समानी व आकूतिः - एक संकल्प, एक हृदय, एक मन

17 अग॰ 2026

समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥

samānī va ākūtiḥ samānā hṛdayāni vaḥ । samānam astu vo mano yathā vaḥ susahāsati ॥

प्रधानमंत्री का संदेश

सामूहिक संकल्प और एकता की शक्ति से ही देश आगे बढ़ता है। यही भावना भारत की प्रगति और समृद्धि की मजबूत नींव है।

समानी व आकूतिः समाना का अर्थ

हम सबके संकल्प एक समान होने चाहिए, हमारे मन एकता के भाव से जुड़े होने चाहिए, जिससे हम सभी परस्पर सहयोग तथा समान व्यवहार के साथ समाज की उन्नति के लिए निरंतर प्रयास करते रहें।

शब्दार्थ

समानीsamānī

एक समान

समान

स्त्रीलिंग एकवचन; आकूतिः का विशेषण।

वःvaḥ

तुम सबका, तुम सबमें

युष्मद्

आकूतिःākūtiḥ

अभिप्राय, संकल्प

आ + √कू

समानाsamānā

एक समान

समान

नपुंसकलिंग बहुवचन; हृदयानि का विशेषण।

हृदयानिhṛdayāni

हृदय

हृदय

समानम्samānam

एक समान

समान

अस्तुastu

हो

√अस्

मनःmanaḥ

मन

मनस्

यथाyathā

जिससे

सुसहासतिsusahāsati

तुम सबमें उत्तम सामंजस्य हो

सु + सह + √अस्

पदपाठ में सु-सह असति पृथक हैं।

व्याख्या

यह ऋग्वेद का अंतिम मंत्र है, और सबसे प्राचीन वेद का समापन सौहार्द की प्रार्थना से होना अपने आप में एक शिक्षा है। मंत्र एकता की कामना तीन सुविचारित चरणों में करता है: 'आकूति' अर्थात संकल्प या अभिप्राय, वह पहली प्रेरणा जो कर्म से पूर्व जागती है; 'हृदय' अर्थात भावना और आत्मीयता का आधार; और 'मनः' अर्थात विचार तथा विवेक की शक्ति। इन तीनों के 'समान'—एक समान, बराबर अथवा साझा—होने की प्रार्थना करके ऋषि यह संकेत देते हैं कि स्थायी एकजुटता किसी एक ही स्तर की सहमति पर नहीं टिक सकती, क्योंकि साझा भावना के बिना साझा लक्ष्य बिखर जाते हैं और साझा विचार के बिना भावना भटक जाती है। अंतिम पंक्ति 'यथा वः सुसहासति' इसका प्रयोजन स्पष्ट कर देती है कि तुम सब मिलकर भली भाँति रहो, केवल साथ-साथ नहीं, बल्कि सच्चे सौहार्द के साथ। इस प्रकार मंत्र संकल्प, हृदय और मन की गहरी समानता की कामना करता है। आधुनिक जीवन में ऐसी एकता के लिए व्यक्तिगत भिन्नताओं का मिटना आवश्यक नहीं: लोग अपनी अलग-अलग भूमिकाएँ, क्षमताएँ और दृष्टियाँ बनाए रखते हुए भी अपने गहरे संकल्प को लोककल्याण की दिशा में एक कर सकते हैं। दिया गया अर्थ इसे परस्पर सहयोग, समान व्यवहार और समाज की निरंतर उन्नति तक विकसित करता है; ये स्वाभाविक अनुप्रयोग हैं, पर मंत्र के पृथक शाब्दिक कथन नहीं। प्रधानमंत्री का संदेश भी इसी भाव को सार्वजनिक जीवन में उतारता है, जहाँ सामूहिक संकल्प और एकता को राष्ट्र की प्रगति और समृद्धि की मजबूत नींव बताया गया है।

स्रोत और पाठभेद

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ऋग्वेद से और सुभाषित

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22 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥

sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥

अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।

प्रकृतिकल्याण
15 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥

sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥

अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।

एकतासामंजस्यअहिंसा
10 सित॰ 2026
ऋग्वेद

स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥

svasti na indro vṛddhaśravāḥ svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ । svasti nas tārkṣyo ariṣṭanemiḥ svasti no bṛhaspatir dadhātu ॥

ऋग्वेद का यह स्वस्ति-मन्त्र इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य और बृहस्पति से हम सबके कल्याण की कामना करता है।

कल्याणभक्तिआध्यात्मिकता

एकता पर और सुभाषित

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2 अक्टू॰ 2026
भगवद् गीता

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥

भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।

चरित्रविनम्रतासामंजस्य
15 सित॰ 2026
अथर्ववेद

सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥

sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥

अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।

एकतासामंजस्यअहिंसा
11 सित॰ 2026
गरुड पुराण

सद्भिरेव सहासीत सद्भिः कुर्वीत सङ्गतिम्। सद्भिर्विवादं मैत्रीं च नासद्भिः किञ्चिदाचरेत्॥

sadbhir eva sahāsīta sadbhiḥ kurvīta saṅgatim । sadbhir vivādaṃ maitrīṃ ca nāsadbhiḥ kiṃcid ācaret ॥

गरुड पुराण का यह श्लोक सज्जनों के साथ रहने, संवाद करने और मैत्री रखने की सीख देता है।

नैतिकताचरित्रसामंजस्य