अनुशासन पर सुभाषित

44 सुभाषित इस विषय पर

यह विषय 6 स्रोतों से आए 44 सुभाषितों को एक साथ लाता है।

नवीनतम अद्यतन: 24 सित॰ 2026

24 सित॰ 2026
भगवद् गीता

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥

भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।

नैतिकताशांतिविद्याअनुशासन
31 अग॰ 2026
सौन्दरनन्द

यद् यदेव प्रसक्तं हि वितर्कयति मानवः। अभ्यासात् तेन तेनास्य नतिर्भवति चेतसः॥

yad yad eva prasaktaṃ hi vitarkayati mānavaḥ । abhyāsāt tena tenāsya natir bhavati cetasaḥ ॥

मनुष्य जिस विषय का बार-बार चिन्तन करता है, उसका चित्त उसी दिशा में झुकने लगता है।

अनुशासनचरित्र
24 अग॰ 2026
महाभारत

कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः। उत्थानेन जयेत्तन्द्रीं वितर्कं निश्चयाज्जयेत्॥

kāruṇyenātmano mānaṃ tṛṣṇāṃ ca paritoṣataḥ । utthānena jayettandrīṃ vitarkaṃ niścayājjayet ॥

महाभारत का यह उपदेश करुणा से मान, सन्तोष से तृष्णा, पुरुषार्थ से आलस्य और निश्चय से वितर्क को जीतने की राह दिखाता है।

नैतिकताअनुशासनदृढ़ता
11 अग॰ 2026
विदुर नीति

अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च। पराक्रमश्च बहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥

aṣṭau guṇāḥ puruṣaṁ dīpayanti prajñā suśīlatva-damau śrutaṁ ca । parākramaś ca bahubhāṣitā ca dānaṁ yathāśakti kṛtajñatā ca ॥

विदुर नीति का यह श्लोक प्रज्ञा, सदाचार, संयम, ज्ञान, पराक्रम, दान और कृतज्ञता के साथ स्थापित पाठ में मितभाषिता को मनुष्य का प्रकाशक गुण बताता है।

ज्ञानचरित्रअनुशासनविद्यासाहस
24 जुल॰ 2026
विदुर नीति

कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते। तदेवापहरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत्॥

karmaṇā manasā vācā yadabhīkṣṇaṃ niṣevate । tadevāpaharatyenaṃ tasmātkalyāṇamācaret ॥

विदुर नीति सिखाती है कि कर्म, मन और वाणी से बार-बार जिस विषय का अभ्यास किया जाता है, वही मनुष्य को अपनी दिशा में ले जाता है; इसलिए कल्याणकारी आचरण करना चाहिए।

कर्मनैतिकताअनुशासन
21 जुल॰ 2026
महासुभाषितसंग्रह

एकाग्रताथ सङ्कल्पः स्नायुवद् वर्द्धनक्षमौ। नित्याभ्यासप्रयोगाभ्याम् अधिकाधिकमृध्यतः॥

ekāgratātha saṅkalpaḥ snāyuvad varddhanakṣamau । nityābhyāsaprayogābhyām adhikādhikamṛdhyataḥ ॥

एकाग्रता और संकल्प स्थिर गुण नहीं, बल्कि नियमित अभ्यास और सार्थक प्रयोग से स्नायुओं की तरह निरंतर विकसित होने वाली क्षमताएँ हैं।

अनुशासनदृढ़तासामर्थ्य
20 जुल॰ 2026
विदुर नीति

प्राप्यापदं न व्यथते कदाचिदुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः। दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिताः सपत्नाः॥

prāpyāpadaṁ na vyathate kadācidudyogamanvicchati cāpramattaḥ । duḥkhaṁ ca kāle sahate mahātmā dhurandharastasya jitāḥ sapatnāḥ ॥

विदुर नीति का यह श्लोक संकट में अविचल रहकर सावधानीपूर्वक पुरुषार्थ करने और दुःख सहते हुए विजय पाने की शिक्षा देता है।

दृढ़तासाहसअनुशासनसफलता
17 जुल॰ 2026
चाणक्य नीति

प्रभूतं कार्यमल्पं वा यन्नरः कर्तुमिच्छति। सर्वारम्भेण तत्कार्यं सिंहादेकं प्रचक्षते॥

prabhūtaṁ kāryamalpaṁ vā yannaraḥ kartumicchati । sarvārambheṇa tatkāryaṁ siṁhādekaṁ pracakṣate ॥

चाणक्य नीति का यह श्लोक सिखाता है कि कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे सिंह की तरह पूर्ण समर्पण और पूरे प्रयास से करना चाहिए।

ज्ञानअनुशासनदृढ़ता
9 जुल॰ 2026
वाल्मीकि रामायण

अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्। अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः॥

anirvedaḥ śriyo mūlam anirvedaḥ paraṁ sukham । anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ ॥

वाल्मीकि रामायण के सुन्दर काण्ड का यह श्लोक बताता है कि निराशा से मुक्त उत्साह, दृढ़ विश्वास और सतत प्रयास ही उन्नति और सफलता का आधार हैं।

दृढ़ताआत्मविश्वाससफलताअनुशासन
2 जुल॰ 2026
ऐतरेय ब्राह्मण

नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम। पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा चरैवेति॥

nānāśrāntāya śrīr astīti rohita śuśruma । pāpo nṛṣadvaro jana indra ic carataḥ sakhā caraiveti ॥

ऐतरेय ब्राह्मण की चरैवेति परंपरा का यह मंत्र बताता है कि समृद्धि निरंतर प्रयत्न करने वाले को मिलती है, निष्क्रिय रहने वाले को नहीं।

दृढ़ताअनुशासनसफलताकर्म
1 जुल॰ 2026
कठोपनिषद्

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः। सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥

vijñānasārathir yastu manaḥ pragrahavān naraḥ । so'dhvanaḥ pāram āpnoti tad viṣṇoḥ paramaṁ padam ॥

कठोपनिषद् का यह मंत्र बताता है कि विवेकपूर्ण ज्ञान जब सारथि बनता है और मन संयमित रहता है, तब साधक जीवन-पथ पार कर परम लक्ष्य तक पहुँचता है।

विद्याअनुशासनआत्मज्ञानसफलता
24 जून 2026
पञ्चतन्त्र

यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्यविहीनता। नयविक्रमसंयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम्॥

yatrotsāhasamārambho yatrālasyavihīnatā । nayavikramasaṃyogas tatra śrīr acalā dhruvam ॥

पञ्चतन्त्र का यह श्लोक बताता है कि उत्साह, आलस्यहीनता, नीति और पराक्रम के मेल से समृद्धि स्थिर और चिरस्थायी बनती है।

दृढ़ताअनुशासनसाहससफलता
22 जून 2026
लघुयोगवासिष्ठ

चित्तप्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते। प्राणस्पन्दनिरोधो वा द्वेधा योगस्य धारणा॥

cittapraśamanopāyo yoga ity abhidhīyate । prāṇaspandanirodho vā dvedhā yogasya dhāraṇā ॥

योग को मन शांत करने और प्राण की गति को नियंत्रित करने वाली दोहरी साधना के रूप में प्रस्तुत किया गया है।

योगशांतिअनुशासनकल्याण
19 जून 2026
मालतीमाधवम्

शास्त्रे प्रतिष्ठा सहजश्च बोधः प्रागल्भ्यमभ्यस्तगुणा च वाणी। कालानुरोधः प्रतिभानवत्त्वमेते गुणाः कामदुघाः क्रियासु॥

śāstre pratiṣṭhā sahajaśca bodhaḥ prāgalbhyam abhyastaguṇā ca vāṇī । kālānurodhaḥ pratibhānavattvam ete guṇāḥ kāmadughāḥ kriyāsu ॥

भवभूति के मालतीमाधवम् का यह श्लोक उन छह गुणों का वर्णन करता है जो मानव-प्रयास को फलदायी बनाकर लक्ष्य तक पहुंचाते हैं।

विद्याज्ञानआत्मविश्वासअनुशासनसफलता
18 जून 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः कीर्तिस्त्यागानुसारिणी। अभ्याससारिणी विद्या बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥

satyānusāriṇī lakṣmīḥ kīrtis tyāgānusāriṇī । abhyāsasāriṇī vidyā buddhiḥ karmānusāriṇī ॥

यह सुभाषित धन को सत्यनिष्ठा, यश को परोपकार, ज्ञान को अभ्यास और बुद्धि को कर्म से जोड़ता है।

समृद्धिनैतिकताविद्याअनुशासनकर्म
16 जून 2026
किरातार्जुनीयम्

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्। वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥

sahasā vidadhīta na kriyām avivekaḥ paramāpadāṃ padam । vṛṇate hi vimṛśyakāriṇaṃ guṇalubdhāḥ svayameva sampadaḥ ॥

भारवि के किरातार्जुनीयम् का यह श्लोक उतावलेपन से बचने और विवेकपूर्ण निर्णयों द्वारा सफलता व समृद्धि प्राप्त करने की शिक्षा देता है।

ज्ञानअनुशासनसफलताचरित्र
2 जून 2026
विदुर नीति

निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः। अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते॥

niścitya yaḥ prakramate nāntarvasati karmaṇaḥ । avandhyakālo vaśyātmā sa vai paṇḍita ucyate ॥

विदुर नीति का यह श्लोक सच्चे बुद्धिमान व्यक्ति को वह मानता है जो विचारपूर्वक कार्य आरम्भ करे, उसे पूरा करे, समय का सदुपयोग करे और आत्म-संयम बनाए रखे।

ज्ञानअनुशासनदृढ़तासफलता
27 मई 2026
योगवासिष्ठ

यो यमर्थं प्रार्थयते तदर्थं चेहते क्रमात्। अवश्यं स तमाप्नोति न चेदर्धान्निवर्तते॥

yo yam arthaṃ prārthayate tadarthaṃ cehate kramāt । avaśyaṃ sa tam āpnoti na ced ardhān nivartate ॥

योगवासिष्ठ का यह श्लोक बताता है कि सच्ची इच्छा, क्रमबद्ध प्रयास और मार्ग से बीच में न लौटने का धैर्य मनुष्य को उसके लक्ष्य तक पहुँचाता है।

दृढ़तासफलताअनुशासन
18 मई 2026
चाणक्य नीति

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्यते घटः। स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च॥

jalabindunipātena kramaśaḥ pūryate ghaṭaḥ । sa hetuḥ sarvavidyānāṁ dharmasya ca dhanasya ca ॥

यह नीति-वचन बताता है कि जैसे घड़ा बूँद-बूँद से भरता है, वैसे ही निरंतर छोटे प्रयासों से विद्या, धर्म और धन का संचय होता है।

दृढ़ताविद्याधर्मसमृद्धिअनुशासन
15 मई 2026
विदुर नीति

यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते। न किञ्चिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः॥

yathāśakti cikīrṣanti yathāśakti ca kurvate । na kiñcidavamanyante narāḥ paṇḍitabuddhayaḥ ॥

विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि सच्ची बुद्धिमत्ता वही है जो यथाशक्ति लक्ष्य निर्धारित करे, अनुशासित कर्म करे और किसी भी बात को तुच्छ न समझे।

ज्ञानसामर्थ्यअनुशासनचरित्र
12 मई 2026
चाणक्य नीति

यथा खात्वा खनित्रेण भूतले वारि विन्दति। तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति॥

yathā khātvā khanitreṇa bhūtale vāri vindati । tathā gurugatāṃ vidyāṃ śuśrūṣuradhigacchati ॥

जिस प्रकार धरती को गहराई तक खोदने पर ही जल मिलता है, उसी प्रकार गुरु में विद्यमान ज्ञान केवल शुश्रूषा — समर्पित सेवा और सच्ची श्रवण-जिज्ञासा — से ही प्राप्त होता है।

शिक्षामार्गदर्शनविद्याअनुशासन
7 मई 2026
महाभारत

उदीर्णमनसो योधा वाहनानि च भारत। यस्यां भवन्ति सेनायां ध्रुवं तस्यां जयं वदेत्॥

udīrṇamanaso yodhā vāhanāni ca bhārata । yasyāṁ bhavanti senāyāṁ dhruvaṁ tasyāṁ jayaṁ vadet ॥

महाभारत से लिया गया यह श्लोक बताता है कि उत्साहित सैनिक और उत्कृष्ट संसाधन ही किसी सेना की जीत को सुनिश्चित करते हैं।

साहससामर्थ्यशक्तिसफलताअनुशासन
28 अप्रैल 2026
विदुर नीति

उत्थानं संयमो दाक्ष्यमप्रमादो धृतिः स्मृतिः। समीक्ष्य च समारम्भो विद्धिमूलं भवस्य तु॥

utthānaṁ saṁyamo dākṣyam apramādo dhṛtiḥ smṛtiḥ । samīkṣya ca samārambho viddhi mūlaṁ bhavasya tu ॥

विदुर नीति का यह श्लोक उन्नति के उन सात आधारभूत स्तंभों का वर्णन करता है जो व्यक्ति और राष्ट्र की समृद्धि के लिए अनिवार्य हैं।

अनुशासनसामर्थ्यसफलतादृढ़ताज्ञान
7 अप्रैल 2026
अष्टाङ्गहृदयम्

लाघवं कर्मसामर्थ्यं दीप्तोऽग्निर्मेदसः क्षयः। विभक्तघनगात्रत्वं व्यायामादुपजायते॥

lāghavaṁ karmasāmarthyaṁ dīpto’gnir medasaḥ kṣayaḥ । vibhaktaghanagātratvaṁ vyāyāmādupajāyate ॥

अष्टाङ्गहृदयम् के अनुसार जानें कि कैसे नियमित व्यायाम शरीर की कार्यक्षमता, चयापचय (Metabolism) और शारीरिक संरचना को बेहतर बनाकर उत्तम स्वास्थ्य का मार्ग प्रशस्त करता है।

स्वास्थ्यअनुशासनकल्याण
2 अप्रैल 2026
रामरक्षास्तोत्रम्

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शिरसा नमामि॥

manojavaṁ mārutatulyavegaṁ jitendriyaṁ buddhimatāṁ variṣṭham । vātātmajaṁ vānarayūthamukhyaṁ śrīrāmadūtaṁ śirasā namāmi ॥

श्री राम के दूत हनुमान जी की यह वंदना उनकी गति, बुद्धि और इंद्रिय संयम की प्रशंसा करती है।

भक्तिसाहसज्ञानअनुशासनविनम्रता
16 मार्च 2026

व्यायामाल्लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखम्। आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्॥

vyāyāmāl labhate svāsthyaṁ dīrghāyuṣyaṁ balaṁ sukham । ārogyaṁ paramaṁ bhāgyaṁ svāsthyaṁ sarvārthasādhanam ॥

नियमित व्यायाम स्वास्थ्य, बल, दीर्घायु और अपने दायित्वों को प्रभावी ढंग से निभाने की शारीरिक क्षमता प्रदान करता है।

स्वास्थ्यअनुशासनकल्याण
9 मार्च 2026
महासुभाषितसंग्रह

अभीप्सां स्वात्मनो रक्षाऽविरतं सुस्थिरं तया। यत्नमातिष्ठ धैर्येण ततः सिद्धिर्भवेद् ध्रुवम्॥

abhīpsāṁ svātmano rakṣā’virataṃ susthiraṁ tayā । yatnam ātiṣṭha dhairyeṇa tataḥ siddhir bhaved dhruvam ॥

दृढ़ संकल्प, धैर्यपूर्ण प्रयास और आत्मसंयम श्रेष्ठ अभिलाषा की रक्षा करते हुए उसे सफलता तक पहुँचाते हैं।

दृढ़ताअनुशासनसफलता
6 मार्च 2026
चाणक्य नीति

यद् दूरं यद् दुराराध्यं यच्च दूरे व्यवस्थितम्। तत् सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्॥

yad dūraṃ yad durārādhyaṃ yacca dūre vyavasthitam । tat sarvaṃ tapasā sādhyaṃ tapo hi duratikramam ॥

चाणक्य नीति का यह श्लोक बताता है कि "तप" यानी कठिन परिश्रम से हर उस लक्ष्य को पाया जा सकता है जो दूर या असंभव प्रतीत होता है।

दृढ़ताअनुशासनसफलता
24 फ़र॰ 2026
पञ्चतन्त्र

यथैकेन न हस्तेन तालिका सम्प्रपद्यते। तथोद्यमपरित्यक्तं न फलं कर्मणः स्मृतम्॥

yathaikena na hastena tālikā samprapadyate । tathodyamaparityaktaṃ na phalaṃ karmaṇaḥ smṛtam ॥

जिस प्रकार एक हाथ से ताली नहीं बजती, उसी प्रकार बिना परिश्रम के किसी भी कार्य में सफलता फलित नहीं होती।

दृढ़ताकर्मअनुशासनसफलता
17 फ़र॰ 2026
कामन्दकीय नीतिसार

शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणां तथा। ऊहापोहोऽर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः॥

śuśrūṣā śravaṇaṃ caiva grahaṇaṃ dhāraṇāṃ tathā । ūhāpoho’rthavijñānaṃ tattvajñānaṃ ca dhīguṇāḥ ॥

परिपक्व बुद्धि उत्सुकता से सुनती, अर्थ ग्रहण और धारण करती, तर्कपूर्वक विचार करती, भ्रम त्यागती और सत्य पहचानती है।

विद्याशिक्षाअनुशासन
13 फ़र॰ 2026
ऐतरेय ब्राह्मण

चरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम्। सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति॥

caran vai madhu vindati caran svādum udumbaram । sūryasya paśya śremāṇaṃ yo na tandrayate caraṃś caraiveti ॥

गतिशील रहने और कर्मठता का संदेश देता यह श्लोक बताता है कि सूर्य की तरह निरंतर चलते रहने वाला ही यश प्राप्त करता है।

दृढ़ताकर्मअनुशासनऊर्जा
5 फ़र॰ 2026
मत्स्य पुराण

विकल्पमात्रावस्थाने वैरूप्यं मनसो भवेत्। पश्चान्मूलक्रियारम्भगम्भीरावर्तदुस्तरः॥

vikalpamātrāvasthāne vairūpyaṃ manaso bhavet । paścānmūlakriyārambhagambhīrāvartadustaraḥ ॥

मत्स्य पुराण का यह श्लोक चेतावनी देता है कि थोड़ा सा भी संशय मन को विकृत कर सकता है और कार्य में दुर्गम बाधाएं उत्पन्न कर सकता है।

अनुशासनआत्मविश्वासज्ञान
3 फ़र॰ 2026
विदुर नीति

श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भ्यात् सम्प्रवर्धते। दाक्ष्यात् तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठति॥

śrīrmaṅgalāt prabhavati prāgalbhyāt sampravardhate । dākṣyāt tu kurute mūlaṃ saṃyamāt pratitiṣṭhati ॥

विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि कैसे श्री (लक्ष्मी) शुभ कर्मों से जन्म लेती है और संयम से स्थिर होती है।

समृद्धिसामर्थ्यअनुशासनआत्मविश्वास
29 जन॰ 2026
अथर्ववेद

एको बहूनामसि मन्य ईडिता विशं विशं युद्धाय सं शिशाधि। अकृत्तरुक्त्वया युजा वयं द्युमन्तं घोषं विजयाय कृण्मसि॥

eko bahūnāmasi manya īḍitā viśaṃ viśaṃ yuddhāya saṃ śiśādhi । akṛttaruk tvayā yujā vayaṃ dyumantaṃ ghoṣaṃ vijayāya kṛṇmasi ॥

मन्यु सूक्त का यह मंत्र अनुशासित युद्ध-ऊर्जा, सामूहिक साहस और विवेकपूर्ण दिशा में प्राप्त सम्मानजनक विजय का आह्वान करता है।

साहसनेतृत्वशक्तिअनुशासन
21 जन॰ 2026
ऐतरेय ब्राह्मण

चरैवेति चरैवेति चरन्वै मधु विन्दति। सूर्यास्य पश्य श्रेमाणं न मामार न जीर्यति॥

caraiveti caraiveti caranvai madhu vindati । sūryāsya paśya śremāṇaṃ na māmāra na jīryati ॥

वैदिक उद्घोष ‘चरैवेति’ सूर्य की अविराम गति से प्रेरणा लेकर सतत कर्म को प्रगति का मार्ग बताता है।

दृढ़ताअनुशासनज्ञान
19 जन॰ 2026
अर्थशास्त्र

अनुत्थाने ध्रुवो नाशः प्राप्तस्यानागतस्य च। प्राप्यते फलमुत्थानाल्लभते चार्थसम्पदम्॥

anutthāne dhruvo nāśaḥ prāptasyānāgatasya ca । prāpyate phalam utthānāl labhate cārthasampadam ॥

निष्क्रियता निश्चित अवनति लाती है, जबकि उद्यम और परिश्रम से ही समृद्धि तथा सार्थक फल प्राप्त होते हैं।

दृढ़ताअनुशासनसफलतासमृद्धि
16 जन॰ 2026

दुर्लभान्यपि कार्याणि सिद्ध्यन्ति प्रोद्यमेन हि। शिलाऽपि तनुतां याति प्रपातेनार्णसो मुहुः॥

durlabhāny api kāryāṇi siddhyanti prodyamena hi । śilā'pi tanutāṁ yāti prapātenārṇaso muhuḥ ॥

निरंतर प्रयास कठिन कार्यों को भी सिद्ध कर देता है, जैसे बार-बार गिरती जलधारा धीरे-धीरे पत्थर को घिस देती है।

दृढ़ताअनुशासन
2 जन॰ 2026
महाभारत

उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूतिकर्मसु। भविष्यतीत्येव मनः कृत्वा सततमव्यथैः॥

utthātavyaṃ jāgṛtavyaṃ yoktavyaṃ bhūtikarmasu । bhaviṣyatītyeva manaḥ kṛtvā satatam avyathaiḥ ॥

उठें, जागरूक रहें, विषाद त्यागें और इस विश्वास के साथ कर्म में लगें कि सार्थक प्रयास अवश्य फल दे सकता है।

दृढ़ताअनुशासनआत्मविश्वाससफलता
29 दिस॰ 2025
सुभाषितावलि

नात्युच्चशिखरो मेरुर्नातिनीचं रसातलम्। व्यवसायद्वितीयानां नात्यपारो महोदधिः॥

na aty ucca śikharaḥ meru na atīnīcaṁ rasātalam । vyavasāya-dvitīyānāṁ na aty-apāro mahodadhiḥ ॥

दृढ़ संकल्प वाले व्यक्ति के लिए न कोई शिखर बहुत ऊँचा है, न सागर बहुत विशाल और न कोई कार्य पुरुषार्थ से परे।

दृढ़ताआत्मविश्वासअनुशासनसफलता
24 दिस॰ 2025
विदुर नीति

यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः। समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते॥

yasya kṛtyaṁ na vighnanti śītamuṣṇaṁ bhayaṁ ratiḥ । samṛddhir asamṛddhir vā sa vai paṇḍita ucyate ॥

सच्चा ज्ञानी सर्दी-गर्मी, भय-इच्छा और संपत्ति-विपत्ति के बीच भी अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होता।

ज्ञानदृढ़ताचरित्रअनुशासन
22 दिस॰ 2025
चाणक्य नीति

गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्। वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः॥

gate śokaḥ na kartavyo bhaviṣyaṁ naiva cintayet । vartamānena kālena vartayanti vicakṣaṇāḥ ॥

बुद्धिमान व्यक्ति न बीते हुए का शोक करता है, न आने वाले की चिंता; वह वर्तमान में सजग होकर कर्म करता है।

ज्ञानशांतिअनुशासन
12 दिस॰ 2025
वाल्मीकि रामायण

क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधो मित्रमुखो रिपुः। क्रोधो ह्यसिर्महातीक्ष्णः सर्वं क्रोधोऽपकर्षति॥

krodhaḥ prāṇaharaḥ śatruḥ krodho mitramukho ripuḥ । krodho hy asir mahātīkṣṇaḥ sarvaṃ krodho ’pakarṣati ॥

क्रोध भीतर बसने वाला ऐसा शत्रु है जो विनाशकारी, दुर्जेय और अंततः उसे धारण करने वाले व्यक्ति के पतन का कारण बनता है।

नैतिकताचरित्रअनुशासन
11 दिस॰ 2025
विदुर नीति

सुदुर्बलं नावजानाति कञ्चिद् युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम्। न विग्रहं रोचयते बलस्थैः काले च यो विक्रमते स धीरः॥

sudurbalaṃ nāvajānāti kañcid yukto ripuṃ sevate buddhipūrvam । na vigrahaṃ rocayate balasthaiḥ kāle ca yo vikramate sa dhīraḥ ॥

सुदुर्बलं नावजानाति श्लोक के अनुसार सच्चा वीर वही है जो बुद्धि और विवेक से काम लेता है और उचित समय पर ही अपना शौर्य दिखाता है।

ज्ञानसाहसनैतिकताअनुशासन
10 दिस॰ 2025
योगचूडामण्युपनिषद्

आसनेन रुजो हन्ति प्राणायामेन पातकम्। विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण सर्वदा॥ धारणाभिर्मनोधैर्यं याति चैतन्यमद्भुतम्। समाधौ मोक्षमाप्नोति त्यक्त्वा कर्म शुभाशुभम्॥

āsanena rujo hanti prāṇāyāmena pātakam । vikāraṁ mānasaṁ yogī pratyāhāreṇa sarvadā ॥ dhāraṇābhir mano dhairyaṁ yāti caitanyam adbhutam । samādhau mokṣam āpnoti tyaktvā karma śubhāśubham ॥

आसन, प्राणायाम और अनुशासित योगाभ्यास शरीर के रोग और अंतर्मन की अशुद्धि दूर कर साधक को गहन मुक्ति के लिए तैयार करते हैं।

योगस्वास्थ्यआत्मज्ञानअनुशासन