भगवद् गीता से सुभाषित

भगवद् गीता के श्लोक संस्कृत पाठ, लिप्यंतरण, हिन्दी-अंग्रेज़ी अर्थ, व्याख्या और महाभारत में उनके प्रसंग सहित पढ़ें।

भगवद् गीता कुरुक्षेत्र युद्ध आरम्भ होने से ठीक पहले कृष्ण और अर्जुन के बीच हुआ संवाद है। यह महाभारत के भीष्म पर्व का भाग है और अर्जुन के उस नैतिक तथा भावनात्मक संकट से आरम्भ होती है जिसमें उसे कर्म का स्पष्ट मार्ग दिखाई नहीं देता।

कृष्ण का उत्तर कर्तव्य, अनुशासित कर्म, ज्ञान, भक्ति, आत्मसंयम और आत्मा के स्वरूप पर परस्पर जुड़ी हुई शिक्षा विकसित करता है। गीता के श्लोक स्वतंत्र रूप से बहुत उद्धृत होते हैं, किंतु पूरे संवाद के अंश के रूप में पढ़ने पर उनका आशय अधिक स्पष्ट होता है।

भ्रम से मुक्त होकर कर्म

गीता आध्यात्मिक दृष्टि को हर कठिन उत्तरदायित्व से पीछे हटना नहीं मानती। वह बार-बार पूछती है कि भय, अहंकार, आसक्ति और फल की चिंता के प्रभाव को कम करते हुए विवेकपूर्वक कर्म कैसे किया जाए।

इस संग्रह के पद्य आदर्श आचरण से नेतृत्व, शास्त्रीय मार्गदर्शन, स्वधर्म में साहस, दैवी गुण, ज्ञान और विश्व-वृक्ष के बिम्ब जैसे विषयों को स्पर्श करते हैं।

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महाभारत
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विदुर नीति
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इस संग्रह में भगवद् गीता के श्लोक

हर श्लोक पृष्ठ पर संस्कृत पाठ, अर्थ, व्याख्या, अध्याय-संदर्भ और महाभारत के साथ उसका मूल संबंध साथ रखा गया है।

नवीनतम अद्यतन: 5 अक्टू॰ 2026

2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
30 सित॰ 2026
भगवद् गीता

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।

कर्मकर्तव्यसफलता
24 सित॰ 2026
भगवद् गीता

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥

भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।

नैतिकताशांतिविद्याअनुशासन
4 अग॰ 2026
भगवद् गीता

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

na hi jñānena sadṛśaṁ pavitram iha vidyate । tat svayaṁ yogasaṁsiddhaḥ kālenātmani vindati ॥

ज्ञान से बढ़कर कोई पवित्र करने वाला नहीं; योग से सिद्ध साधक उसे समय आने पर अपने भीतर पाता है।

विद्यायोगआत्मज्ञान
29 मई 2026
भगवद् गीता

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥

tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucam adroho nātimānitā । bhavanti sampadaṃ daivīm abhijātasya bhārata ॥

भगवद् गीता का यह श्लोक तेजस्विता, क्षमा, धैर्य, शुचिता, अद्रोह और अहंकाररहित विनम्रता जैसे छह दैवी गुणों का वर्णन करता है।

चरित्रविनम्रतानैतिकतासाहस
20 मई 2026
भगवद् गीता

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥

tasmācchāstraṁ pramāṇaṁ te kāryākāryavyavasthitau । jñātvā śāstravidhānoktaṁ karma kartum ihārhasi ॥

भगवद्गीता का यह ऐतिहासिक श्लोक प्रतिपादित करता है कि कर्तव्य और अकर्तव्य का निर्णय व्यक्तिगत इच्छा के बजाय एक प्रामाणिक और सुव्यवस्थित व्यवस्था पर आधारित होना चाहिए।

धर्मनैतिकताकर्तव्यविद्याज्ञान
8 मई 2026
भगवद् गीता

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥

svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi । dharmyāddhi yuddhācchreyo'nyatkṣatriyasya na vidyate ॥

अर्जुन को दिए गए भगवान श्रीकृष्ण के इस उपदेश में स्पष्ट किया गया है कि एक योद्धा के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है।

कर्तव्यधर्मसाहसदृढ़ता
18 फ़र॰ 2026
भगवद् गीता

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥

jñānaṃ te'haṃ savijñānam idaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ । yajjñātvā neha bhūyo'nyajjñātavyamavaśiṣyate ॥

श्रीकृष्ण ऐसे ज्ञान और अनुभूत बोध का उपदेश देते हैं, जिसके बाद साधक के लिए जानने योग्य कोई आवश्यक सत्य शेष नहीं रहता।

विद्याआत्मज्ञानज्ञानआध्यात्मिकता
12 फ़र॰ 2026
भगवद् गीता

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥

ūrdhvamūlam adhaḥśākham aśvatthaṃ prāhur avyayam । chandāṃsi yasya parṇāni yas taṃ veda sa vedavit ॥

संसाररूपी अश्वत्थ वृक्ष और वेदों के ज्ञान को समझाता यह गीता का श्लोक अध्यात्म की गहरी समझ प्रदान करता है।

आध्यात्मिकताआत्मज्ञानविद्याज्ञान
25 दिस॰ 2025
भगवद् गीता

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

yad yad ācarati śreṣṭhas tat tad evetaro janaḥ । sa yat pramāṇaṃ kurute lokas tad anuvartate ॥

श्रेष्ठ व्यक्तियों का आचरण और उनके स्थापित मानदंड समाज को दिशा देते हैं, क्योंकि अन्य लोग स्वाभाविक रूप से उनका अनुसरण करते हैं।

नेतृत्वचरित्रनैतिकताकर्तव्य