यत्रोत्साहसमारम्भो - स्थायी समृद्धि का आधार

24 जून 2026

यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्यविहीनता। नयविक्रमसंयोगस्तत्र श्रीरचला ध्रुवम्॥

yatrotsāhasamārambho yatrālasyavihīnatā । nayavikramasaṃyogas tatra śrīr acalā dhruvam ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

सामूहिक समर्पण और पुरुषार्थ से राष्ट्र की समृद्धि अक्षुण्ण रहती है। यही भावना समाज को नई ऊर्जा देती है और विकास के संकल्पों को सिद्धि तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त करती है।

यत्रोत्साहसमारम्भो यत्रालस्यविहीनता का अर्थ

जहाँ परिश्रम राष्ट्रभक्ति के प्रखर उत्साह से प्रेरित होता है, जहाँ आलस्य से पूर्णतः रहित होकर निरन्तर कर्तव्य किए जाते हैं और जहाँ विनम्रता साहस के साथ सन्तुलित होती है—वहीं त्याग, तप और समर्पण से राष्ट्र की समृद्धि सदा अटल और चिरस्थायी बनी रहती है।

शब्दार्थ

यत्रyatra

जहाँ

उत्साहसमारम्भःutsāhasamārambhaḥ

उत्साहपूर्वक आरम्भ

उद् + √सह् + सम् + आ + √रभ्

यत्र आलस्यविहीनताyatrālasyavihīnatā

जहाँ आलस्य का अभाव

अलस + वि + √हा

नयविक्रमसंयोगःnayavikramasaṁyogaḥ

नीति और पराक्रम का योग

√नी + वि + √क्रम् + सम् + √युज्

तत्रtatra

वहाँ

श्रीःśrīḥ

श्री

श्री

अचलाacalā

अचल

अ + √चल्

ध्रुवम्dhruvam

निश्चय ही

√ध्रु

व्याख्या

यह श्लोक उन स्थितियों को बताता है जहाँ श्री, अर्थात् समृद्धि, स्थिर होती है: उत्साहपूर्वक आरम्भ, आलस्य का अभाव, और नय का विक्रम से संयोग। 'नय' का अर्थ नीति, विवेकपूर्ण आचरण या उचित मार्गदर्शन है; 'विक्रम' पराक्रम या निर्णायक पुरुषार्थ है। संग्रहीत अर्थ देशभक्ति, विनम्रता, त्याग और राष्ट्रसेवा को इन पदों के स्थान पर रखता है; वे पोस्ट का आधुनिक अनुप्रयोग हैं, संस्कृत का अनुवाद नहीं।

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पञ्चतन्त्र से और सुभाषित

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14 अग॰ 2026
महासुभाषितसंग्रह

उद्यमस्य प्रसादेन दृश्यन्ते विविधाः कलाः। कातरा एव जल्पन्ति यद् भाव्यं तद् भविष्यति॥

udyamasya prasādena dṛśyante vividhāḥ kalāḥ । kātarā eva jalpanti yad bhāvyaṁ tad bhaviṣyati ॥

महासुभाषितसंग्रह का यह श्लोक कहता है कि उद्यम से विविध कलाएँ प्रकट होती हैं, जबकि कातर लोग भाग्य की बात भर करते हैं।

दृढ़तासाहससामर्थ्य
3 अग॰ 2026
पञ्चतन्त्र

त्याज्यं न धैर्यं विधुरेऽपि दैवे धैर्यात्कदाचित्स्थितिमाप्नुयात्सः। याते समुद्रेऽपि च पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति कर्म एव॥

tyājyaṁ na dhairyaṁ vidhure'pi daive dhairyāt kadācit sthitim āpnuyāt saḥ । yāte samudre'pi ca potabhaṅge sāṁyātriko vāñchati karma eva ॥

प्रतिकूल भाग्य में भी धैर्य और कर्म मनुष्य को पुनः संभलने की राह देते हैं, जैसे पोत टूटने पर भी समुद्रयात्री प्रयास करता रहता है।

दृढ़ताकर्म
4 मई 2026
चाणक्य नीति

को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम्। को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम्॥

ko hi bhāraḥ samarthānāṁ kiṁ dūraṁ vyavasāyinām । ko videśaḥ suvidyānāṁ kaḥ paraḥ priyavādinām ॥

यह श्लोक बताता है कि कैसे कौशल, परिश्रम, शिक्षा और मधुर वाणी सफलता और अपनेपन की सभी बाधाओं को दूर कर देते हैं।

सामर्थ्यशिक्षादृढ़ताचरित्र

दृढ़ता पर और सुभाषित

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9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।

साहसविनम्रतासम्मान
8 अक्टू॰ 2026

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।

स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
7 अक्टू॰ 2026
महाभारत

नित्यं परिचरेच्चैव तद्वै सुकृतमुत्तमम्। कीर्तिं पुण्यं यशो लोकान् प्राप्स्यसे राजसत्तम॥

nityaṃ paricareccaiva tadvai sukṛtamuttamam । kīrtiṃ puṇyaṃ yaśo lokān prāpsyase rājasattama ॥

नित्य सेवा को श्रेष्ठ पुण्य कर्म बताया गया है, जिससे कीर्ति, यश और उत्तम लोकों की प्राप्ति होती है।

कर्तव्यकर्मसफलता