एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥
एको धर्मः परं श्रेयः का अर्थ
धर्म मनुष्य को कल्याण और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करता है। क्षमा मानसिक शांति का सर्वोत्तम साधन है। विद्या ही वास्तविक संतोष का मूलाधार है और अहिंसा संसार में स्थाई सुख प्रदान करती है। अतः इन गुणों को आत्मसात कर मनुष्य अपने जीवन को श्रेष्ठ, शांत और आनंदमय बना सकता है।
शब्दार्थ
- एकः धर्मःekaḥ dharmaḥ
एकमात्र धर्म
एक + धर्म
‘एको’ सन्धि से ‘एकः’ है
- परं श्रेयःparaṁ śreyaḥ
परम कल्याण
पर + श्रेयस्
- क्षमा एकाkṣamā ekā
एकमात्र क्षमा
√क्षम्
‘क्षमैका’ = क्षमा + एका
- शान्तिः उत्तमाśāntir uttamā
उत्तम शांति
√शम् + उत्तम
- विद्या एकाvidyā ekā
एकमात्र विद्या
√विद्
‘विद्यैका’ = विद्या + एका
- परमा तृप्तिःparamā tṛptiḥ
परम तृप्ति, संतोष
√तृप्
- अहिंसा एकाahiṁsā ekā
एकमात्र अहिंसा
अ + √हिंस्
‘अहिंसैका’ = अहिंसा + एका
- सुखावहाsukhāvahā
सुख देने वाली
सुख + √वह्
व्याख्या
यह श्लोक ‘एक’ शब्द की पुनरावृत्ति पर टिका है, और प्रत्येक चरण में एक गुण के साथ उसका निश्चित फल जोड़ा गया है। ‘धर्म’ को ‘परं श्रेयः’ अर्थात् सर्वोच्च कल्याण कहा गया है, ‘क्षमा’ को सर्वोत्तम शांति, ‘विद्या’ को ‘परमा तृप्ति’ यानी पूर्ण संतोष, और ‘अहिंसा’ को ‘सुखावहा’ अर्थात् सुख लाने वाली। कहने का ढंग जानबूझकर दृढ़ है—श्लोक यह नहीं कहता कि ये गुण सहायक हैं, बल्कि यह कहता है कि अकेला एक गुण ही अपने फल के लिए पर्याप्त है। इन चारों को जोड़ने वाली बात यह है कि इनमें से कोई भी परिस्थिति पर निर्भर नहीं है। धन छिन सकता है और पद भी, परंतु आचरण, सहनशीलता, ज्ञान और अहिंसा उसी के पास रहते हैं जो उन्हें साधता है। क्षमा को वहाँ रखा गया है जहाँ सामान्यतः प्रतिशोध की अपेक्षा होती है, और श्लोक चुपचाप यह तर्क देता है कि छोड़ देना मन को उस तरह स्थिर करता है जैसा विवाद जीतना कभी नहीं कर पाता। एक साथ पढ़ने पर ये चार गुण ऐसे जीवन का चित्र खींचते हैं जो भीतर से स्थिर है—और यही कारण है कि विदुर का यह संक्षिप्त उपदेश आज भी दूर का आदर्श नहीं, व्यावहारिक परामर्श लगता है।
मूल पोस्ट
विदुर नीति से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंनित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥
nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥
नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥
sve sve karmaṇyabhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ । svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tacchṛṇu ॥
भगवद् गीता बताती है कि अपने कर्म में निष्ठा मनुष्य को सिद्धि की ओर ले जाती है।
धर्म पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥
jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥
ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥
उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।