ज्ञानं तेऽहं - पूर्ण ज्ञान

18 फ़र॰ 2026

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥

jñānaṃ te'haṃ savijñānam idaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ । yajjñātvā neha bhūyo'nyajjñātavyamavaśiṣyate ॥

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः का अर्थ

समग्र और विज्ञानयुक्त ज्ञान प्राप्ति के बाद जीवन में जानने योग्य कुछ भी शेष नहीं रहता। ऐसा ज्ञान व्यक्ति को पूर्णता, स्पष्टता और सत्य की परम अनुभूति तक पहुँचा देता है।

शब्दार्थ

ज्ञानम्jñānam

ज्ञान

√ज्ञा

तेte

तुझे

युष्मद्

अहम्aham

मैं

अस्मद्

सविज्ञानम्savijñānam

विज्ञान सहित

स + वि + √ज्ञा

इदम्idam

यह

इदम्

वक्ष्यामिvakṣyāmi

कहूँगा

√वच्

उत्तम पुरुष—श्रीकृष्ण का अर्जुन को वचन।

अशेषतःaśeṣataḥ

पूर्ण रूप से

अ + √शिष्

यत् ज्ञात्वाyaj jñātvā

जिसे जानकर

√ज्ञा

न इह भूयःneha bhūyaḥ

फिर यहाँ कुछ नहीं

अन्यत् ज्ञातव्यम्anyaj jñātavyam

और कुछ जानने योग्य

√ज्ञा

अवशिष्यतेavaśiṣyate

शेष रहता है

अव + √शिष्

व्याख्या

भगवद गीता के इस श्लोक में, कृष्ण अर्जुन को 'ज्ञान' (सैद्धांतिक ज्ञान) के साथ-साथ 'विज्ञान' (अनुभवात्मक ज्ञान या व्यावहारिक बोध) प्रदान करने का वचन देते हैं। यह श्लोक इस बात पर जोर देता है कि एक बार जब यह समग्र ज्ञान प्राप्त हो जाता है, तो अस्तित्व की समझ में कोई कमी नहीं रह जाती। यह आध्यात्मिक जिज्ञासा की पराकाष्ठा है जहाँ साधक केवल बौद्धिक समझ से आगे बढ़कर सत्य के प्रत्यक्ष अनुभव की ओर बढ़ता है। साझा अर्थ इस श्लोक को सामान्य कथन के रूप में रखता है, जबकि मूल पाठ प्रथम पुरुष में है—'ते अहं वक्ष्यामि', अर्थात् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मैं तुझे यह ज्ञान कहूँगा। यह वचन गुरु का शिष्य को दिया गया आश्वासन है।

मूल पोस्ट

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भगवद् गीता से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता

विद्या पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
28 सित॰ 2026
चरक संहिता

सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥

sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥

चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।

स्वास्थ्यधर्मसमृद्धिआध्यात्मिकता