नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम् का अर्थ
व्यक्ति को स्वयं में सेवा-भाव नित्य रखना चाहिए, क्योंकि सेवा में निष्ठापूर्वक लगे रहना ही संसार का श्रेष्ठ पुण्य कर्म है। अतः सेवा करने से मनुष्य को कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
शब्दार्थ
- नित्यंnityaṃ
सदा, प्रतिदिन
- परिचरेत्paricaret
सेवा करनी चाहिए
च के साथ सन्धि से परिचरेच्च बनता है; च + एव = चैव।
- चca
और
- एवeva
ही, निश्चय ही
- तत्tat
वह
सन्धि: तत् + वै = तद्वै।
- वैvai
निश्चय ही
- सुकृतम्sukṛtam
शुभ या पुण्य कर्म
- उत्तमम्uttamam
सबसे श्रेष्ठ
- कीर्तिम्kīrtim
कीर्ति, अच्छी प्रतिष्ठा
- पुण्यम्puṇyam
पुण्य; यश के विशेषण के रूप में पवित्र या पुण्यमय
- यशःyaśaḥ
यश, सम्मान
लोकान् से पहले सन्धि से यशो लोकान् बनता है।
- लोकान्lokān
लोकों को
- प्राप्स्यसेprāpsyase
तुम प्राप्त करोगे
- राजसत्तमrājasattama
हे राजाओं में श्रेष्ठ
सम्बोधन का समास; राजन् अर्थात् राजा और सत्तम अर्थात् श्रेष्ठ।
व्याख्या
'नित्यं' शब्द सेवा को प्रतिदिन निभाए जाने वाले दायित्व के रूप में रखता है। 'परिचरेत्' का अर्थ सेवा करना और देखभाल करना है, तथा 'सुकृतमुत्तमम्' ऐसी सेवा को श्रेष्ठ शुभ कर्म बताता है। अंतिम पंक्ति सम्बोधित राजा के लिए पुण्य, कीर्ति, यश और लोकों की प्राप्ति का फल कहती है। आसपास के संवाद में भीष्म युधिष्ठिर को माता, पिता और गुरु के सम्मान तथा सेवा का महत्व समझा रहे हैं। दिया गया अर्थ इसी प्रसंग को व्यापक सेवा-भाव से जोड़ता है, जिसे हम अपने ऊपर निर्भर लोगों की रोजमर्रा की देखभाल में अपना सकते हैं। इस भाव को व्यवहार में लाने के लिए सेवा को नियमित जिम्मेदारी मानना उपयोगी है।
मूल पोस्ट
महाभारत से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंअद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।
कर्तव्य पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंस्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
यथा यथा प्रयत्नः स्याद्भवेदाशु फलं तथा। इति पौरुषमेवास्ति दैवमस्तु तदेव च॥
yathā yathā prayatnaḥ syād bhaved āśu phalaṃ tathā । iti pauruṣam evāsti daivam astu tad eva ca ॥
योगवासिष्ठ का यह श्लोक फल को मनुष्य के प्रयत्न से जोड़ता है और पुरुषार्थ को ही दैव मानने की शिक्षा देता है।
यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे। कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
yasya kṛtyaṃ na jānanti mantraṃ vā mantritaṃ pare । kṛtam evāsya jānanti sa vai paṇḍita ucyate ॥
महाभारत का यह श्लोक उसे पण्डित कहता है जिसकी मन्त्रणा और कार्य पूर्ण होने तक दूसरों को ज्ञात नहीं होते।