ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥
ūrdhvamūlam adhaḥśākham aśvatthaṃ prāhur avyayam । chandāṃsi yasya parṇāni yas taṃ veda sa vedavit ॥
प्रधानमंत्री का संदेशज्ञान का दीपक ना केवल अज्ञानता के अंधकार को मिटाता है, बल्कि समस्त जगत को आलोकित भी करता है। महर्षि दयानंद सरस्वती जी का दिव्य व्यक्तित्व इसका साक्षात उदाहरण है।
ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् का अर्थ
ज्ञानी पुरुष इस संसार को ऊर्ध्वमूल और अधःशाखा वाला अविनाशी पीपलवृक्ष कहते हैं। जिसके पत्ते छन्द अर्थात् वेद हैं, ऐसे संसाररूपी वृक्ष को जो जानता है, वह वेदों का ज्ञाता कहा गया है।
शब्दार्थ
- ऊर्ध्वमूलम्ūrdhvamūlam
ऊपर मूल वाला
ऊर्ध्व + मूल
- अधःशाखम्adhaḥśākham
नीचे शाखाओं वाला
अधस् + शाखा
- अश्वत्थम्aśvattham
अश्वत्थ वृक्ष
अश्वत्थ
- प्राहुःprāhuḥ
कहते हैं
प्र + √अह्
- अव्ययम्avyayam
अव्यय
अ + वि + √इ
- छन्दांसिchandāṁsi
छन्द
√छन्द्
- यस्य पर्णानिyasya parṇāni
जिसके पत्ते
पर्ण
- यः तम् वेदyas taṁ veda
जो उसे जानता है
√विद्
- सः वेदवित्sa vedavit
वही वेदवित् है
वेद + √विद्
व्याख्या
भगवद गीता के 15वें अध्याय का यह महत्वपूर्ण श्लोक प्रकट अस्तित्व (संसार) की प्रकृति को समझाने के लिए एक उल्टे अश्वत्थ (पीपल) वृक्ष के रूपक का उपयोग करता है। 'ऊपर की जड़ें' सर्वोच्च चेतन स्रोत का प्रतीक हैं, जबकि 'नीचे की शाखाएं' भौतिक दुनिया की विविधता का प्रतिनिधित्व करती हैं। पत्तों का 'छन्द' (वेद) होना यह सुझाव देता है कि दुनिया के अनुष्ठान और ज्ञान इस अस्तित्व को पोषण और बाहरी संरचना प्रदान करते हैं। 'वेदवित्' (वेदों का ज्ञाता) होने का अर्थ केवल शास्त्रों को जानना नहीं है, बल्कि अंतर्निहित आध्यात्मिक स्रोत और दुनिया की क्षणिक प्रकृति को समझना है, जो व्यक्ति को शाखाओं में खो जाने के बजाय ऊपर की जड़ की खोज करने के लिए प्रेरित करता है।
मूल पोस्ट
भगवद् गीता से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
आध्यात्मिकता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।