सुदुर्बलं नावजानाति कञ्चिद् युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम्। न विग्रहं रोचयते बलस्थैः काले च यो विक्रमते स धीरः॥
sudurbalaṃ nāvajānāti kañcid yukto ripuṃ sevate buddhipūrvam । na vigrahaṃ rocayate balasthaiḥ kāle ca yo vikramate sa dhīraḥ ॥
सुदुर्बलं नावजानाति कञ्चिद् युक्तो का अर्थ
जो किसी कमजोर का अपमान नहीं करता, हमेशा सावधान रहकर बुद्धि‑विवेक द्वारा शत्रुओं से निपटता है, बलवानों के साथ जबरन नहीं भिड़ता तथा उचित समय पर शौर्य दिखाता है, वह ही सच्चा वीर है।
शब्दार्थ
- सुदुर्बलम्sudurbalam
अत्यन्त दुर्बल को
सु + दुस् + बल
- न अवजानातिnāvajānāti
तुच्छ नहीं समझता
अव + √ज्ञा
- कञ्चित्kañcit
किसी को
- युक्तःyuktaḥ
सावधान
√युज्
- रिपुम्ripum
शत्रु से
रिपु
- सेवतेsevate
व्यवहार करता है
√सेव्
- बुद्धिपूर्वम्buddhipūrvam
बुद्धिपूर्वक
√बुध् + पूर्व
- न विग्रहम्na vigraham
विग्रह नहीं
वि + √ग्रह्
- रोचयतेrocayate
रुचिकर मानता
√रुच्
- बलस्थैःbalasthaiḥ
बलवानों से
बल + √स्था
- काले चkāle ca
और उचित समय पर
काल
- यः विक्रमतेyo vikramate
जो पराक्रम करता है
वि + √क्रम्
- सः धीरःsa dhīraḥ
वही धीर है
√धृ
व्याख्या
विदुर नीति का यह श्लोक एक 'धीर' या सच्चे वीर के चरित्र को परिभाषित करता है। यह इस बात पर जोर देता है कि सच्ची शक्ति केवल शारीरिक बल में नहीं, बल्कि भावनात्मक बुद्धिमत्ता और रणनीतिक संयम में है। एक बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी अपने प्रतिद्वंद्वी को कम नहीं आंकता, चाहे वह कितना भी कमजोर क्यों न लगे, और बलवानों के साथ अनावश्यक संघर्ष से बचता है। इस संदर्भ में वीरता, आवेग में प्रतिक्रिया करने के बजाय सही समय पर निर्णायक रूप से कार्य करने की क्षमता है। दिए गए चार लक्षणों में तीन निषेध हैं—वह अत्यन्त दुर्बल का अपमान नहीं करता, बलवानों से विग्रह में रुचि नहीं रखता, बिना विचार के प्रवृत्त नहीं होता—और केवल अन्तिम क्रिया है। अतः धीर की परिभाषा अधिकांशतः संयम से बनती है, और पराक्रम एक ही बार, वह भी शर्त के साथ आता है: 'काले' अर्थात् उचित समय पर। विदुर उस एक विधेय वाक्य को अन्त में रखते हैं, ताकि पराक्रम से पहले पूरी परिभाषा आ जाए।
मूल पोस्ट
विदुर नीति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
ज्ञान पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।