यथा यथा हि पुरुषः - कल्याणकारी विचार

31 दिस॰ 2025

यथा यथा हि पुरुषः कल्याणे कुरुते मनः। तथा तथाऽस्य सर्वार्थाः सिद्ध्यन्ते नात्र संशयः॥

yathā yathā hi puruṣaḥ kalyāṇe kurute manaḥ । tathā tatha'sya sarvārthāḥ siddhyante nātra saṁśayaḥ ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

कल्याणकारी विचारों से ही हम समाज का हित कर सकते हैं।

यथा यथा हि पुरुषः का अर्थ

व्यक्ति अपने हृदय में जैसे कल्याणकारी विचार धारण करता है, निःसन्देह वैसे ही परिणाम भी उसके सामने आते हैं।

शब्दार्थ

यथा यथाyathā yathā

जैसे-जैसे

हिhi

निश्चय ही

पुरुषःpuruṣaḥ

मनुष्य

पुरुष

कल्याणेkalyāṇe

कल्याण में

कल्याण

कुरुते मनःkurute manaḥ

मन लगाता है

√कृ + मनस्

तथा तथाtathā tathā

वैसे-वैसे

अस्यasya

उसके

इदम्

सर्वार्थाःsarvārthāḥ

समस्त प्रयोजन

सर्व + अर्थ

सिद्ध्यन्तेsiddhyante

सिद्ध होते हैं

√सिध्

न अत्र संशयःnātra saṁśayaḥ

इसमें संशय नहीं

सम् + √शी

व्याख्या

विदुर नीति का यह श्लोक इरादे की शक्ति और कार्य-कारण के नियम पर प्रकाश डालता है। यह सुझाव देता है कि जैसे-जैसे व्यक्ति अपने मन को 'कल्याण' (परहित/नेक विचार) की ओर निर्देशित करता है, उसके कार्य और परिणाम स्वाभाविक रूप से उस सकारात्मक इरादे के साथ जुड़ जाते हैं। यह एक शुद्ध और परोपकारी मन विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करता है, यह दावा करते हुए कि किसी के विचारों की गुणवत्ता अंततः उसके जीवन की गुणवत्ता और उसके प्रयासों की सफलता को निर्धारित करती है। 'यथा यथा … तथा तथा' रचना परिणाम नहीं, अनुपात कहती है। श्लोक यह नहीं कहता कि शुभ भाव के बाद सफलता आती है, अपितु यह कि दोनों साथ-साथ और समान मात्रा में बढ़ते हैं—मन जितना कल्याण की ओर लगता है, अर्थ उतने ही सिद्ध होते जाते हैं। यह मापदण्ड का वर्णन है, किसी स्विच का नहीं; इसीलिए यह 'नात्र संशयः' कहकर संदेह को सर्वथा अस्वीकार करते हुए समाप्त होता है।

मूल पोस्ट

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विदुर नीति से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

कर्म पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस