जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः कवीश्वराः। नास्ति येषां यशःकाये जरामरणजं भयम्॥
jayanti te sukṛtino rasasiddhāḥ kavīśvarāḥ । nāsti yeṣāṃ yaśaḥkāye jarāmaraṇajaṃ bhayam ॥
प्रधानमंत्री का संदेशभारतवर्ष की एकता, अखंडता और स्वाभिमान के लिए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान हर पीढ़ी को प्रेरित करता रहेगा।
जयन्ति ते सुकृतिनो रससिद्धाः का अर्थ
वे पुण्य आत्माएं और महापुरुष सदा के लिए अमर हो जाते हैं, जिन्होंने समाज के लिए उत्कृष्ट कार्य किए हैं या अपना बलिदान दिया है। उनके भौतिक शरीर भले ही नष्ट हो जाएं, लेकिन उनके यश रूपी शरीर को कभी बुढ़ापे या मृत्यु का भय नहीं होता। वे इतिहास में सदा जीवित रहते हैं।
शब्दार्थ
- जयन्तिjayanti
जयशील होते हैं
√जि
- तेte
वे
तद्
- सुकृतिनःsukṛtinaḥ
सुकृती
सु + √कृ
- रससिद्धाःrasasiddhāḥ
रस में सिद्ध
रस + √सिध्
- कवीश्वराःkavīśvarāḥ
कवीश्वर
कवि + ईश्वर
- न अस्तिnāsti
नहीं है
√अस्
- येषाम्yeṣām
जिनके
यद्
- यशःकायेyaśaḥkāye
यश रूपी शरीर में
यशस् + काय
- जरामरणजम्jarāmaraṇajam
जरा और मृत्यु से उत्पन्न
जरा + मरण + √जन्
- भयम्bhayam
भय
√भी
व्याख्या
अपने मूल अर्थ में यह श्लोक महान कवियों की प्रशंसा करता है। 'रससिद्धाः कवीश्वराः' वे श्रेष्ठ कवि हैं जिन्हें रस की सिद्धि प्राप्त है, अर्थात जो अपनी वाणी से गहरे सौन्दर्यबोध और भावानुभूति को जगाने में समर्थ हैं। उत्तरवर्ती नवरस-परंपरा की दृष्टि से देखें तो यह उन कवियों की ओर संकेत करता है जिनकी कविता मानवीय भावों की पूरी व्याप्ति को सहजता से व्यक्त कर सकती है। ऐसे सर्जकों के लिए भर्तृहरि कहते हैं कि देह जरा और मृत्यु को प्राप्त हो सकती है, पर उनका 'यशःकाय' इनसे भयभीत नहीं होता। प्रधानमंत्री के संदेश में इसी काव्यात्मक भाव को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के राष्ट्रीय एकता, अखंडता और स्वाभिमान के लिए किए गए बलिदान से जोड़ा गया है। यह मूल साहित्यिक अर्थ का व्यापक प्रयोग है: कवि अपने रसपूर्ण शब्दों से स्मृति में अमर रहता है, और सार्वजनिक जीवन का व्यक्ति अपने कर्मों से। दोनों में साझा सूत्र यह है कि कुछ कृतित्व और कुछ जीवन देह की सीमा से आगे जाकर लोकस्मृति में जीवित रहते हैं।
स्रोत और पाठभेद
मूल पोस्ट
नीतिशतकम् से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥
ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥
भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
विद्या पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।