स्वाधीनैव समृद्धिर्जनोपजीव्यत्वमुच्छ्रयश्छाया। सत्पुंसो मरुभूरिव जीवनमात्रं समाशास्यम्॥
svādhīnaiva samṛddhir janopajīvyatvam ucchrayaś chāyā । satpuṃso marubhūr iva jīvanamātraṁ samāśāsyam ॥
स्वाधीनैव का अर्थ
स्वाधीन समृद्धि ही वास्तविक वैभव है और दूसरों का आश्रय व आधार बनना ही सच्ची महानता है। जैसे मरुभूमि में छाया और जीवन दुर्लभ वरदान होते हैं, वैसे ही श्रेष्ठ पुरुष का जीवन परोपकार और लोक-कल्याण के लिए ही अभीष्ट होता है।
शब्दार्थ
- स्वाधीना एवsvādhīnā eva
केवल अपने ही अधीन, स्वावलम्बी
स्व + अधीन
सन्धि: स्वाधीना + एव = स्वाधीनैव।
- समृद्धिःsamṛddhiḥ
समृद्धि, वैभव, भरपूर वृद्धि
सम् + √ऋध्
जनोपजीव्यत्वम् से पहले समृद्धिर् रूप हो जाता है।
- जनोपजीव्यत्वम्janopajīvyatvam
जिसके आश्रय से लोग जीवन चलाएँ, ऐसा होना
जन + उप + √जीव्
समास: जन + उपजीव्य + त्व।
- उच्छ्रयःucchrayaḥ
ऊँचाई, उन्नति
उत् + √श्रि
सन्धि: उच्छ्रयः + छाया = उच्छ्रयश्छाया।
- छायाchāyā
छाया, आश्रय
- सत्पुंसःsatpuṃsaḥ
सत्पुरुष का, श्रेष्ठ पुरुष का
सत् + पुंस्
षष्ठी एकवचन; मरुभूः से पहले सत्पुंसो रूप में आता है।
- मरुभूः इवmarubhūr iva
मरुभूमि के समान
मरु + भू
आर्यासप्तशती में पाठ मरुभूरुह इव है, अर्थात् 'मरुभूमि में उगे वृक्ष के समान'।
- जीवनमात्रम्jīvanamātram
केवल जीवन, जीवित रहना मात्र
जीवन + मात्र
‘जीवन’ का अर्थ जल भी है, जिसकी कामना मरुभूमि में होती है।
- समाशास्यम्samāśāsyam
कामना के योग्य, प्रार्थनीय
सम् + आ + √शास्
व्याख्या
श्लोक चार बातें गिनाता है, पर यह नहीं कहता कि वे किसकी हैं; यह समझ सुनने वाले को स्वयं जोड़नी पड़ती है। ‘स्वाधीना समृद्धि’ वह सम्पन्नता है जो किसी बाहरी सहारे पर नहीं टिकी; ‘जनोपजीव्यत्व’ वह गुण है जिसके बल पर लोग जीवन चलाते हैं; ‘उच्छ्रय’ साधारण से ऊपर उठी ऊँचाई है; और ‘छाया’ वह आश्रय है जो बदले में कुछ नहीं माँगता। ये चारों पहले वृक्ष के गुण हैं, और ‘मरुभू’ शब्द इनका माप तय कर देता है - जहाँ धरती स्वयं कुछ नहीं देती, वहाँ एक खड़ा वृक्ष प्यास और प्राण के बीच का पूरा अन्तर बन जाता है। अन्तिम पंक्ति में श्लोक मुड़ता है। ‘जीवनमात्रं समाशास्यम्’ कहता है कि ऐसे पुरुष के लिए केवल जीवित रहने की कामना ही पर्याप्त है, क्योंकि फल, आश्रय, ऊँचाई और छाया तो उसके स्वभाव से अपने आप आते हैं। ‘जीवन’ शब्द यहाँ जीवन और जल, दोनों अर्थ एक साथ उठाता है, और मरुभूमि को ठीक इसी की प्यास होती है। इससे एक कठिन कसौटी भी बनती है: जिस वैभव को दूसरों के सहारे टिकाना पड़े वह स्वाधीन नहीं, और जो ऊँचाई छाया न दे वह केवल ऊँचाई है। कोई व्यक्ति, संस्था या देश उसी क्षण कामना के योग्य बनता है जब उसका अपना बल किसी और की जीविका बन जाता है।
मूल पोस्ट
आर्यासप्तशती से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंशुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
पात्रविशेषे न्यस्तं गुणान्तरं व्रजति शिल्पमाधातुः। जलमिव समुद्रशुक्तौ मुक्ताफलतां पयोदस्य॥
pātraviśeṣe nyastaṃ guṇāntaraṃ vrajati śilpam ādhātuḥ । jalam iva samudraśuktau muktāphalatāṃ payodasya ॥
कालिदास का यह श्लोक योग्य पात्र में विकसित कौशल की तुलना सीप में मोती बनने वाले मेघजल से करता है।
चरित्र पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
शुचित्वं त्यागिता शौर्यं सामान्यं सुखदुःखयोः। दाक्षिण्यं चानुरक्तिश्च सत्यता च सुहृद्गुणाः॥
śucitvaṃ tyāgitā śauryaṃ sāmānyaṃ sukhaduḥkhayoḥ । dākṣiṇyaṃ cānuraktiśca satyatā ca suhṛdguṇāḥ ॥
निर्मलता, त्याग, साहस, सुख-दुःख में समान भाव, शिष्टता, अनुराग और सत्यता सच्चे मित्र के गुण हैं।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।