आर्यकर्मणि रज्यन्ते - श्रेष्ठ सेवा की बुद्धिमत्ता

9 जून 2026

आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते। हितं च नाभ्यसूयन्ति स वै पण्डित उच्यते॥

āryakarmaṇi rajyante bhūtikarmāṇi kurvate । hitaṃ ca nābhyasūyanti sa vai paṇḍita ucyate ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

राष्ट्र निर्माण के लिए समर्पण और सेवाभाव हमारी अमूल्य पूंजी रही है। बीते 12 वर्षों में 'सबका साथ, सबका विकास' की भावना से प्रेरित निरंतर प्रयासों से ही आज हम एक सशक्त और आत्मनिर्भर भारत की ओर अग्रसर हैं।

आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते का अर्थ

जो व्यक्ति सदैव श्रेष्ठ एवं सदाचारपूर्ण कर्मों में लगा रहता है, निरंतर उन्नति और लोककल्याण के कार्यों में संलग्न रहता है तथा दूसरों के हितकारी वचनों और कार्यों का सम्मान करता है, उनसे द्वेष नहीं करता, वही वास्तव में बुद्धिमान कहलाता है।

शब्दार्थ

आर्यकर्मणिāryakarmaṇi

श्रेष्ठ कर्म में

आर्य + कर्मन्

रज्यन्तेrajyante

अनुरक्त होते हैं

√रञ्ज्

भूतिकर्माणिbhūtikarmāṇi

कल्याणकारी कर्म

√भू + कर्मन्

कुर्वतेkurvate

करते हैं

√कृ

हितम्hitam

हित को

√धा

चca

और

न अभ्यसूयन्तिnābhyasūyanti

द्वेष नहीं करते

अभि + √असूय्

सः वैsa vai

वही

तद्

पण्डितः उच्यतेpaṇḍita ucyate

पण्डित कहा जाता है

पण्डा + √वच्

व्याख्या

यह श्लोक पण्डित, अर्थात् सच्चे बुद्धिमान व्यक्ति, की पहचान ज्ञान के प्रदर्शन से नहीं बल्कि आचरण से करता है। 'आर्यकर्म' का अर्थ है श्रेष्ठ, सदाचारपूर्ण और लोक-मर्यादा के अनुकूल कर्म; बुद्धिमत्ता वही है जो ऐसे कर्मों में स्वाभाविक आनंद और रुचि रखे। 'भूतिकर्माणि' उन कार्यों की ओर संकेत करता है जिनसे उन्नति, समृद्धि और लोककल्याण होता है, इसलिए यह श्लोक व्यक्ति की बुद्धि को समाज के हित से जोड़ता है। अंतिम गुण उतना ही महत्वपूर्ण है: बुद्धिमान व्यक्ति हितकारी बातों और कार्यों से द्वेष नहीं करता। वह अच्छे कार्य को जहाँ भी देखता है, उसका सम्मान करता है, क्योंकि ईर्ष्या सहयोग और सामूहिक प्रगति को कमजोर करती है। राष्ट्र-निर्माण और 'सबका साथ, सबका विकास' के संदर्भ में यह शिक्षा सेवा-भाव, निरंतर प्रयास और साझा योगदानों के सम्मान का संदेश देती है।

मूल पोस्ट

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विदुर नीति से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

ज्ञान पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस