भवन्ति नम्रास्तरवः - समृद्धि में विनम्रता

7 जुल॰ 2026

भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैर्नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः। अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥

bhavanti namrāstaravaḥ phalodgamair navāmbubhir dūravilambino ghanāḥ । anuddhatāḥ satpuruṣāḥ samṛddhibhiḥ svabhāva evaiṣa paropakāriṇām ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

समृद्धि की शोभा विनम्रता और परोपकार में निहित है। सफलता वही सार्थक है, जिसमें लोककल्याण की भावना सर्वोपरि हो।

भवन्ति नम्रास्तरवः का अर्थ

जिस प्रकार फल आने पर वृक्ष और जल से भरे मेघ धरती की ओर झुक जाते हैं, उसी प्रकार परोपकारी सज्जन महात्मा समृद्धि और प्रसिद्धि प्राप्त करने के बाद अहंकार नहीं करते, अपितु अपना जीवन समाज की उन्नति के लिए समर्पित कर देते हैं।

शब्दार्थ

भवन्तिbhavanti

होते हैं

√भू

नम्राःnamrāḥ

नम्र

√नम्

तरवःtaravaḥ

वृक्ष

तरु

फलोद्गमैःphalodgamaiḥ

फल लगने से

फल + उद् + √गम्

नवाम्बुभिःnavāmbubhiḥ

नए जल से

नव + अम्बु

दूरविलम्बिनःdūravilambinaḥ

दूर तक झुके हुए

दूर + वि + √लम्ब्

घनाःghanāḥ

मेघ

घन

अनुद्धताःanuddhatāḥ

अनुद्धत, विनम्र

अन् + उद् + √हन्

सत्पुरुषाःsatpuruṣāḥ

सज्जन

सत् + पुरुष

समृद्धिभिःsamṛddhibhiḥ

समृद्धि से

सम् + √ऋध्

स्वभावः एव एषःsvabhāva evaiṣa

यही स्वभाव है

स्व + √भू

परोपकारिणाम्paropakāriṇām

परोपकारियों का

पर + उप + √कृ

व्याख्या

यह श्लोक सज्जनों के आचरण को समझाने के लिए प्रकृति की दो सुंदर छवियाँ देता है। फल लगने पर वृक्ष झुक जाता है, और नए जल से भरा मेघ भी धरती की ओर नीचे लटकता है। इसी प्रकार सत्पुरुष समृद्धि, सफलता या प्रतिष्ठा पाकर उद्दंड नहीं होते। उनकी महानता 'अनुद्धताः' होने में है, अर्थात अहंकार से रहित रहने में। अंतिम पद 'स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्' इस श्लोक का मूल संदेश है: दूसरों का हित करने वालों का स्वभाव ही ऐसा होता है। समृद्धि उन्हें समाज से दूर नहीं करती, बल्कि और अधिक उपयोगी, उदार और सुलभ बनाती है। प्रधानमंत्री के संदेश में यही भाव स्पष्ट होता है कि सफलता तभी सार्थक है जब उसके केंद्र में विनम्रता और लोककल्याण की भावना बनी रहे।

मूल पोस्ट

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नीतिशतकम् से और सुभाषित

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5 अक्टू॰ 2026
हितोपदेश

शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥

śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥

निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।

चरित्रनैतिकतासाहस
1 अक्टू॰ 2026
नीतिशतकम्

रत्नैर्महाब्धेस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरे भीमविषेण भीतिम्। सुधां विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः॥

ratnair mahābdhes tutuṣur na devā na bhejire bhīmaviṣeṇa bhītim । sudhāṃ vinā na prayayur virāmaṃ na niścitārthād viramanti dhīrāḥ ॥

भर्तृहरि समुद्र-मन्थन के प्रसंग से बताते हैं कि धीर व्यक्ति न बीच की उपलब्धियों पर रुकते हैं, न संकट के कारण अपने निश्चित लक्ष्य से हटते हैं।

दृढ़तासाहस
29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति

विनम्रता पर और सुभाषित

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9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।

साहसविनम्रतासम्मान
8 अक्टू॰ 2026

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।

स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता