अन्तःस्थमेव यज्ज्ञानं - ज्ञान का सार

9 अप्रैल 2026

अन्तःस्थमेव यज्ज्ञानं ज्ञानादपि च यत्परम्। तदेव सर्वसंसारसारं सद्भिरुपास्यते॥

antaḥsthameva yajjñānaṁ jñānādapi ca yatparam । tadeva sarvasaṁsārasāraṁ sadbhirupāsyate ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

हमारी विरासत और संस्कृति हमें यही सिखाती आई है कि सच्चा ज्ञान और उसका सदुपयोग ही राष्ट्र की प्रगति का आधार है। इसी मार्ग पर चलकर आज हमारे देश के युवा समृद्ध और सशक्त भारत को गढ़ने में जुटे हैं।

अन्तःस्थमेव यज्ज्ञानं ज्ञानादपि च का अर्थ

जो ज्ञान हमारे भीतर स्थित है और जो सामान्य या बाहरी ज्ञान से भी श्रेष्ठ है, वही इस समस्त संसार का असली सार है। श्रेष्ठ पुरुषों और ज्ञानियों द्वारा उसी आंतरिक ज्ञान की उपासना की जाती है।

शब्दार्थ

अन्तःस्थम्antaḥstham

भीतर स्थित

अन्तर् + √स्था

एवeva

ही

यत् ज्ञानम्yaj jñānam

जो ज्ञान

√ज्ञा

ज्ञानात्jñānāt

ज्ञान से

√ज्ञा

अपि चapi ca

और भी

यत् परम्yat param

जो परे है

पर

तत् एवtad eva

वही

तद्

सर्वसंसारसारम्sarvasaṁsārasāram

समस्त संसार का सार

सर्व + सम् + √सृ + सार

सद्भिःsadbhiḥ

सज्जनों के द्वारा

सत्, √अस्

उपास्यतेupāsyate

उपासना की जाती है

उप + √आस्

उपासना की जाती है—केवल जानी नहीं जाती।

व्याख्या

इस अस्रोतित श्लोक की एक सम्भव दार्शनिक व्याख्या इसे "प्रत्यगात्मा" या आंतरिक ज्ञान की ओर संकेत मानती है। इस व्याख्या में यह बताता है कि यद्यपि बाहर का ज्ञान (अपरा विद्या) जगत के व्यवहार के लिए आवश्यक है, परंतु संसार का वास्तविक सार (सार) वह ज्ञान है जो "अन्तःस्थम्" (भीतर स्थित) है। इसे सामान्य ज्ञान से भी "परम्" यानी श्रेष्ठ कहा गया है, जिसे केवल वैचारिक ज्ञान से परे अनुभूति के रूप में समझा जा सकता है। संत और ज्ञानी इसी आंतरिक प्रकाश को सर्वाधिक महत्व देते हैं, क्योंकि यही अशांत संसार में परम शांति और स्थिरता प्रदान करता है। इस व्याख्या में दूसरा चरण जानबूझकर विरोधाभास रखता है—'ज्ञानादपि च यत्परम्' अर्थात् ज्ञान से भी परे—जिसे परम्परा ज्ञेय और ज्ञाता के भेद से सुलझाती है: पहले में कितनी भी वृद्धि दूसरे तक नहीं पहुँचती। अन्तिम क्रिया भी सावधानी से चुनी गई है। वह 'उपास्यते' है अर्थात् उपासना की जाती है, 'ज्ञायते' नहीं। श्लोक जिसका वर्णन करता है वह निरन्तर चलने वाली साधना है, अर्जित की गई वस्तु नहीं। इस श्लोक का स्रोत अभी अनुसन्धेय है।

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