प्राप्यापदं न व्यथते कदाचिदुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्तः। दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिताः सपत्नाः॥
prāpyāpadaṁ na vyathate kadācidudyogamanvicchati cāpramattaḥ । duḥkhaṁ ca kāle sahate mahātmā dhurandharastasya jitāḥ sapatnāḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशआज हमारे युवा साथी धैर्य, आत्मविश्वास और अथक परिश्रम से ऐतिहासिक सफलता हासिल कर रहे हैं। यही विकसित हो रहे भारत की सबसे बड़ी ताकत है।
प्राप्यापदं न व्यथते का अर्थ
जो मनुष्य संकट के समय कभी विचलित नहीं होता बल्कि धैर्य, कुशलता और सावधानी के साथ उससे बाहर निकलने का प्रयास करता है तथा समय आने पर दुःखों को भी सहजता से सहन करता है, वह अन्ततः कभी पराजित नहीं होता बल्कि विपरीत परिस्थितियों पर भी विजय प्राप्त करता है।
शब्दार्थ
- प्राप्य आपदम्prāpya āpadam
विपत्ति आने पर
प्र + √आप् + आपद्
- न व्यथतेna vyathate
विचलित नहीं होता
√व्यथ्
- कदाचित्kadācit
कभी
- उद्योगम्udyogam
उद्योग
उद् + √युज्
- अन्विच्छतिanvicchati
खोजता है
अनु + √इष्
- च अप्रमत्तःcāpramattaḥ
और अप्रमत्त
अ + प्र + √मद्
- दुःखम्duḥkham
दुःख
दुःख
- च कालेca kāle
और समय पर
काल
- सहतेsahate
सहता है
√सह्
- महात्माmahātmā
महात्मा
महा + आत्मन्
- धुरन्धरःdhurandharaḥ
धुरन्धर
धुर् + √धृ
- तस्य जिताः सपत्नाःtasya jitāḥ sapatnāḥ
उसके शत्रु जीते जा चुके
√जि + सपत्न
व्याख्या
यह श्लोक दृढ़ता को केवल चुपचाप दुःख सहने के रूप में नहीं, बल्कि सजग कर्मशीलता के रूप में प्रस्तुत करता है। ‘आपद्’ अर्थात संकट आने पर धीर व्यक्ति व्याकुल होकर बैठ नहीं जाता; वह ‘अप्रमत्त’ रहकर, यानी असावधानी और शिथिलता से बचते हुए, ‘उद्योग’ या सार्थक पुरुषार्थ का मार्ग खोजता है। उचित समय पर कष्ट सहने की क्षमता और निरंतर प्रयास यहाँ एक-दूसरे के पूरक हैं। अंतिम चरण का ‘धुरन्धर’ वह है जो कठिन दायित्व का भार उठा सके; ऐसे व्यक्ति के प्रतिद्वंद्वी मानो पहले ही जीत लिए गए हों। इसलिए बाहरी विजय की शुरुआत कठिन परिस्थिति के प्रति अपनी प्रतिक्रिया पर संयम से होती है। भारतीय युवाओं की ऐतिहासिक उपलब्धियों के संदर्भ में यह श्लोक सफलता के पीछे छिपे गुणों को रेखांकित करता है—धैर्य, सजगता, अथक परिश्रम और विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ते रहने का साहस।
मूल पोस्ट
विदुर नीति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
दृढ़ता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।