जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः - बूँद-बूँद से संचय

18 मई 2026

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥

jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः का अर्थ

जिस प्रकार जल की एक-एक बूँद लगातार गिरने से घड़ा भर जाता है, ठीक उसी प्रकार, निरन्तर थोड़े-थोड़े प्रयास से सभी विद्याएँ, धर्म और धन भी धीरे-धीरे संगृहीत हो जाते हैं।

शब्दार्थ

जलबिन्दुनिपातेनjalabindunipātena

जल की बूँदों के गिरने से

जल + बिन्दु + नि + √पत्

क्रमशःkramaśaḥ

क्रमशः, धीरे-धीरे

क्रम

पूर्यतेpūryate

भर जाता है

√पॄ

घटःghaṭaḥ

घड़ा

घट

सःsaḥ

वह

तद्

हेतुःhetuḥ

कारण

हेतु

सर्वविद्यानाम्sarvavidyānām

समस्त विद्याओं का

सर्व + विद्या

धर्मस्यdharmasya

धर्म का

धर्म

धनस्यdhanasya

धन का

धन

व्याख्या

यह सुभाषित निरंतरता की महिमा को अत्यंत सहज उपमा के माध्यम से स्पष्ट करता है। घड़ा एक ही बार में नहीं भरता, पर प्रत्येक बूँद उसका स्तर बढ़ाती है। इसी प्रकार विद्या अभ्यास से, धर्म सतत सदाचरण से और धन संयमित परिश्रम से संचित होते हैं। यह श्लोक अधैर्य के स्थान पर क्रमबद्ध प्रयास का संदेश देता है और बताता है कि स्थायी उपलब्धियाँ सामान्यतः छोटे किन्तु नियमित कर्मों से निर्मित होती हैं। दूसरी पंक्ति का सर्वनाम मौन रूप से कार्य कर रहा है: 'स हेतुः' अर्थात् 'वही कारण है'—यह पहले कही गई पूरी प्रक्रिया, बूँदों से घड़े के क्रमशः भरने, को ग्रहण करता है। पुल्लिंग सर्वनाम व्याकरणतः अकेले अव्यय 'क्रमशः' का निर्देश नहीं कर सकता। प्रशंसा किसी एक बूँद की नहीं, क्रमिक प्रक्रिया की है। फिर जिस त्रयी पर इसे लागू किया गया है—विद्या, धर्म और धन—वह चाणक्य के यहाँ बार-बार लौटती है, और तीनों को एक ही पद्धति के अधीन रख देना ही इस श्लोक का वास्तविक कथन है।

मूल पोस्ट

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चाणक्य नीति से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
18 सित॰ 2026
आर्यासप्तशती

स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥

svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥

मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।

चरित्रनिःस्वार्थ सेवास्वतंत्रतासमृद्धि

दृढ़ता पर और सुभाषित

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6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

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