शांति पर सुभाषित
यह विषय 6 स्रोतों से आए 9 सुभाषितों को एक साथ लाता है।
नवीनतम अद्यतन: 24 सित॰ 2026
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।
एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥
महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।
चलन्ति गिरयः कामं युगान्तपवनाहताः। कृच्छ्रेऽपि न चलत्येव धीराणां निश्चलं मनः॥
calanti girayaḥ kāmaṃ yugāntapavanāhatāḥ । kṛcchre'pi na calatyeva dhīrāṇāṃ niścalaṃ manaḥ ॥
यह श्लोक धैर्य की शक्ति बताता है: प्रलयकालीन वायु से पर्वत भी हिल सकते हैं, पर धीरों का मन विपत्ति में भी अचल रहता है।
स्वातन्त्र्यात् सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम्। स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत् स्वातन्त्र्यात् परमं पदम्॥
svātantryāt sukham āpnoti svātantryāl labhate param । svātantryān nirvṛtiṃ gacchet svātantryāt paramaṃ padam ॥
अष्टावक्र गीता स्वतंत्रता को सुख, शांति, आत्मबोध और परम अवस्था की प्राप्ति का मार्ग बताती है।
चित्तप्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते। प्राणस्पन्दनिरोधो वा द्वेधा योगस्य धारणा॥
cittapraśamanopāyo yoga ity abhidhīyate । prāṇaspandanirodho vā dvedhā yogasya dhāraṇā ॥
योग को मन शांत करने और प्राण की गति को नियंत्रित करने वाली दोहरी साधना के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
नान्तर्बहिश्च लोकेषु त्वात्मानं दृष्टवान् क्वचित्। आष्टाङ्गिकेन मार्गेण परमां शान्तिमाययौ॥
nāntar bahiśca lokeṣu tvātmānaṁ dṛṣṭavān kvacit । āṣṭāṅgikena mārgeṇa paramāṁ śāntim āyayau ॥
बौद्ध दृष्टि वाला यह संस्कृत श्लोक स्थायी आत्मा के अभाव की समझ, अष्टांगिक मार्ग और परम शांति की प्राप्ति को जोड़ता है।
अहिंसा परमो धर्मस्तथाऽहिंसा परन्तपः। अहिंसा परमं सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥
ahiṃsā paramo dharmastathā’hiṃsā parantapaḥ । ahiṃsā paramaṃ satyaṃ yato dharmaḥ pravartate ॥
अहिंसा को सत्य में निहित सर्वोच्च धर्म और तप बताया गया है, जो किसी को हानि न पहुँचाने की साधना सिखाती है।
शान्तितुल्यं तपो नास्ति न सन्तोषात् परं सुखम्। न तृष्णायाः परो व्याधिर्न च धर्मो दयापरः॥
śāntitulyaṁ tapo nāsti na santoṣāt paraṁ sukham । na tṛṣṇāyāḥ paro vyādhir na ca dharmo dayāparaḥ ॥
शान्ति सर्वोच्च तप, सन्तोष सबसे बड़ा सुख, तृष्णा सबसे कठिन रोग और दया सबसे महान धर्म है।
गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्। वर्तमानेन कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः॥
gate śokaḥ na kartavyo bhaviṣyaṁ naiva cintayet । vartamānena kālena vartayanti vicakṣaṇāḥ ॥
बुद्धिमान व्यक्ति न बीते हुए का शोक करता है, न आने वाले की चिंता; वह वर्तमान में सजग होकर कर्म करता है।