रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥
ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥
रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे का अर्थ
जिस प्रकार देवताओं ने समुद्र से रत्नों को प्राप्त करने के बाद भी अमृत की प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयत्न किया, उसी प्रकार धीर और दृढ़ निश्चयी व्यक्ति भी अपने निश्चित लक्ष्य की प्राप्ति तक निरन्तर प्रयत्नशील रहते हैं।
शब्दार्थ
- रत्नैःratnaiḥ
रत्नों से, रत्नों के कारण
रत्न
तृतीया बहुवचन; महाब्धेः के साथ सन्धि में 'रत्नैर्' रूप है।
- महाब्धेःmahābdheḥ
महासागर के
महा + अब्धि
- तुतुषुःtutuṣuḥ
सन्तुष्ट हुए
√तुष्
लिट् लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन; तुतुषुः + न की सन्धि से 'तुतुषुर्न'।
- नna
नहीं
- देवाःdevāḥ
देवता
देव
- न भेजिरेna bhejire
अनुभव नहीं किया, प्राप्त नहीं हुए
√भज्
- भीमविषेणbhīmaviṣeṇa
भयंकर विष के कारण
भीम + विष
- भीतिम्bhītim
भय को
भीति
- सुधाम्sudhām
अमृत को
सुधा
- विनाvinā
बिना
- न प्रययुःna prayayuḥ
नहीं गए, प्रवृत्त नहीं हुए
प्र + √या
- विरामम्virāmam
विराम को
वि + √रम्
- निश्चितार्थात्niścitārthāt
निश्चित उद्देश्य से
निश्चित + अर्थ
पञ्चमी एकवचन; विरमन्ति से पहले सन्धि में 'निश्चितार्थाद्'।
- न विरमन्तिna viramanti
नहीं रुकते, पीछे नहीं हटते
वि + √रम्
- धीराःdhīrāḥ
धीर, दृढ़ व्यक्ति
धीर
व्याख्या
यह श्लोक समुद्र-मन्थन का प्रसंग सामने रखता है, जिसमें देवताओं को अमृत से पहले मूल्यवान रत्न और भयंकर विष मिले। न आरम्भिक उपलब्धियों ने उनका प्रयास रोका, न संकट ने उन्हें भयभीत करके पीछे हटाया। 'न तुतुषुः', 'न भेजिरे' और 'न प्रययुः' की पुनरावृत्ति उनके तीन स्पष्ट निषेध दिखाती है: वे सन्तुष्ट नहीं हुए, डरे नहीं और रुके नहीं। अन्तिम कथन इसी चित्र को 'धीर' व्यक्ति के स्वभाव से जोड़ता है, जो अपने निश्चित उद्देश्य से विमुख नहीं होता। श्लोक यह नहीं कहता कि बीच की हर उपलब्धि तुच्छ है या हर संकट की उपेक्षा करनी चाहिए। उसका अधिक सीमित संदेश यह है कि योग्य लक्ष्य निश्चित कर लेने वाला व्यक्ति आंशिक प्रगति को पूर्णता नहीं मानता और कठिनाई आते ही प्रयास नहीं छोड़ता।
मूल पोस्ट
नीतिशतकम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंभवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैर्नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः। अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥
bhavanti namrāstaravaḥ phalodgamair navāmbubhir dūravilambino ghanāḥ । anuddhatāḥ satpuruṣāḥ samṛddhibhiḥ svabhāva evaiṣa paropakāriṇām ॥
नीतिशतकम् का यह श्लोक फलयुक्त वृक्षों और जलभरे मेघों के माध्यम से बताता है कि सज्जन समृद्धि में और विनम्र हो जाते हैं।
जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः। नास्ति येषां यशःकाये जरामरणजं भयम्॥
jayanti te sukṛtino rasasiddhāḥ kavīśvarāḥ । nāsti yeṣāṃ yaśaḥkāye jarāmaraṇajaṃ bhayam ॥
भर्तृहरि के नीतिशतकम् का यह श्लोक रससिद्ध कवीश्वरों के उस यश की बात करता है जो जरा और मृत्यु से परे है।
पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्। नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः॥
padmākaraṁ dinakaro vikacīkaroti candro vikāsayati kairavacakravālam । nābhyarthito jaladharo’pi jalaṁ dadāti santaḥ svayaṁ parahiteṣu kṛtābhiyogāḥ ॥
सूर्य, चन्द्र और मेघों के उदाहरण से यह श्लोक बताता है कि सज्जन व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ या प्रार्थना के दूसरों का भला करते हैं।
दृढ़ता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंउद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
यथा यथा प्रयत्नः स्याद्भवेदाशु फलं तथा। इति पौरुषमेवास्ति दैवमस्तु तदेव च॥
yathā yathā prayatnaḥ syād bhaved āśu phalaṃ tathā । iti pauruṣam evāsti daivam astu tad eva ca ॥
योगवासिष्ठ का यह श्लोक फल को मनुष्य के प्रयत्न से जोड़ता है और पुरुषार्थ को ही दैव मानने की शिक्षा देता है।
अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥
advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥
महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।