अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं सुखम्। अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः॥
anirvedaḥ śriyo mūlam anirvedaḥ paraṁ sukham । anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ ॥
प्रधानमंत्री का संदेशदृढ़ विश्वास, सतत प्रयास और सकारात्मक सोच सफलता की असली कुंजी है। हमारे युवा साथी इन्हीं गुणों के साथ पूरे समर्पण भाव से विकसित भारत के निर्माण में जुटे हैं।
अनिर्वेदः श्रियो मूलमनिर्वेदः परं का अर्थ
उन्नति का मूल आधार उत्साह, दृढ़ विश्वास और निरंतर पुरुषार्थ है। जो व्यक्ति निराश हुए बिना अपने लक्ष्य की ओर सतत प्रयासरत रहता है, वह अंततः सफलता प्राप्त कर लेता है। अतः मनुष्य को दृढ़ विश्वास के साथ निरंतर कर्म करते रहना चाहिए, क्योंकि यही गुण उसके जीवन को प्रगति, सफलता और उत्कृष्टता की ओर अग्रसर करते हैं।
शब्दार्थ
- अनिर्वेदःanirvedaḥ
अनिर्वेद, विषाद का अभाव
अ + निस् + √विद्
- श्रियःśriyaḥ
श्री का
श्री
- मूलम्mūlam
मूल
मूल
- परम्param
परम
पर
- सुखम्sukham
सुख
सुख
- हिhi
निश्चय ही
- सततम्satatam
निरन्तर
सम् + √तन्
- सर्वार्थेषुsarvārtheṣu
समस्त प्रयोजनों में
सर्व + अर्थ
- प्रवर्तकःpravartakaḥ
प्रवृत्त करने वाला
प्र + √वृत्
व्याख्या
यह श्लोक सुन्दर काण्ड के उस प्रसंग से जुड़ा है जब हनुमान जी लंका में सीता जी की खोज करते हुए क्षणभर के लिए निराशा की संभावना से सामना करते हैं। वे स्वयं को ‘अनिर्वेद’ की भावना से स्थिर करते हैं, अर्थात ऐसी मनःस्थिति जिसमें व्यक्ति निराश होकर प्रयास छोड़ता नहीं है। यह केवल सामान्य आशावाद नहीं, बल्कि संकट में भी विचार और कर्म को जीवित रखने वाली आंतरिक दृढ़ता है। श्लोक अनिर्वेद को ‘श्री’ का मूल कहता है, जहाँ श्री का अर्थ समृद्धि, सफलता और जीवन की उन्नति से है। इसका व्यावहारिक संदेश यह है कि निराशा प्रयास को रोक देती है, जबकि दृढ़ विश्वास व्यक्ति को कठिनाई के बीच भी आगे बढ़ाता है। प्रधानमंत्री के पोस्ट में यही शिक्षा युवाओं और विकसित भारत के निर्माण से जोड़ी गई है, जहाँ सतत प्रयास और सकारात्मक सोच व्यक्तिगत गुण ही नहीं, राष्ट्रीय प्रगति के आधार भी बनते हैं।
मूल पोस्ट
वाल्मीकि रामायण से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंदैवं पुरुषकारेण यः समर्थः प्रबाधितुम्। न दैवेन विपन्नार्थः पुरुषः सोऽवसीदति॥
daivaṁ puruṣakāreṇa yaḥ samarthaḥ prabādhitum । na daivena vipannārthaḥ puruṣaḥ so’vasīdati ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि जो मनुष्य पुरुषार्थ से दैव का सामना करने में समर्थ है, वह विपरीत परिस्थितियों में निराश नहीं होता।
लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा। ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥ दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा। श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥
lokapālāśca te sarve vāsavapramukhāstathā । ṛtavaḥ ṣaṭ ca te sarve māsāḥ saṁvatsarāḥ kṣapāḥ ॥ dināni ca muhūrtāśca svasti kurvantu te sadā । śrutiḥ smṛtiśca dharmaśca pātu tvāṁ putra sarvataḥ ॥
अयोध्या काण्ड के इस आशीर्वचन में लोकपालों, कालचक्र, श्रुति-स्मृति और धर्म से निरंतर मंगल तथा सर्वांगीण रक्षा की प्रार्थना की गई है।
अनिर्वेदो हि सततं सर्वार्थेषु प्रवर्तकः। करोति सफलं जन्तोः कर्म यच्च करोति सः॥
anirvedo hi satataṁ sarvārtheṣu pravartakaḥ । karoti saphalaṁ jantoḥ karma yacca karoti saḥ ॥
वाल्मीकि रामायण का यह श्लोक सिखाता है कि किस प्रकार उत्साह और सकारात्मक ऊर्जा किसी भी कार्य को सफल बनाने के लिए आवश्यक हैं।
दृढ़ता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥
ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥
भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।