जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्। सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती॥
janaṁ bibhratī bahudhā vivācasaṁ nānādharmāṇaṁ pṛthivī yathaukasam । sahasraṁ dhārā draviṇasya me duhāṁ dhruveva dhenuranapasphurantī ॥
प्रधानमंत्री का संदेशधरती माता पूरी मानवता को एक परिवार मानती हैं। उनके लिए यह पूरा संसार एक घर की तरह है, जहां हर संस्कृति का अपना महत्त्व और सम्मान है।
जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं का अर्थ
विभिन्न भाषाएँ बोलने वाले और अलग-अलग धर्मों-परंपराओं को मानने वाले लोगों को यह धरती माता एक ही घर के सदस्यों की तरह संरक्षित करती है। यह पृथ्वी हमारे लिए समृद्धि की हजारों धाराएँ उसी तरह बहाए, जैसे कोई शांत और प्रेमपूर्ण गाय दूध देती है।
शब्दार्थ
- जनम्janam
जन को
√जन्
- बिभ्रतीbibhratī
धारण करती हुई
√भृ
- बहुधाbahudhā
अनेक प्रकार से
बहु
- विवाचसम्vivācasam
भिन्न-भिन्न भाषाओं वाले
वि + √वच्
- नानाधर्माणम्nānādharmāṇam
भिन्न-भिन्न आचारों अथवा परम्पराओं वाले
नाना + धर्म
- पृथिवीpṛthivī
पृथ्वी
√प्रथ्
- यथा ओकसम्yathaukasam
एक ही घर के समान
ओकस्
- सहस्रम् धाराःsahasraṁ dhārāḥ
सहस्र धाराएँ
सहस्र + √धृ
- द्रविणस्यdraviṇasya
धन की
द्रविण
- मे दुहाम्me duhām
मेरे लिए दुहे
√दुह्
- ध्रुवा इवdhruveva
स्थिर के समान
√ध्रु
- धेनुःdhenuḥ
धेनु
√धे
- अनपस्फुरन्तीanapasphurantī
कभी न ठुकराने वाली
अन् + अप + √स्फुर्
व्याख्या
भूमि सूक्त का यह मंत्र भारतीय चिंतन की अत्यंत व्यापक दृष्टि को प्रकट करता है। यहाँ पृथ्वी को उन सभी लोगों की साझा माता और आश्रयभूमि के रूप में देखा गया है जो भिन्न-भिन्न भाषाएँ बोलते हैं, भिन्न आचारों, परम्पराओं और जीवन-पद्धतियों का पालन करते हैं। यह प्रार्थना सांस्कृतिक विविधता को समृद्धि की कामना के साथ जोड़ती है। माता पृथ्वी से निवेदन है कि वे हमारे लिए धन-समृद्धि की असंख्य धाराएँ उसी प्रकार प्रवाहित करें जैसे शांत गौ सहज भाव से दूध देती है। दिए गए अर्थ में 'अलग-अलग धर्मों' का प्रयोग 'नानाधर्माणम्' का सम्भव आधुनिक विस्तार है, पर संस्कृत केवल संस्थागत धर्मों तक सीमित नहीं है। इस प्रकार यह मंत्र हमें सिखाता है कि विविधता, सह-अस्तित्व और समृद्धि एक-दूसरे के पूरक हैं।
मूल पोस्ट
अथर्ववेद से और सुभाषित
स्रोत पृष्ठ देखेंसुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥
sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥
अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।
विविधता पर और सुभाषित
विषय पृष्ठ देखेंअद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
adveṣṭā sarvabhūtānāṃ maitraḥ karuṇa eva ca । nirmamo nirahaṅkāraḥ samaduḥkhasukhaḥ kṣamī ॥
भगवद् गीता द्वेष और अहंकार से मुक्त, सभी प्राणियों के प्रति मैत्री रखने वाले और सुख-दुःख में सम रहने वाले व्यक्ति के गुण बताती है।
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥
sahṛdayaṁ sāṃmanasyam avidveṣaṁ kṛṇomi vaḥ । anyo anyam abhi haryata vatsaṁ jātam ivāghnyā ॥
अथर्ववेद का यह मंत्र सहृदयता, सांमनस्य और द्वेषमुक्त जीवन का आह्वान करते हुए नवजात बछड़े के प्रति गाय के स्नेह को आदर्श बनाता है।