शुचित्वं त्यागिता शौर्यं - सच्चे मित्र के गुण

5 अक्टू॰ 2026

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं का अर्थ

हृदय की निर्मलता, त्याग, भावना, शूरता, सुख और दुःख में समान भाव, दक्षता, अनुराग और सच्चाई - ये केवल सामान्य मित्र के गुण नहीं हैं, बल्कि एक उदार हृदय एवं विशिष्ट व्यक्तित्व वाले मनुष्य की पहचान हैं।

शब्दार्थ

शुचित्वंśucitvaṃ

पवित्रता, निष्कपटता

त्यागिताtyāgitā

दानशीलता, देने की इच्छा

शौर्यंśauryaṃ

साहस, वीरता

सामान्यंsāmānyaṃ

समानता, समभाव

सुखदुःखयोःsukhaduḥkhayoḥ

सुख और दुःख में

दाक्षिण्यंdākṣiṇyaṃ

शिष्टता, अनुकूल और विचारशील व्यवहार

चca

और

दाक्षिण्यं च + अनुरक्तिः + च से दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च बनता है।

अनुरक्तिःanuraktiḥ

अनुराग, मित्र के प्रति स्नेह

चca

और

सत्यताsatyatā

सच्चाई, सत्यनिष्ठा

चca

और

सुहृद्गुणाःsuhṛdguṇāḥ

सच्चे मित्र के गुण

सुहृद् + गुणाः। पहले गिनाए गए गुणों को मित्र के गुण कहा गया है।

व्याख्या

यह श्लोक एक सुहृदय मित्र के गुण गिनाता है और अंत में उन्हें सुहृद्गुणाः कहता है। शुचित्व का आशय मन और नीयत की निर्मलता से है, त्यागिता देने की इच्छा को और शौर्य साहस को व्यक्त करता है। सुखदुःखयोः सामान्यं सुख और दुःख में समान भाव रखने की बात कहता है, जिससे मित्रता अनुकूल परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहती। दाक्षिण्य में शिष्टता और दूसरे की भावनाओं का ध्यान रखने का भाव है, जबकि अनुरक्ति उस व्यवहार में अपनापन जोड़ती है। सत्यता मित्रों के बीच भरोसे का आधार बनती है। आज के जीवन में इन गुणों का अभ्यास ईमानदार सलाह देने और कठिन समय में मित्र का साथ निभाने से हो सकता है।

मूल पोस्ट

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हितोपदेश से और सुभाषित

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29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
18 सित॰ 2026
आर्यासप्तशती

स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥

svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥

मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।

चरित्रनिःस्वार्थ सेवास्वतंत्रतासमृद्धि
3 सित॰ 2026
मालविकाग्निमित्रम्

पात्रविशेषे न्यस्तं गुणान्तरं व्रजति शिल्पमाधातुः। जलमिव समुद्रशुक्तौ मुक्ताफलतां पयोदस्य॥

pātraviśeṣe nyastaṃ guṇāntaraṃ vrajati śilpam ādhātuḥ । jalam iva samudraśuktau muktāphalatāṃ payodasya ॥

कालिदास का यह श्लोक योग्य पात्र में विकसित कौशल की तुलना सीप में मोती बनने वाले मेघजल से करता है।

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चरित्र पर और सुभाषित

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6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

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विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता
2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

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चरित्रविनम्रतासामंजस्य
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नीतिशतकम्

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दृढ़तासाहस