यद्यदाचरति श्रेष्ठः - नेताओं का आचरण

25 दिस॰ 2025

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

yad yad ācarati śreṣṭhas tat tad evetaro janaḥ । sa yat pramāṇaṃ kurute lokas tad anuvartate ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

आदरणीय अटल जी की जन्म-जयंती हम सबके लिए उनके जीवन से प्रेरणा लेने का एक विशेष अवसर है। उनका आचरण, शालीनता, वैचारिक दृढ़ता और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का संकल्प भारतीय राजनीति के लिए एक आदर्श मानक है। उन्होंने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि श्रेष्ठता पद से नहीं, आचरण से स्थापित होती है और वही समाज को दिशा देती है। इस अवसर पर मैं इस सुभाषित को साझा कर रहा हूं, जो उनके जीवन के एक पहलू को परिभाषित करता है:

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः का अर्थ

श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, सामान्य लोग उसी का अनुकरण करते हैं। अर्थात् नेता या आदर्श व्यक्ति का व्यवहार समाज और अनुयायियों के लिए मार्गदर्शक बनता है।

शब्दार्थ

यत् यत्yad yad

जो जो

यद्

आचरतिācarati

आचरण करता है

आ + √चर्

श्रेष्ठःśreṣṭhaḥ

श्रेष्ठ पुरुष

श्रेष्ठ

तत् तत् एवtat tad eva

वही वही

तद् + एव

इतरःitaraḥ

अन्य

इतर

जनःjanaḥ

जन, लोग

√जन्

सःsaḥ

वह

तद्

यत्yat

जिसे

यद्

प्रमाणम्pramāṇam

प्रमाण, मानक

प्र + √मा

कुरुतेkurute

बनाता है

√कृ

लोकःlokaḥ

संसार

लोक

तत्tat

उसका

तद्

अनुवर्ततेanuvartate

अनुसरण करता है

अनु + √वृत्

व्याख्या

भगवद गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक, यह शिक्षा नेताओं और आदर्श व्यक्तियों की सामाजिक जिम्मेदारी पर जोर देती है। कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि जनमानस स्वाभाविक रूप से प्रभावशाली पदों पर बैठे लोगों की ओर देखता है और उनके व्यवहार का अनुकरण करता है। इसलिए, एक नेता को बहुत सावधानी और ईमानदारी के साथ कार्य करना चाहिए, क्योंकि उनके मानक समाज के लिए मानदंड बन जाते हैं। यह केवल आदेश के बजाय उदाहरण द्वारा नेतृत्व करने का आह्वान है। गीता में यह श्लोक अकेला नहीं है। यह कर्मयोग अध्याय में ठीक उससे पहले आता है जहाँ श्रीकृष्ण तर्क को अपनी ओर मोड़ते हैं और कहते हैं कि तीनों लोकों में उन्हें कुछ भी प्राप्तव्य शेष नहीं, फिर भी वे कर्म से विरत नहीं होते। अतः श्रेष्ठ के प्रमाण स्थापित करने की यह पंक्ति एक उदाहरण की भूमिका है, और वह उदाहरण स्वयं वक्ता हैं। 'प्रमाण' अर्थात् मान या कसौटी—वह नहीं जो श्रेष्ठ पुरुष कहता है, अपितु वह जो उसका आचरण मौन रूप से मानक बना देता है।

मूल पोस्ट

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भगवद् गीता से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

नेतृत्व पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस