शक्ति पर बल देते हैं।

यह चयन उन क्षणों के लिए है जब कर्म कठिन लगता है। इसका व्यावहारिक संदेश बार-बार उभरता है—विचारपूर्वक आरम्भ करें, नियमित प्रयास करें, निराशा को स्थान न दें और अभ्यास से अपने सामर्थ्य को बढ़ाएँ।

इस संग्रह का प्रत्येक श्लोक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा X पर साझा किया गया था।

इन श्लोकों को केवल प्रेरक पंक्तियों की तरह नहीं, उनके स्रोत और विस्तृत व्याख्या के साथ पढ़ें और कर्म के प्रति संस्कृत दृष्टि को समझें।

1

उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्। सोत्साहस्यास्ति लोकेऽस्मिन् न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥

utsāho balavān ārya nāsty utsāhāt paraṃ balam । sotsāhasyāsti loke’smin na kiñcid api durlabham ॥

अर्थ

उत्साह ही सबसे बड़ा बल है, वस्तुतः उत्साह से बढ़कर कोई अन्य शक्ति नहीं। इस संसार में उत्साही व्यक्ति के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता।

2

अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः। करोति सफलं जन्तोः कर्म यच्च करोति सः॥

anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ । karoti saphalaṁ jantoḥ karma yacca karoti saḥ ॥

अर्थ

उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा मनुष्य को निरंतर कर्मशील रहने की प्रेरणा देते हैं। यही अटूट उत्साह व्यक्ति के उन सभी प्रयासों को सफलता तक पहुँचाता है, जिन्हें वह पूर्ण करने का संकल्प लेता है।

3

उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूतिकर्मसु। भविष्यतीत्येव मनः कृत्वा सततमव्यथैः॥

utthātavyaṃ jāgṛtavyaṃ yoktavyaṃ bhūtikarmasu । bhaviṣyatītyeva manaḥ kṛtvā satatam avyathaiḥ ॥

अर्थ

सफलता होगी ही, ऐसा मन में दृढ़ विश्वास कर, सतत विषाद-रहित होकर हमें उठना चाहिए, सजग होना चाहिए और ऐश्वर्य को साधने वाले कार्यों में लग जाना चाहिए।

4

चरैवेति चरैवेति चरन्वै मधु विन्दति। सूर्यास्य पश्य श्रेमाणं न मामार न जीर्यति॥

caraiveti caraiveti caranvai madhu vindati । sūryāsya paśya śremāṇaṃ na māmāra na jīryati ॥

अर्थ

चलते रहो, आगे बढ़ते रहो, सतत कर्मशील व्यक्ति ही प्रगति का मीठा फल प्राप्त करता है। सूर्य की महानता को देखो, वह बिना थके और बिना क्षीण हुए, संसार को अपनी ऊर्जा से निरंतर प्रकाशित करता है।

5

नात्युच्चशिखरो मेरुर्नातिनीचं रसातलम्। व्यवसायद्वितीयानां नात्यपारो महोदधिः॥

na aty ucca śikharaḥ meru na atīnīcaṁ rasātalam । vyavasāya-dvitīyānāṁ na aty-apāro mahodadhiḥ ॥

अर्थ

कोई भी शिखर इतना ऊँचा और कोई भी स्थल इतना गहरा नहीं होता कि वहाँ तक पहुँचा न जा सके ! ऐसे ही कोई भी महासागर इतना विशाल नहीं होता कि उसको पार न किया जा सके ! वस्तुतः उद्यमियों या परिश्रमी लोगों के लिए कुछ भी असंभव नहीं।

6

यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम्। तत् सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्॥

yad dūraṃ yad durārādhyaṃ yacca dūre vyavasthitam । tat sarvaṃ tapasā sādhyaṃ tapo hi duratikramam ॥

अर्थ

चाहे लक्ष्य कितना ही दूर, कठिन या पहुँच से बाहर क्यों न लगे, अटल संकल्प और निरंतर परिश्रम से उसे प्राप्त किया जा सकता है। दृढ़ता और धैर्य ही वे शक्तियाँ हैं जो असंभव को संभव बनाती हैं।

7

निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः। अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते॥

niścitya yaḥ prakramate nāntarvasati karmaṇaḥ । avandhyakālo vaśyātmā sa vai paṇḍita ucyate ॥

अर्थ

जो व्यक्ति किसी कार्य को भली-भांति सोच-समझकर दृढ़ निश्चय के साथ आरम्भ करता है और उसे बीच में अधूरा नहीं छोड़ता, जो समय का सदुपयोग करता है तथा अपनी इन्द्रियों पर पूर्ण नियंत्रण रखता है-ऐसा व्यक्ति ही वास्तव में बुद्धिमान होता है।

8

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥

jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥

अर्थ

जिस प्रकार जल की एक-एक बूँद लगातार गिरने से घड़ा भर जाता है, ठीक उसी प्रकार, निरन्तर थोड़े-थोड़े प्रयास से सभी विद्याएँ, धर्म और धन भी धीरे-धीरे संगृहीत हो जाते हैं।

9

व्यसने वाऽर्थकृच्छ्रे वा भये वा जीवनान्तके। विमृशन् वै स्वया बुद्ध्या धृतिमान् नावसीदति॥

vyasane vā’rthakṛcchre vā bhaye vā jīvanāntake । vimṛśan vai svayā buddhyā dhṛtimān nāvasīdati ॥

अर्थ

विपत्ति, आर्थिक संकट या प्राणों के संकट की घड़ी में जो व्यक्ति धैर्य रखकर अपनी बुद्धि से विचार करता है, वह परिस्थिति से टूटता नहीं। संकट की स्थिति में शान्त और विवेकपूर्ण निर्णय ही उसे दुःख और हानि से बचाते हैं।

10

यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्यविहीनता। नयविक्रमसंयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम्॥

yatrotsāhasamārambho yatrālasyavihīnatā । nayavikramasaṃyogas tatra śrīr acalā dhruvam ॥

अर्थ

जहाँ परिश्रम राष्ट्रभक्ति के प्रखर उत्साह से प्रेरित होता है, जहाँ आलस्य से पूर्णतः रहित होकर निरन्तर कर्तव्य किए जाते हैं और जहाँ विनम्रता साहस के साथ सन्तुलित होती है—वहीं त्याग, तप और समर्पण से राष्ट्र की समृद्धि सदा अटल और चिरस्थायी बनी रहती है।