नात्युच्चशिखरो मेरुर्नातिनीचं रसातलम्। व्यवसायद्वितीयानां नात्यपारो महोदधिः॥
na aty ucca śikharaḥ meru na atīnīcaṁ rasātalam । vyavasāya-dvitīyānāṁ na aty-apāro mahodadhiḥ ॥
नात्युच्चशिखरो मेरुर्नातिनीचं रसातलम् का अर्थ
कोई भी शिखर इतना ऊँचा और कोई भी स्थल इतना गहरा नहीं होता कि वहाँ तक पहुँचा न जा सके ! ऐसे ही कोई भी महासागर इतना विशाल नहीं होता कि उसको पार न किया जा सके ! वस्तुतः उद्यमियों या परिश्रमी लोगों के लिए कुछ भी असंभव नहीं।
शब्दार्थ
- न अति उच्चशिखरःna aty-uccaśikharaḥ
अत्यन्त ऊँचा शिखर नहीं
उद् + शिखर
- मेरुःmeruḥ
मेरु
मेरु
- न अतिनीचम्nātinīcam
अत्यन्त नीचा नहीं
नीच
- रसातलम्rasātalam
रसातल
रस + तल
- व्यवसायद्वितीयानाम्vyavasāyadvitīyānām
जिनका दूसरा साथी व्यवसाय है
वि + अव + √सो + द्वितीय
'द्वितीय' संकल्प को सहयात्री बनाता है, गुण नहीं।
- न अति अपारःna aty-apāraḥ
अत्यन्त अपार नहीं
अ + पार
- महोदधिःmahodadhiḥ
महासागर
महा + उदधि
व्याख्या
यह प्रेरणादायक श्लोक 'व्यवसाय' या उद्यमशीलता और दृढ़ संकल्प की शक्ति पर जोर देता है। यह दुनिया की सबसे बड़ी भौतिक विशेषताओं—मेरु पर्वत की चोटियों, पाताल (रसातल) की गहराइयों और महासागर की विशालता—का उपयोग यह दिखाने के लिए करता है कि अपने लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्ध व्यक्ति के लिए कुछ भी अलंघनीय नहीं है। यह सिखाता है कि कथित सीमाएं अक्सर केवल मानसिक बाधाएं होती हैं जिन्हें निरंतर प्रयास और मजबूत इच्छाशक्ति के माध्यम से दूर किया जा सकता है। केन्द्र में वह समास है जिसे अनुवाद प्रायः समतल कर देते हैं: 'व्यवसायद्वितीयानाम्' अर्थात् जिनका दूसरा साथी व्यवसाय है। यहाँ संकल्प को गुण नहीं, सहयात्री बनाया गया है—जो व्यवसाय को साथ लेकर चलता है वह पहले ही दो हो चुका; और पर्वत तथा समुद्र उसी युगल के सामने नापे जाते हैं, अकेले व्यक्ति के सामने नहीं। मेरु और रसातल का नाम परिमाण के लिए है, क्योंकि परम्परा के पास यही उच्चतम और निम्नतम बिन्दु हैं।
स्रोत और पाठभेद
यह श्लोक यहाँ भी उपलब्ध है
मूल पोस्ट
सुभाषितावलि से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।
दृढ़ता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥
ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥
भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।