सदानुरक्तप्रकृतिः प्रजापालनतत्परः। विनीतात्मा हि नृपतिर्भूयसी श्रियमश्नुते॥
sadānuraktaprakṛtiḥ prajāpālanatatparaḥ । vinītātmā hi nṛpatir bhūyasī śriyam aśnute ॥
प्रधानमंत्री का संदेशजनसेवा ही सुशासन की सबसे बड़ी कसौटी है। विनम्रता, समर्पण और कर्तव्यनिष्ठा के साथ निरंतर कार्य करने वाला व्यक्ति ही जनविश्वास अर्जित करता है।
सदानुरक्तप्रकृतिः प्रजापालनतत्परः का अर्थ
जो जनप्रतिनिधि सेवा को अपना धर्म मानकर निरंतर जनहित में कार्य करता है, सुशासन द्वारा जनता की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करता है, तथा विनम्रता व संयम के साथ विकास को लक्ष्य बनाकर समाज की उन्नति के लिए समर्पित रहता है, वास्तव में वही जनविश्वास, यश और समृद्धि प्राप्त करता है।
शब्दार्थ
- सदानुरक्तप्रकृतिःsadānuraktaprakṛtiḥ
जिसकी प्रजा सदा अनुरक्त हो
सदा + अनु + √रञ्ज् + प्रकृति
- प्रजापालनतत्परःprajāpālanatatparaḥ
प्रजापालन में तत्पर
प्रजा + √पाल् + तत्पर
- विनीतात्माvinītātmā
विनीत आत्मा वाला
वि + √नी + आत्मन्
- हि नृपतिःhi nṛpatiḥ
राजा ही
नृ + पति
- भूयसीम्bhūyasīm
अधिक
√भू
- श्रियम्śriyam
श्री
श्री
- अश्नुतेaśnute
प्राप्त करता है
√अश्
व्याख्या
यह सुभाषित ऐसे नृपति का वर्णन करता है जिसकी प्रजा सदा अनुरक्त रहती है, जो प्रजापालन में तत्पर है और जिसका अपना चित्त विनीत या अनुशासित है। ऐसा राजा, श्लोक के अनुसार, अधिक श्री या समृद्धि प्राप्त करता है। साथ दिया गया अर्थ इन संक्षिप्त गुणों को सेवा-धर्म, सुशासन, समाज की उन्नति, जनविश्वास, यश और मान्यता तक विस्तृत करता है। ये संस्कृत में अलग-अलग कहे गए पद नहीं, आधुनिक अनुप्रयोग हैं। श्लोक का सीधा संबंध प्रजा की देखभाल, आत्मसंयम, प्रजा के अनुराग और राजा की समृद्धि के बीच है।
मूल पोस्ट
कामन्दकीय नीतिसार से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।
सुशासन पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।