अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
प्रधानमंत्री का संदेशपूज्य बापू का संपूर्ण जीवन सत्य, अहिंसा, करुणा और सेवा का ऐसा प्रकाशस्तंभ है, जो हर युग में मानवता का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण का अर्थ
जो व्यक्ति किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मैत्री और करुणा का भाव रखता है, जो ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में समभाव रखता है और क्षमाशील है-वही श्रेष्ठ साधक है।
व्याख्या
यह श्लोक ऐसे व्यक्ति के गुण बताता है जो किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता और सबके प्रति मैत्री तथा करुणा रखता है। निर्मम का आशय वस्तुओं और संबंधों पर "मेरा" होने की पकड़ से मुक्ति है, जबकि निरहङ्कार अहंकार से रहित भाव को व्यक्त करता है। समदुःखसुखः में दुःख और सुख साथ आते हैं, जिससे दोनों परिस्थितियों में मन की स्थिरता का बोध होता है, और क्षमी क्षमा करने तथा चोट सहने की क्षमता बताता है। इन गुणों के साथ दूसरों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील रहते हुए भी अपना मन संतुलित रखा जा सकता है। साथ का संदेश गांधीजी के सत्य, अहिंसा, करुणा और सेवा से भरे जीवन के माध्यम से इस शिक्षा को आज के संदर्भ से जोड़ता है। रोजमर्रा के मतभेदों में इसका अभ्यास द्वेष से बचने और अपने अहंकार के बजाय सामने वाले की स्थिति को समझने से शुरू हो सकता है।
मूल पोस्ट
भगवद् गीता से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंस्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥
महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।
चरित्र पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंस्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
मरुभूमि में खड़े वृक्ष की तरह सत्पुरुष के लिए स्वाधीन समृद्धि, दूसरों का आधार, ऊँचाई और छाया सहज हैं, इसलिए उसका जीवित रहना ही कामना के योग्य है।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥
sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥
अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।
सद्भिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत सङ्गतिम्। सद्भिर्विवादं मैत्रीं च नासद्भिः किञ्चिदाचरेत्॥
sadbhir eva sahāsīta sadbhiḥ kurvīta saṅgatim । sadbhir vivādaṃ maitrīṃ ca nāsadbhiḥ kiṃcid ācaret ॥
गरुड पुराण का यह श्लोक सज्जनों के साथ रहने, संवाद करने और मैत्री रखने की सीख देता है।