सौराष्ट्रदेशे विशदे - श्री सोमनाथ महादेव की शरण

8 जन॰ 2026

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम्। भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्णं तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये॥

saurāṣṭradeśe viśade'tiramye jyotirmayaṁ candrakalāvataṁsam । bhaktipradānāya kṛpāvatīrṇaṁ taṁ somanāthaṁ śaraṇaṁ prapadye ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

श्री सोमनाथ महादेव की कृपा और आशीर्वाद से सबका कल्याण हो।

सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं का अर्थ

अत्यंत रमणीय और निर्मल सौराष्ट्र क्षेत्र में, जो ज्योतिर्मय हैं और जिनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है, जो भक्तों को भक्ति प्रदान करने के लिए दयापूर्वक अवतीर्ण हुए हैं, उन भगवान् श्रीसोमनाथ को प्रणाम करता हूँ।

शब्दार्थ

सौराष्ट्रदेशेsaurāṣṭradeśe

सौराष्ट्र देश में

सौराष्ट्र + देश

विशदेviśade

निर्मल

विशद

अतिरम्येatiramye

अत्यन्त रमणीय

अति + √रम्

ज्योतिर्मयम्jyotirmayam

ज्योतिर्मय

ज्योतिस्

चन्द्रकलावतंसम्candrakalāvataṁsam

चन्द्रकला को आभूषण की भाँति धारण किए

चन्द्र + कला + अवतंस

भक्तिप्रदानायbhaktipradānāya

भक्ति प्रदान करने के लिए

भक्ति + प्र + √दा

कृपावतीर्णम्kṛpāvatīrṇam

कृपा से अवतरित

कृपा + अव + √तॄ

तम्tam

उन

तद्

सोमनाथम्somanātham

सोमनाथ की

सोम + नाथ

शरणम्śaraṇam

शरण

√शृ

प्रपद्येprapadye

मैं ग्रहण करता हूँ

प्र + √पद्

व्याख्या

द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का यह आरम्भिक पद सोमनाथ को सौराष्ट्र की सुंदर और पवित्र भूमि में स्थित बताता है। ‘ज्योतिर्मय’ शिव के दिव्य प्रकाशमय स्वरूप को और ‘चन्द्रकलावतंस’ उनके मस्तक पर सुशोभित चन्द्रकला को व्यक्त करता है। वक्ता केवल इस रूप की प्रशंसा नहीं करता, बल्कि भक्ति प्रदान करने वाले करुणामय प्रभु की शरण ग्रहण करता है। यहाँ प्रकाश आध्यात्मिक दिशा बन जाता है—स्पष्टता भय दूर करती और भक्ति मन को स्थिर करती है। सोमनाथ के विनाश और पुनर्निर्माण का इतिहास इस प्रतीक को बाद का सांस्कृतिक अर्थ देता है, यद्यपि मूल श्लोक मुख्यतः समर्पण की प्रार्थना है।

मूल पोस्ट

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भक्ति पर और सुभाषित

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12 अक्टू॰ 2026
देवी महात्म्यम्

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्तिसमूहमूर्त्या। तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नताः स्म विदधातु शुभानि सा नः॥

devyā yayā tatamidaṃ jagadātmaśaktyā niśśeṣadevagaṇaśaktisamūhamūrtyā । tāmambikāmakhiladevamaharṣipūjyāṃ bhaktyā natāḥ sma vidadhātu śubhāni sā naḥ ॥

देवी महात्म्यम् की यह प्रार्थना जगत् में व्याप्त और समस्त देवशक्तियों की स्वरूप माँ अम्बिका को नमन करके सबके लिए मंगल माँगती है।

भक्तिशक्तिकल्याण
28 सित॰ 2026
चरक संहिता

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

स्वास्थ्यधर्मसमृद्धिआध्यात्मिकता
17 सित॰ 2026
विश्वकर्माष्टकम्

अनादिरप्रमेयश्च अरूपश्च जयाजयः। लोकरूपो जगन्नाथः विश्वकर्मन्नमो नमः॥

anādir aprameyaś ca arūpaś ca jayājayaḥ । lokarūpo jagannāthaḥ viśvakarman namo namaḥ ॥

विश्वकर्माष्टकम् का यह श्लोक अनादि, अप्रमेय और अरूप प्रभु को नमन करता है, जिनका स्वरूप सम्पूर्ण जगत है।

भक्तिआध्यात्मिकता