स्वातन्त्र्यात् सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम्। स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत् स्वातन्त्र्यात् परमं पदम्॥
svātantryāt sukham āpnoti svātantryāl labhate param । svātantryān nirvṛtiṃ gacchet svātantryāt paramaṃ padam ॥
प्रधानमंत्री का संदेशसंविधान हत्या दिवस आज हमें उस काले दौर की याद दिला रहा है, जब भारतीय लोकतंत्र को बुरी तरह से कुचला गया था। यह हमें लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा प्रतिबद्ध रहने को प्रेरित करता है। आपातकाल का विरोध करने वाली सभी विभूतियों को सादर नमन।
स्वातन्त्र्यात् सुखमाप्नोति का अर्थ
स्वतंत्रता से ही मनुष्य सुख प्राप्त करता है, स्वतंत्रता से ही वह सर्वोच्च उपलब्धि पाता है। स्वतंत्रता से ही वह शांत अवस्था को प्राप्त होता है और स्वतंत्रता के माध्यम से ही वह परम पद को प्राप्त करता है।
शब्दार्थ
- स्वातन्त्र्यात्svātantryāt
स्वातन्त्र्य से
स्व + तन्त्र
- सुखम्sukham
सुख
सुख
- आप्नोतिāpnoti
प्राप्त करता है
√आप्
- लभतेlabhate
पाता है
√लभ्
- परम्param
परम
पर
- निर्वृतिम्nirvṛtim
निर्वृति, तृप्ति
निस् + √वृ
- गच्छेत्gacchet
पहुँचता है
√गम्
- परमम् पदम्paramaṁ padam
परम पद
परम + पद
व्याख्या
यह श्लोक अपने प्रत्येक चरण में स्वातन्त्र्य शब्द को दोहराकर स्पष्ट करता है कि सुख, शांति और सर्वोच्च उपलब्धि का मूल आधार स्वतंत्रता है। अष्टावक्र गीता के प्रसंग में यह मुख्यतः आंतरिक स्वतंत्रता है—आसक्ति, अहंकार, बाध्यकारी इच्छाओं और आत्मा पर आरोपित सीमाओं से मुक्ति। निर्वृति का अर्थ गहन शांति और संतोष है, जबकि परम पद उस आत्मबोध की सर्वोच्च अवस्था की ओर संकेत करता है जिसमें स्वतंत्रता बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहती। पोस्ट इस आध्यात्मिक शब्दावली को सार्वजनिक जीवन से जोड़ती है। राजनीतिक स्वतंत्रता, संवैधानिक सुरक्षा और नागरिक अधिकार ग्रंथ में वर्णित आत्ममुक्ति के समान नहीं हैं, फिर भी वे मानवीय गरिमा और उत्तरदायी स्वतंत्रता के विकास के लिए आवश्यक आधार प्रदान करते हैं। इस श्लोक के माध्यम से आपातकाल का स्मरण इसलिए आंतरिक सत्य को नागरिक दायित्व से जोड़ता है: स्वतंत्रता को समझना, सुरक्षित रखना और सतत सजगता से पुष्ट करना पड़ता है।
मूल पोस्ट
स्वतंत्रता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंभस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥
bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥
यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्। धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्॥
sukhopaviṣṭās te tatra puṇyāṃ cakruḥ kathām imām । dharmārthakāmamokṣāṇām ārogyaṃ mūlam uttamam ॥
चरक संहिता आरोग्य को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति का सर्वोत्तम आधार बताती है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
anudvegakaraṁ vākyaṁ satyaṁ priyahitaṁ ca yat । svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅmayaṁ tapa ucyate ॥
भगवद् गीता सत्य, प्रिय, हितकारी और उद्वेगरहित वाणी तथा नियमित स्वाध्याय को वाणी का तप कहती है।