स्वे स्वे कर्मणि - स्वकर्म से सिद्धि

30 सित॰ 2026

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं का अर्थ

जो मनुष्य अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्पर रहते हैं, वे परम सिद्धि को प्राप्त करते हैं। इसलिए अपने कर्मों में लगे मनुष्यों को यह अवश्य सुनना और जानना चाहिए कि अपने कर्मों का पालन करते हुए परम सिद्धि किस प्रकार प्राप्त की जाती है।

शब्दार्थ

स्वे स्वेsve sve

अपने-अपने

स्व

कर्मणिkarmaṇi

कर्म या कर्तव्य में

कर्मन्

अभिरतःabhirataḥ

तत्पर या अनुरक्त

अभि + √रम्

संसिद्धिम्saṁsiddhim

पूर्ण सिद्धि को

सम् + √सिध्

लभतेlabhate

प्राप्त करता है

√लभ्

नरःnaraḥ

मनुष्य

नर

स्वकर्मनिरतःsvakarmanirataḥ

अपने कर्म में लगा हुआ

स्व + कर्मन् + नि + √रम्

सिद्धिम्siddhim

सिद्धि को

√सिध्

यथाyathā

जिस प्रकार

विन्दतिvindati

पाता है

√विद्

तत् शृणुtacchṛṇu

उसे सुनो

तद् + √श्रु

व्याख्या

श्लोक कहता है कि अपने कर्म में तत्पर मनुष्य संसिद्धि, अर्थात् पूर्ण सिद्धि, प्राप्त करता है। ‘स्वे स्वे’ की पुनरुक्ति बताती है कि सबके कर्म एक जैसे नहीं होते, जबकि ‘स्वकर्म’ प्रत्येक व्यक्ति को अपने हिस्से के कार्य पर ध्यान देने को कहता है। ‘अभिरतः’ और ‘निरतः’ दोनों शब्द स्थिर लगन का बोध कराते हैं, इसलिए सिद्धि को क्षणिक प्रयास के बजाय निरन्तर कर्मनिष्ठा से जोड़ा गया है। अन्त में ‘तच्छृणु’ कहकर यह बताने की भूमिका बाँधी जाती है कि ऐसी निष्ठा सिद्धि तक कैसे पहुँचाती है। आज के जीवन में इसका सीधा संकेत है कि मनुष्य अपने उत्तरदायित्व को पहचाने और उसे पूरे मन से निभाए।

मूल पोस्ट

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भगवद् गीता से और सुभाषित

स्रोत पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
24 सित॰ 2026
भगवद् गीता

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥

भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।

नैतिकताशांतिविद्याअनुशासन

कर्म पर और सुभाषित

विषय पृष्ठ देखें
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता
25 सित॰ 2026
योगवासिष्ठ

यथा यथा प्रयत्नः स्याद्भवेदाशु फलं तथा। इति पौरुषमेवास्ति दैवमस्तु तदेव च॥

yathā yathā prayatnaḥ syād bhaved āśu phalaṃ tathā । iti pauruṣam evāsti daivam astu tad eva ca ॥

योगवासिष्ठ का यह श्लोक फल को मनुष्य के प्रयत्न से जोड़ता है और पुरुषार्थ को ही दैव मानने की शिक्षा देता है।

दृढ़तासफलता
1 सित॰ 2026
विदुर नीति

यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे। कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते॥

yasya kṛtyaṃ na jānanti mantraṃ vā mantritaṃ pare । kṛtam evāsya jānanti sa vai paṇḍita ucyate ॥

महाभारत का यह श्लोक उसे पण्डित कहता है जिसकी मन्त्रणा और कार्य पूर्ण होने तक दूसरों को ज्ञात नहीं होते।

ज्ञानकर्म