महाभारत से सुभाषित

महाभारत और उसमें समाहित शिक्षाओं के संस्कृत सुभाषित देवनागरी पाठ, हिन्दी-अंग्रेज़ी अर्थ, व्याख्या और स्रोत-संदर्भ सहित पढ़ें।

महाभारत पाण्डवों और कौरवों के संघर्ष पर केंद्रित विशाल संस्कृत महाकाव्य है, किंतु उसका विस्तार कुरुक्षेत्र युद्ध की कथा से बहुत आगे जाता है। कथाओं, संवादों, परामर्श और दार्शनिक चिंतन के माध्यम से वह उन परिस्थितियों में धर्म की खोज करता है जहाँ कर्तव्य, संबंध और परिणाम अलग-अलग दिशाओं में खींचते हैं।

यह पृष्ठ महाभारत से सीधे उद्धृत पद्यों के साथ उसमें समाहित भगवद् गीता और विदुर नीति जैसे ग्रंथांशों के श्लोक भी एकत्र करता है। अधिक केंद्रित अध्ययन के लिए उनके अलग स्रोत पृष्ठ भी उपलब्ध हैं।

कठिन निर्णयों का महाकाव्य

महाभारत नैतिक जीवन को सरल उत्तरों की सूची की तरह प्रस्तुत नहीं करता। उसकी शिक्षाएँ पारिवारिक संघर्ष, सार्वजनिक उत्तरदायित्व, अनिश्चितता, शोक, राजनीति और युद्ध के बीच सामने आती हैं। इसलिए उसके स्मरणीय पद्यों में विशेष व्यावहारिक शक्ति है—सिद्धांत को परिस्थिति और उत्तरदायित्व के साथ समझना पड़ता है।

यहाँ चुने गए सुभाषितों में साहस, नेतृत्व, अहिंसा, अनुशासित कर्म, विवेकपूर्ण परामर्श, आत्मसंयम और दूसरों की रक्षा जैसे विषय बार-बार आते हैं।

संबंधित स्रोत-परंपरा देखें

भगवद् गीता
10 सुभाषित अर्थ सहित पढ़ें
विदुर नीति
18 सुभाषित अर्थ सहित पढ़ें

संबंधित मार्गदर्शिकाएँ और श्लोक चयन

अर्थ सहित संस्कृत श्लोक
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महाभारत के सुभाषित

इस चयन में महाभारत के सीधे उद्धरण और भगवद् गीता अथवा विदुर नीति जैसे उसके विशिष्ट ग्रंथांशों के अंतर्गत रखे गए श्लोक दोनों शामिल हैं।

नवीनतम अद्यतन: 7 अक्टू॰ 2026

7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता
24 सित॰ 2026
भगवद् गीता

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥

भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।

नैतिकताशांतिविद्याअनुशासन
21 सित॰ 2026
विदुर नीति

एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥

eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥

महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।

धर्मशांतिविद्याअहिंसा
16 सित॰ 2026
महाभारत

अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥

advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥

महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।

साहसज्ञानदृढ़तासमृद्धि
2 सित॰ 2026
महाभारत

अभयस्यैव यो दाता तस्यैव सुमहत्फलम् । न हि प्राणसमं दानं त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥

abhayasyaiva yo dātā tasyaiva sumahatphalam । na hi prāṇasamaṃ dānaṃ triṣu lokeṣu vidyate ॥

महाभारत का यह श्लोक अभय देने वाले की प्रशंसा करता है और तीनों लोकों में प्राण के समान किसी दान को नहीं मानता।

नैतिकतानिःस्वार्थ सेवा
1 सित॰ 2026
विदुर नीति

यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे। कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते॥

yasya kṛtyaṃ na jānanti mantraṃ vā mantritaṃ pare । kṛtam evāsya jānanti sa vai paṇḍita ucyate ॥

महाभारत का यह श्लोक उसे पण्डित कहता है जिसकी मन्त्रणा और कार्य पूर्ण होने तक दूसरों को ज्ञात नहीं होते।

ज्ञानकर्म
26 अग॰ 2026
महाभारत

ज्ञानवृद्धान्प्रशंसन्तः शुश्रूषन्तः परस्परम्। विनिवृत्ताभिसन्धानाः सुखमेधन्ति सर्वशः॥

jñānavṛddhān praśaṃsantaḥ śuśrūṣantaḥ parasparam । vinivṛttābhisandhānāḥ sukhamedhanti sarvaśaḥ ॥

महाभारत का यह श्लोक ज्ञानवृद्धों के सम्मान, परस्पर सेवा और छिपे स्वार्थ के त्याग को सामूहिक सुख एवं उन्नति का आधार बताता है।

विद्यासम्मानएकतानिःस्वार्थ सेवासफलता
24 अग॰ 2026
महाभारत

कारुण्येनात्मनो मानं तृष्णां च परितोषतः। उत्थानेन जयेत्तन्द्रीं वितर्कं निश्चयाज्जयेत्॥

kāruṇyenātmano mānaṃ tṛṣṇāṃ ca paritoṣataḥ । utthānena jayettandrīṃ vitarkaṃ niścayājjayet ॥

महाभारत का यह उपदेश करुणा से मान, सन्तोष से तृष्णा, पुरुषार्थ से आलस्य और निश्चय से वितर्क को जीतने की राह दिखाता है।

नैतिकताअनुशासनदृढ़ता
18 अग॰ 2026
महाभारत

उद्यच्छेदेव न नमेदुद्यमो ह्येव पौरुषम्। अप्यपर्वणि भज्येत न नमेदिह कस्यचित्॥

udyacched eva na named udyamo hy eva pauruṣam । apy aparvaṇi bhajyeta na named iha kasyacit ॥

महाभारत का यह श्लोक उद्यम को ही पौरुष बताता है: मनुष्य निरंतर प्रयत्न करे और कभी न झुके, चाहे उसे झुकने के बजाय टूटना ही क्यों न पड़े।

दृढ़तासाहसचरित्र
12 अग॰ 2026
विदुर नीति

चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्। प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति॥

cakṣuṣā manasā vācā karmaṇā ca caturvidham । prasādayati yo lokaṁ taṁ loko'nuprasīdati ॥

विदुर नीति सिखाती है कि जो व्यक्ति दृष्टि, विचार, वाणी और कर्म से लोगों को प्रसन्न करता है, उसे लोगों का सद्भाव भी प्राप्त होता है।

सामंजस्यकर्म
11 अग॰ 2026
विदुर नीति

अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च। पराक्रमश्च बहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥

aṣṭau guṇāḥ puruṣaṁ dīpayanti prajñā suśīlatva-damau śrutaṁ ca । parākramaś ca bahubhāṣitā ca dānaṁ yathāśakti kṛtajñatā ca ॥

विदुर नीति का यह श्लोक प्रज्ञा, सदाचार, संयम, ज्ञान, पराक्रम, दान और कृतज्ञता के साथ स्थापित पाठ में मितभाषिता को मनुष्य का प्रकाशक गुण बताता है।

ज्ञानचरित्रअनुशासनविद्यासाहस
4 अग॰ 2026
भगवद् गीता

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

na hi jñānena sadṛśaṁ pavitram iha vidyate । tat svayaṁ yogasaṁsiddhaḥ kālenātmani vindati ॥

ज्ञान से बढ़कर कोई पवित्र करने वाला नहीं; योग से सिद्ध साधक उसे समय आने पर अपने भीतर पाता है।

विद्यायोगआत्मज्ञान
24 जुल॰ 2026
विदुर नीति

कर्मणा मनसा वाचा यदभीक्ष्णं निषेवते। तदेवापहरत्येनं तस्मात्कल्याणमाचरेत्॥

karmaṇā manasā vācā yadabhīkṣṇaṃ niṣevate । tadevāpaharatyenaṃ tasmātkalyāṇamācaret ॥

विदुर नीति सिखाती है कि कर्म, मन और वाणी से बार-बार जिस विषय का अभ्यास किया जाता है, वही मनुष्य को अपनी दिशा में ले जाता है; इसलिए कल्याणकारी आचरण करना चाहिए।

कर्मनैतिकताअनुशासन
20 जुल॰ 2026
विदुर नीति

प्राप्यापदं न व्यथते कदाचिदुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः। दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिताः सपत्नाः॥

prāpyāpadaṁ na vyathate kadācidudyogamanvicchati cāpramattaḥ । duḥkhaṁ ca kāle sahate mahātmā dhurandharastasya jitāḥ sapatnāḥ ॥

विदुर नीति का यह श्लोक संकट में अविचल रहकर सावधानीपूर्वक पुरुषार्थ करने और दुःख सहते हुए विजय पाने की शिक्षा देता है।

दृढ़तासाहसअनुशासनसफलता
15 जुल॰ 2026
महाभारत

धन्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम्। लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा॥

dhanyānām uttamaṃ dākṣyaṃ dhanānām uttamaṃ śrutam । lābhānāṃ śreya ārogyaṃ sukhānāṃ tuṣṭir uttamā ॥

महाभारत के यक्षप्रश्न का यह श्लोक बताता है कि कौशल, विद्या, आरोग्य और संतोष जीवन की श्रेष्ठ संपदाएँ हैं।

विद्यासामर्थ्यस्वास्थ्यकल्याणज्ञान
10 जुल॰ 2026
विदुर नीति

हितं यत्सर्वभूतानामात्मानश्च सुखावहम्। तत्कुर्यादीश्वरे ह्येतन्मूलं सर्वार्थसिद्धये॥

hitaṃ yat sarvabhūtānām ātmānaśca sukhāvaham । tat kuryād īśvare hy etan mūlaṃ sarvārthasiddhaye ॥

महाभारत का यह श्लोक सिखाता है कि वही कर्म श्रेष्ठ है जो सभी प्राणियों के लिए हितकारी हो, आत्मा को शांति दे और ईश्वर-समर्पण से जुड़ा हो।

निःस्वार्थ सेवाधर्मनैतिकताआध्यात्मिकता
29 जून 2026
विदुर नीति

देशाचारान् समयाञ्जातिधर्मान् बुभूषते यस्तु परावरज्ञः। स तत्र तत्राधिगतः सदैव महाजनस्याधिपत्यं करोति॥

deśācārān samayāñ jātidharmān bubhūṣate yastu parāvarajñaḥ । sa tatra tatrādhigataḥ sadaiva mahājanasyādhipatyaṁ karoti ॥

विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि स्थानीय आचार, सामाजिक मर्यादाओं और समुदायों की समझ से विश्वास, सम्मान और प्रभाव प्राप्त होता है।

ज्ञानसंस्कृतिसम्मानचरित्र
9 जून 2026
विदुर नीति

आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते। हितं च नाभ्यसूयन्ति स वै पण्डित उच्यते॥

āryakarmaṇi rajyante bhūtikarmāṇi kurvate । hitaṃ ca nābhyasūyanti sa vai paṇḍita ucyate ॥

विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि सच्ची बुद्धिमत्ता श्रेष्ठ कर्मों में रुचि, लोककल्याण के प्रति समर्पण और हितकारी कार्यों के प्रति निष्कपट सम्मान में है।

ज्ञाननैतिकताचरित्रकर्तव्य
3 जून 2026
विदुर नीति

धूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च। धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातयो भरतर्षभ॥

dhūmāyante vyapetāni jvalanti sahitāni ca । dhṛtarāṣṭrolmukānīva jñātayo bharatarṣabha ॥

विदुर नीति का यह श्लोक बिखरी और संगठित लकड़ियों के रूपक से बताता है कि सामूहिकता सुप्त शक्ति को प्रकट और प्रभावी बना देती है।

एकताशक्तिसफलता
2 जून 2026
विदुर नीति

निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः। अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते॥

niścitya yaḥ prakramate nāntarvasati karmaṇaḥ । avandhyakālo vaśyātmā sa vai paṇḍita ucyate ॥

विदुर नीति का यह श्लोक सच्चे बुद्धिमान व्यक्ति को वह मानता है जो विचारपूर्वक कार्य आरम्भ करे, उसे पूरा करे, समय का सदुपयोग करे और आत्म-संयम बनाए रखे।

ज्ञानअनुशासनदृढ़तासफलता
29 मई 2026
भगवद् गीता

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥

tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam adroho nātimānitā । bhavanti sampadaṃ daivīm abhijātasya bhārata ॥

भगवद् गीता का यह श्लोक तेजस्विता, क्षमा, धैर्य, शुचिता, अद्रोह और अहंकाररहित विनम्रता जैसे छह दैवी गुणों का वर्णन करता है।

चरित्रविनम्रतानैतिकतासाहस
20 मई 2026
भगवद् गीता

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥

tasmācchāstraṁ pramāṇaṁ te kāryākāryavyavasthitau । jñātvā śāstravidhānoktaṁ karma kartum ihārhasi ॥

भगवद्गीता का यह ऐतिहासिक श्लोक प्रतिपादित करता है कि कर्तव्य और अकर्तव्य का निर्णय व्यक्तिगत इच्छा के बजाय एक प्रामाणिक और सुव्यवस्थित व्यवस्था पर आधारित होना चाहिए।

धर्मनैतिकताकर्तव्यविद्याज्ञान
15 मई 2026
विदुर नीति

यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते। न किञ्चिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः॥

yathāśakti cikīrṣanti yathāśakti ca kurvate । na kiñcidavamanyante narāḥ paṇḍitabuddhayaḥ ॥

विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि सच्ची बुद्धिमत्ता वही है जो यथाशक्ति लक्ष्य निर्धारित करे, अनुशासित कर्म करे और किसी भी बात को तुच्छ न समझे।

ज्ञानसामर्थ्यअनुशासनचरित्र
8 मई 2026
भगवद् गीता

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi । dharmyāddhi yuddhācchreyo'nyatkṣatriyasya na vidyate ॥

अर्जुन को दिए गए भगवान श्रीकृष्ण के इस उपदेश में स्पष्ट किया गया है कि एक योद्धा के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है।

कर्तव्यधर्मसाहसदृढ़ता
7 मई 2026
महाभारत

उदीर्णमनसो योधा वाहनानि च भारत। यस्यां भवन्ति सेनायां ध्रुवं तस्यां जयं वदेत्॥

udīrṇamanaso yodhā vāhanāni ca bhārata । yasyāṁ bhavanti senāyāṁ dhruvaṁ tasyāṁ jayaṁ vadet ॥

महाभारत से लिया गया यह श्लोक बताता है कि उत्साहित सैनिक और उत्कृष्ट संसाधन ही किसी सेना की जीत को सुनिश्चित करते हैं।

साहससामर्थ्यशक्तिसफलताअनुशासन
6 मई 2026
महाभारत

अद्रोहः सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा। अनुग्रहश्च दानं च शीलमेतत्प्रशस्यते॥

adrohaḥ sarvabhūteṣu karmaṇā manasā girā । anugrahaśca dānaṁ ca śīlametatpraśasyate ॥

सच्ची मानवता और नैतिक आचरण पर एक मार्गदर्शक सिद्धांत, जो सभी जीवों के प्रति दया, दान और द्वेषहीनता पर जोर देता है।

नैतिकताचरित्रधर्म
5 मई 2026
महाभारत

न तथा बलवीर्याभ्यां जयन्ति विजिगीषवः। यथा सत्यानृशंस्याभ्यां धर्मेणैवोद्यमेन च॥

na tathā balavīryābhyāṁ jayanti vijigīṣavaḥ । yathā satyānṛśaṁsyābhyāṁ dharmeṇaivodyamena ca ॥

यह श्लोक बताता है कि सच्ची और स्थायी विजय केवल शारीरिक बल या पराक्रम से नहीं, बल्कि सत्य, दया, धर्म और उद्यम से प्राप्त होती है।

धर्मनैतिकतासफलतादृढ़ता
28 अप्रैल 2026
विदुर नीति

उत्थानं संयमो दाक्ष्यमप्रमादो धृतिः स्मृतिः। समीक्ष्य च समारम्भो विद्धिमूलं भवस्य तु॥

utthānaṁ saṁyamo dākṣyam apramādo dhṛtiḥ smṛtiḥ । samīkṣya ca samārambho viddhi mūlaṁ bhavasya tu ॥

विदुर नीति का यह श्लोक उन्नति के उन सात आधारभूत स्तंभों का वर्णन करता है जो व्यक्ति और राष्ट्र की समृद्धि के लिए अनिवार्य हैं।

अनुशासनसामर्थ्यसफलतादृढ़ताज्ञान
8 अप्रैल 2026
विदुर नीति

आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता। यमर्था नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥

ātmajñānaṁ samārambhas titikṣā dharmanityatā । yam arthā nāpakarṣanti sa vai paṇḍita ucyate ॥

विदुर नीति का यह श्लोक एक बुद्धिमान व्यक्ति के गुणों का वर्णन करता है: आत्मज्ञान, दृढ़ निश्चय, सहनशीलता और प्रलोभनों से ऊपर उठकर जनकल्याण के मार्ग पर अडिग रहना।

ज्ञानआत्मज्ञानचरित्रधर्मदृढ़ता
3 मार्च 2026
महाभारत

निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम्। तस्माद् व्याघ्रो वनं रक्षेद् वनं व्याघ्रं च पालयेत्॥

nirvano vadhyate vyāghro nirvyāghraṃ chidyate vanam । tasmād vyāghro vanaṃ rakṣed vanaṃ vyāghraṃ ca pālayet ॥

महाभारत का यह श्लोक बाघ और वन के बीच के अन्योन्याश्रित संबंधों को दर्शाता है, जो वन्यजीव संरक्षण की आवश्यकता पर बल देता है।

प्रकृतिसंरक्षणसामंजस्य
27 फ़र॰ 2026
महाभारत

न हि शौर्यात्परं किञ्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते। शूरः सर्वं पालयति सर्वं शूरे प्रतिष्ठितम्॥

na hi śauryāt paraṃ kiñcit triṣu lokeṣu vidyate । śūraḥ sarvaṃ pālayati sarvaṃ śūre pratiṣṭhitam ॥

यह श्लोक बताता है कि तीनों लोकों में शौर्य से बढ़कर कुछ नहीं है, और यही वह शक्ति है जो समस्त मर्यादा और व्यवस्था की रक्षा करती है।

साहसशक्तिधर्मकर्तव्य
19 फ़र॰ 2026
महाभारत

गोपायितारं दातारं धर्मनित्यमतन्द्रितम्। अकामद्वेषसंयुक्तमनुरज्यन्ति मानवाः॥

gopāyitāraṁ dātāraṁ dharmanityamatandritam । akāmadveṣasaṁyuktam anurajyanti mānavāḥ ॥

आदर्श शासक रक्षा और पोषण करता है, कर्तव्य में स्थिर रहता है और प्रजा के साथ निष्पक्ष तथा संयमित शासन करता है।

सुशासननेतृत्वकर्तव्यनैतिकता
18 फ़र॰ 2026
भगवद् गीता

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥

jñānaṃ te'haṃ savijñānam idaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ । yajjñātvā neha bhūyo'nyajjñātavyamavaśiṣyate ॥

श्रीकृष्ण ऐसे ज्ञान और अनुभूत बोध का उपदेश देते हैं, जिसके बाद साधक के लिए जानने योग्य कोई आवश्यक सत्य शेष नहीं रहता।

विद्याआत्मज्ञानज्ञानआध्यात्मिकता
12 फ़र॰ 2026
भगवद् गीता

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥

ūrdhvamūlam adhaḥśākham aśvatthaṃ prāhur avyayam । chandāṃsi yasya parṇāni yas taṃ veda sa vedavit ॥

संसाररूपी अश्वत्थ वृक्ष और वेदों के ज्ञान को समझाता यह गीता का श्लोक अध्यात्म की गहरी समझ प्रदान करता है।

आध्यात्मिकताआत्मज्ञानविद्याज्ञान
3 फ़र॰ 2026
विदुर नीति

श्रीर्मङ्गलात् प्रभवति प्रागल्भ्यात् सम्प्रवर्धते। दाक्ष्यात् तु कुरुते मूलं संयमात् प्रतितिष्ठति॥

śrīrmaṅgalāt prabhavati prāgalbhyāt sampravardhate । dākṣyāt tu kurute mūlaṃ saṃyamāt pratitiṣṭhati ॥

विदुर नीति का यह श्लोक बताता है कि कैसे श्री (लक्ष्मी) शुभ कर्मों से जन्म लेती है और संयम से स्थिर होती है।

समृद्धिसामर्थ्यअनुशासनआत्मविश्वास
30 जन॰ 2026
महाभारत

अहिंसा परमो धर्मस्तथाऽहिंसा परन्तपः। अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥

ahiṃsā paramo dharmastathā’hiṃsā parantapaḥ । ahiṃsā paramaṃ satyaṃ yato dharmaḥ pravartate ॥

अहिंसा को सत्य में निहित सर्वोच्च धर्म और तप बताया गया है, जो किसी को हानि न पहुँचाने की साधना सिखाती है।

अहिंसाधर्मनैतिकताशांति
2 जन॰ 2026
महाभारत

उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूतिकर्मसु। भविष्यतीत्येव मनः कृत्वा सततमव्यथैः॥

utthātavyaṃ jāgṛtavyaṃ yoktavyaṃ bhūtikarmasu । bhaviṣyatītyeva manaḥ kṛtvā satatam avyathaiḥ ॥

उठें, जागरूक रहें, विषाद त्यागें और इस विश्वास के साथ कर्म में लगें कि सार्थक प्रयास अवश्य फल दे सकता है।

दृढ़ताअनुशासनआत्मविश्वाससफलता
31 दिस॰ 2025
विदुर नीति

यथा यथा हि पुरुषः कल्याणे कुरुते मनः। तथा तथाऽस्य सर्वार्थाः सिद्ध्यन्ते नात्र संशयः॥

yathā yathā hi puruṣaḥ kalyāṇe kurute manaḥ । tathā tatha'sya sarvārthāḥ siddhyante nātra saṁśayaḥ ॥

मन जितना कल्याणकारी विचारों की ओर मुड़ता है, आचरण और उसके परिणाम उतने ही उस शुभ संकल्प के अनुरूप होने लगते हैं।

कर्मचरित्रसफलता
25 दिस॰ 2025
भगवद् गीता

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

yad yad ācarati śreṣṭhas tat tad evetaro janaḥ । sa yat pramāṇaṃ kurute lokas tad anuvartate ॥

श्रेष्ठ व्यक्तियों का आचरण और उनके स्थापित मानदंड समाज को दिशा देते हैं, क्योंकि अन्य लोग स्वाभाविक रूप से उनका अनुसरण करते हैं।

नेतृत्वचरित्रनैतिकताकर्तव्य
24 दिस॰ 2025
विदुर नीति

यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः। समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते॥

yasya kṛtyaṁ na vighnanti śītamuṣṇaṁ bhayaṁ ratiḥ । samṛddhir asamṛddhir vā sa vai paṇḍita ucyate ॥

सच्चा ज्ञानी सर्दी-गर्मी, भय-इच्छा और संपत्ति-विपत्ति के बीच भी अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होता।

ज्ञानदृढ़ताचरित्रअनुशासन
19 दिस॰ 2025
महाभारत

पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान्। वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च॥

puṣpitāḥ phalavantaś ca tarpayantīha mānavān । vṛkṣadaṁ putravat vṛkṣās tarayanti paratra ca ॥

फल-फूल देने वाले वृक्ष रोपण के बहुत बाद तक दूसरों का कल्याण करते हैं, इसलिए वृक्षारोपण निःस्वार्थ सेवा का स्थायी रूप है।

निःस्वार्थ सेवाप्रकृतिनैतिकता
11 दिस॰ 2025
विदुर नीति

सुदुर्बलं नावजानाति कञ्चिद् युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम्। न विग्रहं रोचयते बलस्थैः काले च यो विक्रमते स धीरः॥

sudurbalaṃ nāvajānāti kañcid yukto ripuṃ sevate buddhipūrvam । na vigrahaṃ rocayate balasthaiḥ kāle ca yo vikramate sa dhīraḥ ॥

सुदुर्बलं नावजानाति श्लोक के अनुसार सच्चा वीर वही है जो बुद्धि और विवेक से काम लेता है और उचित समय पर ही अपना शौर्य दिखाता है।

ज्ञानसाहसनैतिकताअनुशासन