चाणक्य नीति से सुभाषित

चाणक्य नीति के विद्या, पुरुषार्थ, चरित्र, वाणी, संबंध और व्यावहारिक ज्ञान संबंधी श्लोक हिन्दी-अंग्रेज़ी अर्थ सहित पढ़ें।

चाणक्य नीति परंपरागत रूप से चाणक्य से संबद्ध व्यावहारिक नीति-वचनों का संस्कृत संग्रह है। किसी निरंतर कथा या दार्शनिक संवाद के स्थान पर इसमें विद्या, अनुशासन, चरित्र, सावधानी, मैत्री, परिवार, धन, विपत्ति और सामाजिक आचरण पर संक्षिप्त विचार मिलते हैं।

इसके पद्य सीधे और उद्धरणीय हैं, किंतु उन्हें केवल आधुनिक नारों में सीमित नहीं किया जा सकता। बूँद-बूँद से भरता घड़ा, सर्वत्र सम्मानित विद्वान या कुल को सुशोभित करता चरित्र जैसे बिम्ब व्यावहारिक विवेक को स्मरणीय भाषा देते हैं।

स्मरणीय नीति-वचनों में व्यावहारिक ज्ञान

यह ग्रंथ प्रायः परिणामों को समय रहते पहचानने पर बल देता है: आदतें धीरे-धीरे बनती हैं, वाणी संबंधों को आकार देती है, विद्या सामर्थ्य बदलती है और बाहरी प्रदर्शन से अधिक चरित्र का महत्व होता है। कुछ उक्तियाँ जानबूझकर तीखी हैं और अपने साहित्यिक युग की सामाजिक तथा राजनीतिक धारणाओं को व्यक्त करती हैं।

उन्हें अच्छी तरह पढ़ने के लिए मूल शिक्षा पर ध्यान देने के साथ आज उसके प्रयोग पर विवेक भी आवश्यक है। प्रत्येक श्लोक की व्याख्या स्थायी सिद्धांत और उसके ऐतिहासिक अभिव्यक्ति-रूप के बीच अंतर समझने में सहायता करती है।

संबंधित स्रोत-परंपरा देखें

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सुभाषित क्या है?
सुभाषित सुन्दर और सार्थक ढंग से कही गई स्मरणीय संस्कृत उक्ति है—प्रायः ऐसा स्वतंत्र पद्य जो ज्ञान, सलाह, अनुभव या किसी पूर्ण विचार को व्यक्त करता है।
अर्थ सहित संस्कृत श्लोक
संस्कृत ज्ञान का विचारपूर्वक चुना गया परिचय—देवनागरी पाठ, IAST लिप्यंतरण, हिन्दी-अंग्रेज़ी अर्थ, स्रोत और विस्तृत व्याख्या सहित।
प्रेरणादायक संस्कृत श्लोक
उत्साह, साहस, अनुशासन, धैर्य और निरंतर पुरुषार्थ पर संस्कृत श्लोक—अर्थ और व्यावहारिक संदर्भ सहित।
विद्यार्थियों के लिए संस्कृत श्लोक
विद्या, ध्यानपूर्वक श्रवण, गुरु, तर्क, स्मृति, अनुशासन और क्रमिक प्रगति पर विद्यार्थियों के लिए श्लोक।

इस संग्रह में चाणक्य नीति के श्लोक

चुने गए पद्य विद्या, अनुशासित पुरुषार्थ, शांति, सामर्थ्य, मधुर वाणी और चरित्र-निर्माण पर विशेष बल देते हैं।

नवीनतम अद्यतन: 17 जुल॰ 2026

17 जुल॰ 2026
चाणक्य नीति

प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥

prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥

चाणक्य नीति का यह श्लोक सिखाता है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे सिंह की तरह पूर्ण समर्पण और पूरे प्रयास से करना चाहिए।

ज्ञानअनुशासनदृढ़ता
18 मई 2026
चाणक्य नीति

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥

jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥

यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।

दृढ़ताविद्याधर्मसमृद्धिअनुशासन
14 मई 2026
चाणक्य नीति

विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥

vidvān praśasyate loke vidvān sarvatra gauravam । vidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate ॥

यह श्लोक विद्या और विद्वानों की महिमा का गुणगान करता है। ज्ञान से न केवल सम्मान प्राप्त होता है, बल्कि जीवन की समस्त उपलब्धियाँ भी मिलती हैं।

विद्याशिक्षासम्मान
12 मई 2026
चाणक्य नीति

यथा खात्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति॥

yathā khātvā khanitreṇa bhūtale vāri vindati । tathā gurugatāṃ vidyāṃ śuśrūṣuradhigacchati ॥

जिस प्रकार धरती को गहराई तक खोदने पर ही जल मिलता है, उसी प्रकार गुरु में विद्यमान ज्ञान केवल शुश्रूषा — समर्पित सेवा और सच्ची श्रवण-जिज्ञासा — से ही प्राप्त होता है।

शिक्षामार्गदर्शनविद्याअनुशासन
4 मई 2026
चाणक्य नीति

को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्। को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम्॥

ko hi bhāraḥ samarthānāṁ kiṁ dūraṁ vyavasāyinām । ko videśaḥ suvidyānāṁ kaḥ paraḥ priyavādinām ॥

यह श्लोक बताता है कि कैसे कौशल, परिश्रम, शिक्षा और मधुर वाणी सफलता और अपनेपन की सभी बाधाओं को दूर कर देते हैं।

सामर्थ्यशिक्षादृढ़ताचरित्र
6 मार्च 2026
चाणक्य नीति

यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम्। तत् सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्॥

yad dūraṃ yad durārādhyaṃ yacca dūre vyavasthitam । tat sarvaṃ tapasā sādhyaṃ tapo hi duratikramam ॥

चाणक्य नीति का यह श्लोक बताता है कि "तप" यानी कठिन परिश्रम से हर उस लक्ष्य को पाया जा सकता है जो दूर या असंभव प्रतीत होता है।

दृढ़ताअनुशासनसफलता
25 फ़र॰ 2026
चाणक्य नीति

विप्रो वृक्षस्तस्य मूलं च सन्ध्या वेदाः शाखा धर्मकर्माणि पत्रम्। तस्मान्मूलं यत्नतो रक्षणीयं छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्॥

vipro vṛkṣas tasya mūlaṃ ca sandhyā vedāḥ śākhā dharmakarmāṇi patram । tasmāt mūlaṃ yatnato rakṣaṇīyaṃ chinne mūle naiva śākhā na patram ॥

एक ज्ञानी व्यक्ति की तुलना वृक्ष से करते हुए यह श्लोक नित्य उपासना के महत्त्व को दर्शाता है, जो ज्ञान और कर्म का आधार है।

विद्याधर्मकर्तव्यआध्यात्मिकता
16 फ़र॰ 2026
चाणक्य नीति

दाने तपसि शौर्ये च विज्ञाने विनये नये। विस्मयो न हि कर्तव्यो बहुरत्ना वसुन्धरा॥

dāne tapasi śaurye ca vijñāne vinaye naye । vismayo na hi kartavyo bahuratnā vasundharā ॥

यह संसार इतना विशाल है कि दान, तप, शौर्य, ज्ञान, विनय या नीति में किसी को स्वयं को अद्वितीय नहीं मानना चाहिए।

ज्ञानधर्मविद्यासाहसविनम्रता
27 जन॰ 2026
चाणक्य नीति

शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात् परं सुखम्। न तृष्णायाः परो व्याधिर्न च धर्मो दयापरः॥

śāntitulyaṁ tapo nāsti na santoṣāt paraṁ sukham । na tṛṣṇāyāḥ paro vyādhir na ca dharmo dayāparaḥ ॥

शान्ति सर्वोच्च तप, सन्तोष सबसे बड़ा सुख, तृष्णा सबसे कठिन रोग और दया सबसे महान धर्म है।

शांतिधर्मकल्याणचरित्र
20 जन॰ 2026
चाणक्य नीति

अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च। यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥

anantaśāstraṃ bahulāśca vidyāḥ alpaśca kālo bahuvighnatā ca । yatsārabhūtaṃ tadupāsanīyaṃ haṃso yathā kṣīramivāmbumadhyāt ॥

शास्त्र विशाल और जीवन अल्प है, इसलिए विवेकी व्यक्ति हंस की भाँति ज्ञान के सार को चुनकर ग्रहण करता है।

ज्ञानविद्या
7 जन॰ 2026
चाणक्य नीति

गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम्। सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम्॥

guṇo bhūṣayate rūpaṁ śīlaṁ bhūṣayate kulam । siddhir bhūṣayate vidyāṁ bhogo bhūṣayate dhanam ॥

रूप की शोभा गुणों से है, कुल की सदाचार से, विद्या की सफलता से और धन की शोभा उसके सदुपयोग से है।

चरित्रविद्यासमृद्धि
6 जन॰ 2026
चाणक्य नीति

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥

priyavākyapradānena sarve tuṣyanti jantavaḥ । tasmāt tadeva vaktavyaṁ vacane kā daridratā ॥

प्रिय और मधुर वचन सभी को प्रसन्न करते हैं। यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब मधुर वचन बोलने में कुछ खर्च नहीं होता, तो बोलने में कंजूसी क्यों करनी चाहिए?

नैतिकताचरित्रसामंजस्य
22 दिस॰ 2025
चाणक्य नीति

गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्। वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः॥

gate śokaḥ na kartavyo bhaviṣyaṁ naiva cintayet । vartamānena kālena vartayanti vicakṣaṇāḥ ॥

बुद्धिमान व्यक्ति न बीते हुए का शोक करता है, न आने वाले की चिंता; वह वर्तमान में सजग होकर कर्म करता है।

ज्ञानशांतिअनुशासन