प्रकृति पर सुभाषित
यह विषय 6 स्रोतों से आए 23 सुभाषितों को एक साथ लाता है।
नवीनतम अद्यतन: 22 सित॰ 2026
सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसो अस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये॥
sutrāmāṇaṃ pṛthivīṃ dyām anehasaṃ suśarmāṇam aditiṃ supraṇītim । daivīṃ nāvaṃ svaritrām anāgaso asravantīm ā ruhemā svastaye ॥
अथर्ववेद का यह मन्त्र पृथ्वी, द्युलोक और अदिति को सुरक्षित दिव्य नौका के रूप में देखता है, जो मनुष्य को कल्याण की ओर ले जाती है।
शं नो वातः पवतां शं नस्तपतु सूर्यः। शं नः कनिक्रदद् देवः पर्जन्योऽभिवर्षतु॥
śaṃ no vātaḥ pavatāṃ śaṃ nas tapatu sūryaḥ । śaṃ naḥ kanikradad devaḥ parjanyo 'bhivarṣatu ॥
शुक्ल यजुर्वेद का यह मन्त्र वायु, सूर्य और वर्षा के देवता पर्जन्य से कल्याणकारी होने की प्रार्थना करता है।
विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम्। शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा॥
viśvasvaṃ mātaram oṣadhīnāṃ dhruvāṃ bhūmiṃ pṛthivīṃ dharmaṇā dhṛtām । śivāṃ syonām anu carema viśvahā ॥
धर्म से धारण की गई, औषधियों की माता और मंगलमयी पृथ्वी पर सदा विचरण करने की वैदिक प्रार्थना।
शं नो द्यावापृथिवी पूर्वहूतौ शमन्तरिक्षं दृशये नो अस्तु। शं न ओषधीर्वनिनो भवन्तु शं नो रजसस्पतिरस्तु जिष्णुः॥
śaṁ no dyāvāpṛthivī pūrvahūtau śam antarikṣaṁ dṛśaye no astu । śaṁ na oṣadhīr vanino bhavantu śaṁ no rajasas patir astu jiṣṇuḥ ॥
ऋग्वेद का यह मन्त्र द्युलोक, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, औषधियों, वृक्षों और अन्तरिक्ष के विजयशील अधिपति से स्थायी मंगल की प्रार्थना करता है।
लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा। ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥ दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा। श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥
lokapālāśca te sarve vāsavapramukhāstathā । ṛtavaḥ ṣaṭ ca te sarve māsāḥ saṁvatsarāḥ kṣapāḥ ॥ dināni ca muhūrtāśca svasti kurvantu te sadā । śrutiḥ smṛtiśca dharmaśca pātu tvāṁ putra sarvataḥ ॥
अयोध्या काण्ड के इस आशीर्वचन में लोकपालों, कालचक्र, श्रुति-स्मृति और धर्म से निरंतर मंगल तथा सर्वांगीण रक्षा की प्रार्थना की गई है।
भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैर्नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः। अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥
bhavanti namrāstaravaḥ phalodgamair navāmbubhir dūravilambino ghanāḥ । anuddhatāḥ satpuruṣāḥ samṛddhibhiḥ svabhāva evaiṣa paropakāriṇām ॥
नीतिशतकम् का यह श्लोक फलयुक्त वृक्षों और जलभरे मेघों के माध्यम से बताता है कि सज्जन समृद्धि में और विनम्र हो जाते हैं।
ते कृषिं च सस्यं च मनुष्या उप जीवन्ति। कृष्टराधिरुपजीवनीयो भवति य एवं वेद॥
te kṛṣiṃ ca sasyaṃ ca manuṣyā upa jīvanti । kṛṣṭarādhir upajīvanīyo bhavati ya evaṃ veda ॥
अथर्ववेद का यह मंत्र कृषि और फसल को मानव जीवन तथा समाज के पोषण का मूल आधार मानता है।
मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः॥
madhu vātā ṛtāyate madhu kṣaranti sindhavaḥ । mādhvīr naḥ santv oṣadhīḥ ॥
ऋग्वेद का यह मंत्र वायु, नदियों, औषधियों और वनस्पतियों को मधुरता, पोषण, आरोग्य और सामंजस्य के स्रोत के रूप में देखता है।
शं नो देवः सविता त्रायमाणः शं नो भवन्तूषसो विभातीः। शं नः पर्जन्यो भवतु प्रजाभ्यः शं नः क्षेत्रस्य पतिरस्तु शम्भुः॥
śaṃ no devaḥ savitā trāyamāṇaḥ śaṃ no bhavantūṣaso vibhātīḥ । śaṃ naḥ parjanyo bhavatu prajābhyaḥ śaṃ naḥ kṣetrasya patir astu śambhuḥ ॥
ऋग्वेद का यह मंत्र सविता, उषा, पर्जन्य और क्षेत्रपति से समस्त प्रजा, कृषि और धरती के लिए मंगल, हरियाली और समृद्धि की कामना करता है।
वनस्पते शतवल्शो वि रोह सहस्रवल्शा वि वयं रुहेम। यं त्वामयं स्वधितिस्तेजमानः प्रणिनाय महते सौभगाय॥
vanaspate śatavalśo vi roha sahasravalśā vi vayaṁ ruhema । yaṁ tvāmayaṁ svadhitistejamānaḥ praṇināya mahate saubhagāya ॥
ऋग्वेद का यह मंत्र प्रकृति और मानव के गहरे सह-अस्तित्व को रेखांकित करते हुए वनस्पति के साथ-साथ समाज की प्रगति की कामना करता है।
यस्यां पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे यस्यां देवा असुरानभ्यवर्तयन्। गवामश्वानां वयसश्च विष्ठा भगं वर्चः पृथिवी नो दधातु॥
yasyāṁ pūrve pūrvajanā vicakrire yasyāṁ devā asurān abhyavartayan । gavāmaśvānāṁ vayasaś ca viṣṭhā bhagaṁ varcaḥ pṛthivī no dadhātu ॥
अथर्ववेद के भूमि सूक्त का यह ऐतिहासिक मंत्र उस मातृभूमि का आह्वान करता है जो पूर्वजों के महान पुरुषार्थ और दैवी शौर्य की साक्षी रही है, ताकि वह लोक को ऊर्जा और ऐश्वर्य से समृद्ध करे।
जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसम्। सहस्रं धारा द्रविणस्य मे दुहां ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती॥
janaṁ bibhratī bahudhā vivācasaṁ nānādharmāṇaṁ pṛthivī yathaukasam । sahasraṁ dhārā draviṇasya me duhāṁ dhruveva dhenuranapasphurantī ॥
भूमि सूक्त का यह मंत्र पृथ्वी को विविध भाषाओं, परंपराओं और आस्थाओं वाले मानव-समुदाय के साझा घर के रूप में प्रणाम करता है।
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम्। अपां रेतांसि जिन्वति॥
agnirmūrdhā divaḥ kakutpatiḥ pṛthivyā ayam । apāṁ retāṁsi jinvati ॥
एक वैदिक मंत्र जो अग्नि को द्युलोक की सर्वोच्च शक्ति और पदार्थ के भीतर ऊर्जा को जागृत करने वाले मूल तत्व के रूप में वर्णित करता है।
पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति चन्द्रो विकासयति कैरवचक्रवालम्। नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददाति सन्तः स्वयं परहितेषु कृताभियोगाः॥
padmākaraṁ dinakaro vikacīkaroti candro vikāsayati kairavacakravālam । nābhyarthito jaladharo’pi jalaṁ dadāti santaḥ svayaṁ parahiteṣu kṛtābhiyogāḥ ॥
सूर्य, चन्द्र और मेघों के उदाहरण से यह श्लोक बताता है कि सज्जन व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ या प्रार्थना के दूसरों का भला करते हैं।
यस्यां वृक्षा वानस्पत्या ध्रुवास्तिष्ठन्ति विश्वहा। पृथिवीं धेनुं प्रदुहां न उदिच्छन्तु नमोऽस्तु पृथिव्यै॥
yasyāṃ vṛkṣā vānaspatyā dhruvāstiṣṭhanti viśvahā । pṛthivīṃ dhenuṃ praduhāṃ na udicchantu namo’stu pṛthivyai ॥
अथर्ववेद के भूमि सूक्त से ली गई यह प्रार्थना पृथ्वी माता को समस्त संसाधनों की प्रदाता और जीवन की आधारशिला के रूप में सम्मानित करती है।
यार्णवेऽधि सलिलमग्र आसीद्यां मायाभिरन्वचरन्मनीषिणः। यस्या हृदयं परमे व्योमन्त्सत्येनावृतममृतं पृथिव्याः। सा नो भूमिस्त्विषिं बलं राष्ट्रे दधातूत्तमे॥
yārṇave’dhi salilam agra āsīd yāṁ māyābhir anvacaran manīṣiṇaḥ । yasyā hṛdayaṁ parame vyoman tsatyenāvṛtam amṛtaṁ pṛthivyāḥ । sā no bhūmis tviṣiṁ balaṁ rāṣṭre dadhātūttame ॥
अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्त से एक गंभीर प्रार्थना, जो राष्ट्र की शक्ति, तेज और समृद्धि के लिए भूमि का आह्वान करती है।
उद्भिन्नस्तबकावतंससुभगाः प्रेङ्खन्मरुन्नर्तिताः पुष्पोद्गीर्णपरागपांशुललसत्पत्रप्रकाण्डत्विषः। गम्भीरक्रमपञ्चमोन्मदपिकध्वानोच्छलद्गीतयः प्रत्युज्जीवितमन्मथोत्सव इव क्रीडन्त्यमू भूरुहाः॥
udbhinnastabakāvataṃsasubhagāḥ preṅkhanmarunnartitāḥ puṣpodgīrṇaparāgapāṃśulalasatpatraprakāṇḍatviṣaḥ । gambhīrakramapañcamonmadapikadhvānocchaladgītayaḥ pratyujjīvitamanmathotsava iva krīḍantyamū bhūruhaḥ ॥
सुभाषितरत्नकोश से लिया गया यह श्लोक वसंत ऋतु में प्रकृति के सौंदर्य और होली के उत्सव जैसा उल्लास प्रकट करता है।
निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम्। तस्माद् व्याघ्रो वनं रक्षेद् वनं व्याघ्रं च पालयेत्॥
nirvano vadhyate vyāghro nirvyāghraṃ chidyate vanam । tasmād vyāghro vanaṃ rakṣed vanaṃ vyāghraṃ ca pālayet ॥
महाभारत का यह श्लोक बाघ और वन के बीच के अन्योन्याश्रित संबंधों को दर्शाता है, जो वन्यजीव संरक्षण की आवश्यकता पर बल देता है।
यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्रं रसया सहाहुः। यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम॥
yasyeme himavanto mahitvā yasya samudraṃ rasayā sahāhuḥ । yasyemāḥ pradiśo yasya bāhū kasmai devāya haviṣā vidhema ॥
राष्ट्र की महिमा का गान करता यह मंत्र हमें देश के प्रति सर्वस्व समर्पण करने की प्रेरणा देता है।
अस्मे वोऽअस्त्विन्द्रियमस्मे नृम्णमुत क्रतुरस्मे वर्चांसि सन्तु वः। नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रै पृथिव्याऽ इयन्ते राड् यन्तासि यमनो ध्रुवोसि धरुणः कृष्यै त्वा क्षेमाय त्वा रय्यै त्वा पोषाय त्वा॥
asme vo'stvindriyam asme nṛmṇam uta kratur asme varcāṃsi santu vaḥ । namo mātre pṛthivyai namo mātre pṛthivyā iyante rāḍ yantāsi yamano dhruvo'si dharuṇaḥ kṛṣyai tvā kṣemāya tvā rayyai tvā poṣāya tvā ॥
यह वैदिक प्रार्थना माता पृथ्वी को कृषि, समृद्धि, पोषण और जीवन को धारण करने वाले साधनों का स्थिर स्रोत मानकर नमन करती है।
उपस्थास्ते अनमीवा अयक्ष्मा अस्मभ्यं सन्तु पृथिवि प्रसूताः। दीर्घं न आयुः प्रतिबुध्यमाना वयं तुभ्यं बलिहृतः स्याम॥
upasthāste anamīvā ayakṣmā asmabhyaṃ santu pṛthivi prasūtāḥ । dīrghaṃ na āyuḥ pratibudhyamānā vayaṃ tubhyaṃ balihṛtaḥ syāma ॥
अथर्ववेद के भूमि सूक्त से ली गई यह प्रार्थना पृथ्वी माता से उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और राष्ट्र सेवा के विवेक की याचना करती है।
सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति। सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्युरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु॥
satyaṁ bṛhad ṛtam ugraṁ dīkṣā tapo brahma yajñaḥ pṛthivīṁ dhārayanti । sā no bhūtasya bhavyasya patny uruṁ lokaṁ pṛthivī naḥ kṛṇotu ॥
पावन भूमि सूक्त का यह मंत्र उन शाश्वत शक्तियों—सत्य, नियम और परिश्रम—का वर्णन करता है जो इस जगत को धारण करती हैं।
पुष्पिताः फलवन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान्। वृक्षदं पुत्रवत् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च॥
puṣpitāḥ phalavantaś ca tarpayantīha mānavān । vṛkṣadaṁ putravat vṛkṣās tarayanti paratra ca ॥
फल-फूल देने वाले वृक्ष रोपण के बहुत बाद तक दूसरों का कल्याण करते हैं, इसलिए वृक्षारोपण निःस्वार्थ सेवा का स्थायी रूप है।