उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः का अर्थ
जिस व्यक्ति के पास उद्यम अर्थात् परिश्रम करने की इच्छाशक्ति, साहस, धैर्य, कार्य करने की शक्ति, विद्या और पराक्रम - ये छह गुण विद्यमान होते हैं, वहाँ स्वयं ईश्वर भी सहायता करने के लिए उपस्थित रहते हैं।
शब्दार्थ
- उद्यमःudyamaḥ
उद्यम, परिश्रम
- साहसम्sāhasam
साहस
- धैर्यम्dhairyam
धैर्य, स्थिरता
- बुद्धिःbuddhiḥ
बुद्धि, विवेक
- शक्तिःśaktiḥ
शक्ति, सामर्थ्य
- पराक्रमःparākramaḥ
पराक्रम, पुरुषार्थ
- षड् एतेṣaḍ ete
ये छह
- यत्र वर्तन्तेyatra vartante
जहाँ विद्यमान हैं
- तत्रtatra
वहाँ
- दैवम्daivam
दैव, ईश्वरीय सहायता
- सहायकृत्sahāyakṛt
सहायता करने वाला
व्याख्या
श्लोक छह ऐसे गुणों को एक साथ रखता है जो मनुष्य को समर्थ बनाते हैं: उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम। 'उद्यम' काम आरम्भ करने और उसमें श्रम लगाने की तत्परता है, जबकि 'धैर्य' कठिनाई के बीच टिके रहने की दृढ़ता है। बुद्धि उचित निर्णय देती है, शक्ति उसे पूरा करने की सामर्थ्य देती है और पराक्रम उस सामर्थ्य को निर्णायक कर्म में बदलता है। अंतिम पंक्ति दैवी सहायता को पुरुषार्थ का विकल्प नहीं बनाती; वह बताती है कि सहायता वहीं मिलती है जहाँ ये गुण पहले से विद्यमान हों। इसका व्यावहारिक संदेश है कि भाग्य से सहयोग माँगने से पहले मनुष्य स्वयं को कर्म के योग्य बनाए।
स्रोत और पाठभेद
यह श्लोक यहाँ भी उपलब्ध है
मूल पोस्ट
सुभाषितरत्नभाण्डागारम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥
महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।
स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।
दृढ़ता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।