गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम्। सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम्॥
guṇo bhūṣayate rūpaṁ śīlaṁ bhūṣayate kulam । siddhir bhūṣayate vidyāṁ bhogo bhūṣayate dhanam ॥
गुणो भूषयते रूपं शीलं का अर्थ
गुणों से सुन्दरता में चार चांद लग जाते हैं, आचरण से कुल की प्रतिष्ठा बढ़ती है, सिद्धि से विद्या की शोभा बढ़ती है और धन का मूल्य उसके सदुपयोग से बढ़ता है।
शब्दार्थ
- गुणःguṇaḥ
गुण
गुण
- भूषयतेbhūṣayate
शोभित करता है
√भूष्
- रूपम्rūpam
रूप को
रूप
- शीलम्śīlam
शील
शील
- कुलम्kulam
कुल को
कुल
- सिद्धिःsiddhiḥ
सिद्धि
√सिध्
- विद्याम्vidyām
विद्या को
√विद्
- भोगःbhogaḥ
भोग, उपयोग
√भुज्
- धनम्dhanam
धन को
धन
व्याख्या
श्लोक ‘भूषयते’, अर्थात सुशोभित करता है, की पुनरावृत्ति द्वारा किसी वस्तु के होने और उसके सार्थक होने का अंतर बताता है। रूप को गुण, कुल को शील, विद्या को सिद्धि और धन को भोग अथवा उपयोग शोभा देता है। इन बाहरी उपलब्धियों का निषेध नहीं किया गया; चरित्र और कर्म ही उन्हें उद्देश्य प्रदान करते हैं। यह रचना सफलता की एक सरल कसौटी देती है—केवल यह न देखें कि व्यक्ति के पास क्या है, बल्कि यह भी देखें कि उससे क्या संभव होता है। रूप, वंश, शिक्षा और संपत्ति तभी सम्माननीय बनते हैं जब वे सदाचरण, दक्षता और लोकहित में बदलें। एक ही क्रिया की पुनरावृत्ति चारों युग्मों को समान बल देती है; वह कोई निश्चित आन्तरिक-से-बाहरी सोपान नहीं बनाती। अन्तिम वाक्य 'भोगो भूषयते धनम्' कहता है कि भोग अथवा उपयोग धन को शोभित करता है; 'सदुपयोग' और धन के गतिशील होने की कसौटी उचित व्यावहारिक विस्तार हैं, शाब्दिक पाठ नहीं।
मूल पोस्ट
चाणक्य नीति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंप्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥
prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥
चाणक्य नीति का यह श्लोक सिखाता है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे सिंह की तरह पूर्ण समर्पण और पूरे प्रयास से करना चाहिए।
जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥
jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥
यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।
विद्वान् प्रशस्यते लोके विद्वान् सर्वत्र गौरवम्। विद्यया लभते सर्वं विद्या सर्वत्र पूज्यते॥
vidvān praśasyate loke vidvān sarvatra gauravam । vidyayā labhate sarvaṃ vidyā sarvatra pūjyate ॥
यह श्लोक विद्या और विद्वानों की महिमा का गुणगान करता है। ज्ञान से न केवल सम्मान प्राप्त होता है, बल्कि जीवन की समस्त उपलब्धियाँ भी मिलती हैं।
चरित्र पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।