विद्या पर संस्कृत श्लोक

संस्कृत चिंतन इस बात में सावधानी से भेद करता है कि आपको क्या बताया गया और आपने क्या समझा। भगवद्गीता कहती है कि ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ नहीं, और साधक उसे अपने भीतर ही पाता है। कामन्दकीय नीतिसार बुद्धि की परिभाषा स्मरणशक्ति से नहीं, अपितु अज्ञात को जान लेने और संदिग्ध का निश्चय कर लेने से करता है। दर्पदलनम् पूछता है कि विद्या का वास्तविक फल क्या है, और उत्तर देता है—विनम्रता, परोपकार और क्षमा।

इस चयन में गुरु के विषय में परंपरा का कथन भी सम्मिलित है—कुलार्णव तंत्र गुरु की छह भूमिकाएँ गिनाता है, और कालिदास उस विरले आचार्य की बात करते हैं जिसमें स्वयं की निपुणता और उसे दूसरों तक पहुँचाने की क्षमता, दोनों हों। हर श्लोक के पूर्ण पृष्ठ पर हिन्दी-अंग्रेज़ी अर्थ और प्रमाणित स्रोत उपलब्ध है।

इस संग्रह का प्रत्येक श्लोक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा X पर साझा किया गया था।

विद्या के फल, सच्चे गुरु के लक्षण, और उस बुद्धि के अनुशासन पर जो जाने हुए तथा केवल दोहराए हुए में भेद कर सके।

1

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

na hi jñānena sadṛśaṁ pavitram iha vidyate । tat svayaṁ yogasaṁsiddhaḥ kālenātmani vindati ॥

अर्थ

इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है। कर्मयोग या साधना के द्वारा जिसका अंतःकरण भली-भांति शुद्ध हो गया है, वह साधक समय आने पर उस परम ज्ञान को अपने आप ही अपने भीतर आत्मा में अनुभव कर लेता है।

2

शीलं परहितासक्तिः अनुत्सेकः क्षमा धृतिः। अलोभश्चेति विद्यायाः परिपाकोज्ज्वलं फलम्॥

śīlaṁ parahitāsaktiḥ anutsekaḥ kṣamā dhṛtiḥ । alobhaśceti vidyāyāḥ paripākojjvalaṁ phalam ॥

अर्थ

शील, परोपकार, विनय, क्षमा, धैर्य और अलोभ ये सभी विद्या की पूर्णता के उज्ज्वल फल हैं।

3

प्रेरकः सूचकश्चैव वाचको दर्शकस्तथा। शिक्षकः बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः॥

prerakaḥ sūcakaścaiva vācako darśakastathā । śikṣakaḥ bodhakaścaiva ṣaḍete guravaḥ smṛtāḥ ॥

अर्थ

जो जीवन में प्रेरणा का संचार करे, सही दिशा का संकेत दे, ज्ञान और सत्य का उपदेश करे, उचित मार्ग दिखाए, शिक्षा प्रदान करे तथा जीवन में सत्य का बोध कराकर आत्मविकास का मार्ग प्रशस्त करे-ये गुरु के छह स्वरूप बताए गए हैं।

4

श्लिष्टा क्रिया कस्यचिदात्मसंस्था सङ्क्रान्तिरन्यस्य विशेषयुक्ता। यस्योभयं साधु स शिक्षकाणां धुरि प्रतिष्ठापयितव्य एव॥

śliṣṭā kriyā kasyacid ātmasaṃsthā saṅkrāntir anyasya viśeṣayuktā । yasyobhayaṃ sādhu sa śikṣakāṇāṃ dhuri pratiṣṭhāpayitavya eva ॥

अर्थ

कुछ लोग स्वयं किसी कार्य को करने में बहुत निपुण होते हैं, जबकि कुछ अन्य लोग उस ज्ञान या कौशल को दूसरों तक बहुत अच्छी तरह पहुँचाने में विशेष योग्य होते हैं। जिस व्यक्ति में ये दोनों गुण, खुद में निपुणता और दूसरों को सिखाने की क्षमता, निहित हों, उसे ही सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों की श्रेणी में सबसे आगे स्थान दिया जाना चाहिए।

5

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः। सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्॥

vijñānasārathir yastu manaḥ pragrahavān naraḥ । so'dhvanaḥ pāram āpnoti tad viṣṇoḥ paramaṁ padam ॥

अर्थ

वह मनुष्य जिसकी विवेकपूर्ण बुद्धि वैज्ञानिक सारथि के समान जागरूक हो और जिसका मन संयमित हो, वह जीवन-पथ की जटिलताओं को पार कर परम लक्ष्य तक पहुँच जाता है।

6

श्रियः प्रदुग्धे विपदो रुणद्धि यशांसि सूते मलिनं प्रमार्ष्टि। संस्कारशौचेन परं पुनीते शुद्धा हि बुद्धिः किल कामधेनुः॥

śriyaḥ pradugdhe vipado ruṇaddhi yaśāṃsi sūte malinaṃ pramārṣṭi । saṃskāraśauchena paraṃ punīte śuddhā hi buddhiḥ kila kāmadhenuḥ ॥

अर्थ

शिक्षा के द्वारा संस्कारित और पवित्र बुद्धि विपत्तियों को दूर करती है तथा मनुष्य के जीवन में सफलता, सम्मान, शांति और उन्नति लाती है। वास्तव में, शिक्षित बुद्धि को हर प्रकार की इच्छाओं को पूर्ण करने वाली 'कामधेनु' के समान माना गया है।

7

अविज्ञातस्य विज्ञानं विज्ञातस्य च निश्चयः। आरम्भः कर्मणां शश्वदारब्धस्यान्तदर्शनम्॥

avijñātasya vijñānaṃ vijñātasya ca niścayaḥ । ārambhaḥ karmaṇāṃ śaśvadārabdhasyāntadarśanam ॥

अर्थ

अज्ञात ज्ञान को खोजने के लिए प्रयोग और अनुसंधान आवश्यक हैं। ज्ञात तथ्यों पर निर्णय और विश्लेषण ही शोध की शुरुआत है और अनुभव एवं अवलोकन से ही वह ज्ञान सत्यापित होता है।

8

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥

jñānaṃ te'haṃ savijñānam idaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ । yajjñātvā neha bhūyo'nyajjñātavyamavaśiṣyate ॥

अर्थ

समग्र और विज्ञानयुक्त ज्ञान प्राप्ति के बाद जीवन में जानने योग्य कुछ भी शेष नहीं रहता। ऐसा ज्ञान व्यक्ति को पूर्णता, स्पष्टता और सत्य की परम अनुभूति तक पहुँचा देता है।

9

शास्त्रे प्रतिष्ठा सहजश्च बोधः प्रागल्भ्यमभ्यस्तगुणा च वाणी। कालानुरोधः प्रतिभानवत्त्वमेते गुणाः कामदुघाः क्रियासु॥

śāstre pratiṣṭhā sahajaśca bodhaḥ prāgalbhyam abhyastaguṇā ca vāṇī । kālānurodhaḥ pratibhānavattvam ete guṇāḥ kāmadughāḥ kriyāsu ॥

अर्थ

विषय का प्रामाणिक ज्ञान, स्वाभाविक विवेकशीलता, निर्भीक आत्मविश्वास, अभ्यास से परिष्कृत ओजस्वी वाणी, समय की मांग को पहचानने की दूरदर्शिता और नित्य नवीन सूझबूझ- ये छह गुण मानव के प्रत्येक पुरुषार्थ में 'कामधेनु' के समान सिद्ध होते हैं, जो हर साध्य को साध देते हैं।

10

स्रोत अज्ञात

अन्तःस्थमेव यज्ज्ञानं ज्ञानादपि च यत्परम्। तदेव सर्वसंसारसारं सद्भिरुपास्यते॥

antaḥsthameva yajjñānaṁ jñānādapi ca yatparam । tadeva sarvasaṁsārasāraṁ sadbhirupāsyate ॥

अर्थ

जो ज्ञान हमारे भीतर स्थित है और जो सामान्य या बाहरी ज्ञान से भी श्रेष्ठ है, वही इस समस्त संसार का असली सार है। श्रेष्ठ पुरुषों और ज्ञानियों द्वारा उसी आंतरिक ज्ञान की उपासना की जाती है।

11

धन्यानामुत्तमं दाक्ष्यं धनानामुत्तमं श्रुतम्। लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा॥

dhanyānām uttamaṃ dākṣyaṃ dhanānām uttamaṃ śrutam । lābhānāṃ śreya ārogyaṃ sukhānāṃ tuṣṭir uttamā ॥

अर्थ

सभी श्रेष्ठ गुणों में कौशल सबसे उत्तम है, सभी धनों में विद्या सबसे बड़ी सम्पत्ति है, सभी लाभों में उत्तम स्वास्थ्य सबसे बड़ा लाभ है और सभी सुखों में सन्तोष सबसे श्रेष्ठ है।

12

ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो बलं स्मृतिः। स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिर्धैर्यं मार्दवमेव च॥

jñānaṁ viraktiḥ aiśvaryam śauryaṁ tejo balaṁ smṛtiḥ । svātantryaṁ kauśalaṁ kāntiḥ dhairyaṁ mārdavaṁ eva ca ॥

अर्थ

ज्ञान, वैराग्य, धन, शौर्य, शक्ति, बल, स्मृति तथा स्वतन्त्रता, कौशल, दीप्ति, धैर्य एवं कोमलता से युक्त होना ही जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।