नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम। पापो नृषद्वरो जन इन्द्र इच्चरतः सखा चरैवेति॥
nānāśrāntāya śrīr astīti rohita śuśruma । pāpo nṛṣadvaro jana indra ic carataḥ sakhā caraiveti ॥
प्रधानमंत्री का संदेशनिरंतर प्रयास ही सफलता की असली कुंजी है। जीवन में वही व्यक्ति अपने लक्ष्य तक पहुंचता है, जो धैर्य, दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता रहता है।
नानाश्रान्ताय श्रीरस्तीति रोहित शुश्रुम का अर्थ
जो मनुष्य निरन्तर प्रयत्नशील रहता है, वह समृद्धि प्राप्त करता है, किंतु जो निष्क्रिय होकर बैठा रहता है, वह प्रगति से वंचित रह जाता है। निरन्तर प्रयत्न करने वाले का भाग्य भी साथ देता है इसलिए निरन्तर कर्म करते रहो और आगे बढ़ते रहो।
शब्दार्थ
- न अनाश्रान्तायnānāśrāntāya
जो श्रम नहीं करता उसके लिए नहीं
अ + √श्रम्
- श्रीः अस्तिśrīr asti
श्री होती है
श्री + √अस्
- इतिiti
ऐसा
- रोहितrohita
हे रोहित
- शुश्रुमśuśruma
हमने सुना है
√श्रु
- पापःpāpaḥ
पापी
पाप
- नृषद्वरःnṛṣadvaraḥ
मनुष्यों में बैठा रहने वाला
नृ + √सद्
- जनःjanaḥ
जन
√जन्
- इन्द्रः इत्indra it
इन्द्र ही
इन्द्र
- चरतःcarataḥ
चलने वाले का
√चर्
- सखाsakhā
सखा है
सखि
- चर एव इतिcaraiveti
इसलिए चलते रहो
√चर्
व्याख्या
यह मंत्र ऐतरेय ब्राह्मण के प्रसिद्ध चरैवेति प्रसंग का अंश है, जहाँ इन्द्र रोहित को चलते रहने और प्रयत्न करते रहने की प्रेरणा देते हैं। आरंभ का संदेश बहुत स्पष्ट है: श्री, अर्थात समृद्धि, उस व्यक्ति को नहीं मिलती जो श्रम से बचता है। जो निष्क्रिय बैठा रहता है वह अपने सामर्थ्य को घटाता है, जबकि इन्द्र स्वयं चलने और प्रयत्न करने वाले का सखा कहे गए हैं। 'चरैवेति' का refrain निरंतरता को केवल व्यवहारिक सलाह नहीं, बल्कि पवित्र अनुशासन बना देता है। इस मंत्र की शिक्षा व्यावहारिक भी है और मनोवैज्ञानिक भी। भाग्य को यहाँ अंधी संयोग-शक्ति की तरह नहीं, बल्कि उस व्यक्ति का साथी बताया गया है जो सतत कर्म से जागरूक, सक्रिय और अवसर के लिए तैयार रहता है। प्रधानमंत्री मोदी के संदेश में यही भाव आधुनिक जीवन से जुड़ता है: सफलता धैर्य, दृढ़ संकल्प और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते रहने से मिलती है। इस दृष्टि से यह मंत्र हर दीर्घ यात्रा के लिए प्रेरणा है, जहाँ प्रगति अचानक चमक से कम और निरंतर चलने के साहस से अधिक बनती है।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
ऐतरेय ब्राह्मण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंचरन् वै मधु विन्दति चरन् स्वादुमुदुम्बरम्। सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति॥
caran vai madhu vindati caran svādum udumbaram । sūryasya paśya śremāṇaṃ yo na tandrayate caraṃś caraiveti ॥
गतिशील रहने और कर्मठता का संदेश देता यह श्लोक बताता है कि सूर्य की तरह निरंतर चलते रहने वाला ही यश प्राप्त करता है।
चरैवेति चरैवेति चरन्वै मधु विन्दति। सूर्यास्य पश्य श्रेमाणं न मामार न जीर्यति॥
caraiveti caraiveti caranvai madhu vindati । sūryāsya paśya śremāṇaṃ na māmāra na jīryati ॥
वैदिक उद्घोष ‘चरैवेति’ सूर्य की अविराम गति से प्रेरणा लेकर सतत कर्म को प्रगति का मार्ग बताता है।
दृढ़ता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥
ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥
भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।