अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
प्रधानमंत्री का संदेशपूज्य बापू का संपूर्ण जीवन सत्य, अहिंसा, करुणा और सेवा का ऐसा प्रकाशस्तंभ है, जो हर युग में मानवता का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण का अर्थ
जो व्यक्ति किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबके प्रति मैत्री और करुणा का भाव रखता है, जो ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में समभाव रखता है और क्षमाशील है-वही श्रेष्ठ साधक है।
शब्दार्थ
- अद्वेष्टाadveṣṭā
किसी से द्वेष न करने वाला
- सर्वभूतानांsarvabhūtānāṃ
सभी प्राणियों के प्रति
- मैत्रःmaitraḥ
मैत्रीभाव रखने वाला
- करुणkaruṇa
करुणाशील
एव से पहले करुणः का संधिरूप।
- एवeva
ही, निश्चय ही
- चca
और
- निर्ममोnirmamo
मेरा होने के भाव से रहित
निरहङ्कारः से पहले निर्ममः का संधिरूप।
- निरहङ्कारःnirahaṅkāraḥ
अहंकार से रहित
- समदुःखसुखःsamaduḥkhasukhaḥ
दुःख और सुख में समान भाव रखने वाला
सम + दुःख + सुख, दोनों अवस्थाओं में समान भाव।
- क्षमीkṣamī
क्षमाशील, कष्ट सहने वाला
व्याख्या
यह श्लोक ऐसे व्यक्ति के गुण बताता है जो किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता और सबके प्रति मैत्री तथा करुणा रखता है। निर्मम का आशय वस्तुओं और संबंधों पर "मेरा" होने की पकड़ से मुक्ति है, जबकि निरहङ्कार अहंकार से रहित भाव को व्यक्त करता है। समदुःखसुखः में दुःख और सुख साथ आते हैं, जिससे दोनों परिस्थितियों में मन की स्थिरता का बोध होता है, और क्षमी क्षमा करने तथा चोट सहने की क्षमता बताता है। इन गुणों के साथ दूसरों की पीड़ा के प्रति संवेदनशील रहते हुए भी अपना मन संतुलित रखा जा सकता है। साथ का संदेश गांधीजी के सत्य, अहिंसा, करुणा और सेवा से भरे जीवन के माध्यम से इस शिक्षा को आज के संदर्भ से जोड़ता है। रोजमर्रा के मतभेदों में इसका अभ्यास द्वेष से बचने और अपने अहंकार के बजाय सामने वाले की स्थिति को समझने से शुरू हो सकता है।
मूल पोस्ट
भगवद् गीता से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।
चरित्र पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंवत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥
vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥
भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।
ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।