उद्यमः साहसं धैर्यं - सहायता के योग्य छह गुण

29 सित॰ 2026

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः का अर्थ

जिस व्यक्ति के पास उद्यम अर्थात् परिश्रम करने की इच्छाशक्ति, साहस, धैर्य, कार्य करने की शक्ति, विद्या और पराक्रम - ये छह गुण विद्यमान होते हैं, वहाँ स्वयं ईश्वर भी सहायता करने के लिए उपस्थित रहते हैं।

शब्दार्थ

उद्यमःudyamaḥ

उद्यम, परिश्रम

साहसम्sāhasam

साहस

धैर्यम्dhairyam

धैर्य, स्थिरता

बुद्धिःbuddhiḥ

बुद्धि, विवेक

शक्तिःśaktiḥ

शक्ति, सामर्थ्य

पराक्रमःparākramaḥ

पराक्रम, पुरुषार्थ

षड् एतेṣaḍ ete

ये छह

यत्र वर्तन्तेyatra vartante

जहाँ विद्यमान हैं

तत्रtatra

वहाँ

दैवम्daivam

दैव, ईश्वरीय सहायता

सहायकृत्sahāyakṛt

सहायता करने वाला

व्याख्या

श्लोक छह ऐसे गुणों को एक साथ रखता है जो मनुष्य को समर्थ बनाते हैं: उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम। 'उद्यम' काम आरम्भ करने और उसमें श्रम लगाने की तत्परता है, जबकि 'धैर्य' कठिनाई के बीच टिके रहने की दृढ़ता है। बुद्धि उचित निर्णय देती है, शक्ति उसे पूरा करने की सामर्थ्य देती है और पराक्रम उस सामर्थ्य को निर्णायक कर्म में बदलता है। अंतिम पंक्ति दैवी सहायता को पुरुषार्थ का विकल्प नहीं बनाती; वह बताती है कि सहायता वहीं मिलती है जहाँ ये गुण पहले से विद्यमान हों। इसका व्यावहारिक संदेश है कि भाग्य से सहयोग माँगने से पहले मनुष्य स्वयं को कर्म के योग्य बनाए।

मूल पोस्ट

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सुभाषितरत्नभाण्डागारम् से और सुभाषित

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5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

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21 सित॰ 2026
विदुर नीति

एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥

eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥

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धर्मशांतिविद्याअहिंसा
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आर्यासप्तशती

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svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥

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चरित्रनिःस्वार्थ सेवास्वतंत्रतासमृद्धि

दृढ़ता पर और सुभाषित

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कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

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साहसविनम्रतासम्मान
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समराङ्गणसूत्रधार

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