उद्यमस्य प्रसादेन - पुरुषार्थ का फल

14 अग॰ 2026

उद्यमस्य प्रसादेन दृश्यन्ते विविधाः कलाः। कातरा एव जल्पन्ति यद् भाव्यं तद् भविष्यति॥

udyamasya prasādena dṛśyante vividhāḥ kalāḥ । kātarā eva jalpanti yad bhāvyaṁ tad bhaviṣyati ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर उन सभी देशवासियों का हृदय से नमन, जिन्होंने उस वीभत्स दौर से निकलकर देश की प्रगति में अमूल्य योगदान दिया। उन्होंने अपने साहस और सामर्थ्य से दिखाया कि कैसे विपरीत परिस्थितियों में भी संकल्पों को सिद्ध किया जाता है। आइए, सद्भावना और एकजुटता की राष्ट्रीय भावना को और सशक्त करें।

उद्यमस्य प्रसादेन दृश्यन्ते विविधाः का अर्थ

परिश्रम, उद्यम और पुरुषार्थ से ही विविध कलाएँ, विज्ञान, तकनीकी कौशल, शिल्प तथा नवाचार विकसित होते हैं और सफलता का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसलिए, मनुष्य को भाग्य के भरोसे नहीं बैठना चाहिए बल्कि साहस, कर्मठता और निरंतर प्रयास के साथ अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहना चाहिए क्योंकि पुरुषार्थ ही भाग्य का निर्माता है।

शब्दार्थ

उद्यमस्यudyamasya

उद्यम की

उद् + √यम्

प्रसादेनprasādena

कृपा से

प्र + √सद्

दृश्यन्तेdṛśyante

दिखाई देती हैं

√दृश्

विविधाः कलाःvividhāḥ kalāḥ

विविध कलाएँ

वि + विध + कला

कातराःkātarāḥ

कायर

कातर

एव जल्पन्तिeva jalpanti

ही बकते हैं

√जल्प्

यत् भाव्यम्yad bhāvyam

जो होना है

√भू

तत् भविष्यतिtad bhaviṣyati

वह होगा

√भू

व्याख्या

‘उद्यम’ का अर्थ है उद्देश्यपूर्ण प्रयास या पुरुषार्थ, और श्लोक कहता है कि उसके ‘प्रसाद’ अर्थात अनुकूल फल से अनेक ‘कलाएँ’ प्रकट होती हैं। दूसरी पंक्ति इसके विपरीत कातर लोगों को रखती है, जो केवल इतना कहते रहते हैं कि जो होने वाला है, वही होगा। श्लोक यह नहीं कहता कि भविष्य को जाना जा सकता है; उसका संकेत यह है कि जब प्रयास संभव हो, तब निष्क्रिय होकर भाग्य की चर्चा करना व्यर्थ है। इस प्रकार यह क्षमता को साहस से जोड़ता है: अनुशासित कर्म से कौशल दिखाई देता है, जबकि भय कर्म से पीछे हटाता है। प्रधानमंत्री का संदेश विभाजन की विभीषिका से निकलकर योगदान देने वाले लोगों को स्मरण करता है और इस शिक्षा को विपरीत परिस्थितियों में साहस, संकल्प, सद्भावना और राष्ट्रीय एकजुटता से जोड़ता है।

मूल पोस्ट

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महासुभाषितसंग्रह से और सुभाषित

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29 सित॰ 2026
सुभाषितरत्नभाण्डागारम्

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥

udyamaḥ sāhasaṃ dhairyaṃ buddhiḥ śaktiḥ parākramaḥ । ṣaḍete yatra vartante tatra daivaṃ sahāyakṛt ॥

उद्यम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम से युक्त व्यक्ति को दैव का सहयोग भी प्राप्त होता है।

दृढ़तासाहसविद्याशक्ति
21 सित॰ 2026
विदुर नीति

एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा। विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥

eko dharmaḥ paraṁ śreyaḥ kṣamaikā śāntir uttamā । vidyaikā paramā tṛptir ahiṁsaikā sukhāvahā ॥

महाभारत की विदुर नीति का यह श्लोक चार गुणों को उनके फल से जोड़ता है: धर्म परम कल्याण देता है, क्षमा उत्तम शांति, विद्या सच्ची तृप्ति और अहिंसा स्थाई सुख।

धर्मशांतिविद्याअहिंसा
16 सित॰ 2026
महाभारत

अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम्। न श्रीः सन्त्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः॥

advaidhamanasaṃ yuktaṃ śūraṃ dhīraṃ vipaścitam । na śrīḥ santyajate nityam ādityamiva raśmayaḥ ॥

महाभारत समृद्धि को सूर्य की अविच्छिन्न किरणों के समान बताता है—वह एकाग्र, शूर, धीर और विवेकी व्यक्ति का साथ नहीं छोड़ती।

साहसज्ञानदृढ़तासमृद्धि

दृढ़ता पर और सुभाषित

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9 अक्टू॰ 2026
कथासरित्सागर

वत्सराजोऽपि तं प्राप्तं प्रदत्तोपायनं नृपम्। प्रीत्या सम्मानयामास शूरा हि प्रणतिप्रियाः॥

vatsarājo 'pi taṃ prāptaṃ pradattopāyanaṃ nṛpam । prītyā sammānayāmāsa śūrā hi praṇatipriyāḥ ॥

भेंट लेकर आए राजा का वत्सराज स्नेह से सम्मान करते हैं। श्लोक वीरों के मन में विनम्र प्रणाम के प्रति आदर बताता है।

साहसविनम्रतासम्मान
8 अक्टू॰ 2026

भस्मीकृतस्वार्थसौख्यपरिचर्चितविग्रहाः। स्वराज्ययोगनिर्मग्ना धन्यास्ते वीरयोगिनः॥

bhasmīkṛtasvārthasaukhyaparicarcitavigrahāḥ । svarājyayoganirmagnā dhanyās te vīrayoginaḥ ॥

यह श्लोक उन वीर साधकों को धन्य कहता है जो निजी सुख त्यागकर स्वराज्य की साधना में पूरी तरह समर्पित हैं।

स्वतंत्रतासाहसनिःस्वार्थ सेवा
6 अक्टू॰ 2026
समराङ्गणसूत्रधार

ज्ञानवांश्च तथा वाग्मी कर्मस्वपि च निष्ठितः। एवं युक्तोऽपि न श्रेयान् यदि शीलविवर्जितः॥

jñānavāṃśca tathā vāgmī karmasvapi ca niṣṭhitaḥ । evaṃ yukto'pi na śreyān yadi śīlavivarjitaḥ ॥

ज्ञान, वाक्पटुता और कर्मकुशलता होने पर भी सदाचार से रहित व्यक्ति श्रेष्ठ नहीं होता।

विद्यासामर्थ्यचरित्रनैतिकता