सुदुर्बलं नावजानाति - सच्ची वीरता

11 दिस॰ 2025

सुदुर्बलं नावजानाति कञ्चिद् युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम्। न विग्रहं रोचयते बलस्थैः काले च यो विक्रमते स धीरः॥

sudurbalaṃ nāvajānāti kañcid yukto ripuṃ sevate buddhipūrvam । na vigrahaṃ rocayate balasthaiḥ kāle ca yo vikramate sa dhīraḥ ॥

सुदुर्बलं नावजानाति कञ्चिद् युक्तो का अर्थ

जो किसी कमजोर का अपमान नहीं करता, हमेशा सावधान रहकर बुद्धि‑विवेक द्वारा शत्रुओं से निपटता है, बलवानों के साथ जबरन नहीं भिड़ता तथा उचित समय पर शौर्य दिखाता है, वह ही सच्चा वीर है।

शब्दार्थ

सुदुर्बलम्sudurbalam

अत्यन्त दुर्बल को

सु + दुस् + बल

न अवजानातिnāvajānāti

तुच्छ नहीं समझता

अव + √ज्ञा

कञ्चित्kañcit

किसी को

युक्तःyuktaḥ

सावधान

√युज्

रिपुम्ripum

शत्रु से

रिपु

सेवतेsevate

व्यवहार करता है

√सेव्

बुद्धिपूर्वम्buddhipūrvam

बुद्धिपूर्वक

√बुध् + पूर्व

न विग्रहम्na vigraham

विग्रह नहीं

वि + √ग्रह्

रोचयतेrocayate

रुचिकर मानता

√रुच्

बलस्थैःbalasthaiḥ

बलवानों से

बल + √स्था

काले चkāle ca

और उचित समय पर

काल

यः विक्रमतेyo vikramate

जो पराक्रम करता है

वि + √क्रम्

सः धीरःsa dhīraḥ

वही धीर है

√धृ

व्याख्या

विदुर नीति का यह श्लोक एक 'धीर' या सच्चे वीर के चरित्र को परिभाषित करता है। यह इस बात पर जोर देता है कि सच्ची शक्ति केवल शारीरिक बल में नहीं, बल्कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता और रणनीतिक संयम में है। एक बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी अपने प्रतिद्वंद्वी को कम नहीं आंकता, चाहे वह कितना भी कमजोर क्यों न लगे, और बलवानों के साथ अनावश्यक संघर्ष से बचता है। इस संदर्भ में वीरता, आवेग में प्रतिक्रिया करने के बजाय सही समय पर निर्णायक रूप से कार्य करने की क्षमता है। दिए गए चार लक्षणों में तीन निषेध हैं—वह अत्यन्त दुर्बल का अपमान नहीं करता, बलवानों से विग्रह में रुचि नहीं रखता, बिना विचार के प्रवृत्त नहीं होता—और केवल अन्तिम क्रिया है। अतः धीर की परिभाषा अधिकांशतः संयम से बनती है, और पराक्रम एक ही बार, वह भी शर्त के साथ आता है: 'काले' अर्थात् उचित समय पर। विदुर उस एक विधेय वाक्य को अन्त में रखते हैं, ताकि पराक्रम से पहले पूरी परिभाषा आ जाए।

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महाभारत

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भगवद् गीता

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कर्मकर्तव्यसफलता

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