बन्धनं मरणं वापि - सच्चा वीर

26 दिस॰ 2025

बन्धनं मरणं वापि जयो वापि पराजयः। उभयत्र समो वीरः वीरभावो हि वीरता॥

bandhanaṁ maraṇaṁ vāpi jayo vāpi parājayaḥ । ubhayatra samo vīraḥ vīrabhāvo hi vīratā ॥

बन्धनं मरणं वापि जयो का अर्थ

बंधन हो या मृत्यु, विजय हो या पराजय, सच्चा वीर वही होता है, जो प्रत्येक परिस्थिति में वीरभाव को धारण रखता है और सदैव समान रहता है; यही सच्ची वीरता है।

शब्दार्थ

बन्धनम्bandhanam

बन्धन

√बन्ध्

मरणम्maraṇam

मृत्यु

√मृ

वा अपिvāpi

अथवा

जयःjayaḥ

विजय

√जि

पराजयःparājayaḥ

पराजय

परा + √जि

उभयत्रubhayatra

दोनों में

उभय

समःsamaḥ

समान

सम

वीरःvīraḥ

वीर

वीर

वीरभावःvīrabhāvaḥ

वीरभाव

वीर + √भू

हि वीरताhi vīratā

ही वीरता है

वीर

व्याख्या

यह शक्तिशाली श्लोक 'वीरता' या सच्चे नायकत्व के सार को परिभाषित करता है। यह सुझाव देता है कि एक नायक उसके कार्यों के परिणाम से परिभाषित नहीं होता है—चाहे वह विजय हो, पराजय हो, कारावास हो, या मृत्यु भी हो—बल्कि उसके मन की आंतरिक स्थिति से परिभाषित होता है। एक सच्चा नायक इन सभी स्थितियों में 'सम' (समभाव) रहता है, साहस और गरिमा की भावना बनाए रखता है जो बाहरी परिस्थितियों से स्वतंत्र होती है। यह 'वीरभाव' ही एक योद्धा की सच्ची पहचान है। श्लोक चार सम्भावित स्थितियाँ—बन्धन या मृत्यु तथा जय या पराजय—दो विकल्पों में रखता है और 'उभयत्र समः' कहकर दोनों में समभाव की बात करता है। अन्तिम वाक्यांश पुनरुक्ति-सा प्रतीत होता है और वह जानबूझकर है: 'वीरभावो हि वीरता'—वीरता वही है जो वीर का भाव है। किसी भी परिणाम को वीर की परिभाषा बनने न देने के बाद श्लोक के पास वीरता को रखने का और कोई स्थान बचता ही नहीं, सिवाय उस भाव के। इस श्लोक का स्रोत अभी अनुसन्धेय है।

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